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August 14, 2017

"भगवान" का बुद्ध के संदर्भ मे अर्थ

By Sanjay Patel Bauddha || 11 August 2017 at 23:19


कई लोगों का प्रश्न है कि सभी बौद्ध लोग भगवान या ईश्वर को नहीं मानते तो फिर बुद्ध को भगवान क्यों कहते है ?

सबसे पहले भगवान शब्द का प्रयोग ही बुद्ध के लिए हुआ था, बुद्ध की फिलोसोफी को काउंटर करने के लिए बुद्धिज़्म के कई सारे शब्द हिन्दू शास्त्रों में प्रयोग किये गए और आज लोग यह समझ रहे है कि यह शब्द तो हिन्दू का है लेकिन वास्तव में बुद्धिज़्म में उसका अर्थ अलग है ।
आइए भगवान का बुद्ध के लिए क्या अर्थ है वह समझते है ...

पालि का भगवान अथवा भगवतं दो शब्दों से बना है – भग + वान,
पालि में भग मायने होता है – भंग करना , तोडना , भाग करना उपलब्धि को बांटना आदि और वान्‌ का अर्थ है धारण्कर्ता , तृष्णा आदि । यानि जिसने तृष्णाओं को भंग कर दिया हो वह भगवान्‌।

पालि ग्रंथों मे बुद्ध के लिये प्रयुक्त भगवान्‌ अथवा भगवा शब्द को परिभाषित करने के बहुत से उदाहरण है :

‘भग्गरागोति भगवा ’ : जिसने राग भग्न किया कर लिया वह भगवान

‘भग्ग्दोसोति भगवा ’ : जिसने द्धेष भग्न किया हो वह भगवान

‘भग्गमोहोति भगवा , भग्गमानोति भगवा , भग्ग किलेसोति भगवा , भवानं अंतकरोति भगवा म भग्गकण्ड्कोति भगवा ’..: जिसने मोह भंग कर लिया , अभिमान नष्ट कर लिया , क्लेष भग्न कर लिया , भव संस्कारों का अंत कर लिया , कंटक भग्न कर लिये वह भगवान्‌।

‘भग्गमोहोति भगवा’: मोह भग्न कर लिया , इस अर्थ में भगवान।

‘भग्गमानोति भगवा’ : अभिमान नष्ट कर लिया , इस अर्थ में भगवान ।

‘भग्गदिट्‌ठीति भगवा’ : दार्शिनिक मान्याताओं को भग्न कर लिया , इस अर्थ में भगवान्‌ ।

‘भग्गकण्डकोति भगवा’: कंटक भग्न किया , इस अर्थ में भगवान ।

‘भग्गकिलेसोति भगवा’: क्लेश , काषाय भग्न कर लिये , इस अर्थ में भगवान ।

‘भजि विभजि पविभजि धम्म्रतन्तिभगवा’ : भजि यानी जिसने धर्म रत्न का भजन किया , यानी सेवन , इस माने भगवान ।

ऐसे न जाने कितने उदाहरण हैं जिसमॆ भगवान शब्द का अर्थ संस्कृत के शाब्दिक अर्थ से बिल्कुल अलग दिखता है ।

पालि में एक सुत्त है :

इतिपि सो भगवा , अरहं , सम्मासम्बुद्धो,

विज्जाचरणसम्पन्नो सुगुतो लोकविदू ,

अनुत्तरो पुरिस सम्म सारथी सत्था देवमनुस्सानं , बुद्धो भगवति ॥

ऐसे जो अहर्त है , सम्यक्‌ सम्बुद्ध हैं , संपूर्ण जागृत हैं , लोभ , द्धेष और मोह से मुक्त ऐसे भगवन्‌ हैं , सर्वज्ञ हैं , ज्ञान और आचरण में परिपूर्ण हैं , सुगति प्राप्त हैं , वर्तमान और भूत भविष्य को जानने वाले हैं , यथावादी तथाकारी , जैसा कहते हैं वैसा करते हैं , ऐसे आचरण वाले हैं , आदमी को लोभ , द्धेष और मोह से छुडाने वाले अप्रतिम सारथी हैं , देवता और मनुष्यों के सास्ता हैं , गुरु हैं , उपदेशक हैं , ऐसे मनुष्यों मे अनुपम श्रेष्ठतम भगवान्‌ बुद्ध हैं ।

July 28, 2017

अशोक स्तंभ को तोड़कर शिवलिंग

By Sanjay Patel Bauddha  23 July 2017 at 22:39





RSS की एक किताब "हिंदुत्व" के पेज 54 में खुद मोहन भागवत जवाब दे रहे है कि मूर्ति पूजा और मंदिर यह सब वैदिक परंपरा में नहीं था यह सब बुद्ध के बाद प्रचलित हुआ तो फिर हिन्दू धर्म के प्राचीन मंदिर कैसे हो सकते है ?
उस में मोहन जी एक और बात कहते है कि पहले शिवलिंग की पूजा की जाती थी तो मोहन जी सारे शिवलिंग भी अशोक स्तंभ को तोड़कर बनाये गए है...
मैंने श्रावस्ती के पास आए हुवे पूर्वाराम महाविहार की मुलाकात ली वहा पता चला कि ब्राह्मिन लोग अशोक स्तंभ को तोड़कर शिवलिंग बनाते थे। फ़ोटो देखिये।










राम का सेतु भी रामायण की ही तरह काल्पनिक है

By Sanjay Patel Bauddha  24 July 2017 at 23:10


'सेतु समुद्रम' योजना के तहत 2007 में केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा प्रस्तुत करते हुए लिखा था कि राम-रावण युद्ध हुआ ही नहीं और न ही सीता का हरण ही हुआ। राम कभी लंका भी नहीं गए। इस प्रकार रामसेतु की अवधारणा को पूरी तरह बेबुनियाद बताया है।
केन्द्र का कहना है कि इस बात का कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं है कि साढ़े छह हजार वर्ष पहले भगवान राम ने यह पुल बनवाया था। इसी प्रकार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने भी सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर रामायण के चरित्रों के अस्तित्व से इनकार ‍किया है। इस प्रकार इस विभाग ने राम और रामायण पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
अब सवाल यह है कि जब सरकार और पुरातत्व सर्वेक्षण खुद स्वीकार कर रहे है कि राम-रावण युद्ध नहीं हुआ, राम कभी लंका नहीं गए, रामायण काल्पनिक है, राम का कोई वैज्ञानिक सबूत नही है तो फिर लोग क्यों राम के नाम पे मूर्ख बन रहे है ! क्यों राम के नाम पे इंसानों के बीच लड़ाई कर रहे है ?
विज्ञान अपनाओ, देश मे एकता बढ़ाओ।
अंधश्रद्धा भगाओ, देश बचाओ ।

July 06, 2017

सबसे सुंदर हसीन कल्पना : आत्मा-परमात्मा , भाग - 3

By Sanjay Patel Bauddha




भाग-2 में हमने आत्मा के अस्तित्व पे जो खंडन किया उसको आगे बढ़ाते अगर देखे तो आत्मा विषयक जंगली विश्वास जो गीता ने प्रचारित किया है, इसने भारत का बेड़ा गर्क किया है । आत्मा की यह जंगली कल्पना पूर्णतः भ्रामक है, असत्य है, अनुभव शून्य है तथा वैज्ञानिक घेरे के बाहर है। इसी संदर्भ में डॉ. अज्ञात एक मेडिकल ऑपेरशन का वर्णन करते हुए कहते है-
"सन 1976 ईसवी में मद्रास में जो एक ऑपेरशन हुआ, उससे आत्मा विषयक रही सही शंका भी समाप्त हो गई। दिनांक 15.03.1976 के वीर प्रताप (हिंदी दैनिक) में छपी विस्तृत रिपोर्ट में कहा गया है, तीन वर्ष तक के बच्चे के दिल की बनावट के दोष दूर करने के लिए एक नई ऑपेरशन विधि 1967 में जापान में विकसित की गई थी। इसके सफल प्रयोग न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में हो चुके है। भारत मे ऑस्ट्रेलिया के डॉक्टरों की देखरेख में उस वक्त के पैराम्बूर रेलवे अस्पताल मद्रास के डायरेक्टर टी. जे. चेरियन और सर्जन के. एस. चेरियन ने ऐसे चार ऑपेरशन किये है।
ऑपेरशन से पहले बच्चे के शरीर मे से खून निकाल लिया जाता है और शरीर का तापमान सामान्य 37℃ से कम करके 18℃ पर लाकर उसका ऑपेरशन किया जाता है, जिसमे एक घंटा 10 मिनट तक समय लग जाता है। हृदय की बनावट को ठीक करके उसे शरीर मे स्थापित किया जाता है। ऑपेरशन के बाद शरीर मे फिर खून डाला जाता है। कुछ मिनिटों के बाद बच्चा जी उठता है।
यदि आत्मा हो तो 70 मिनट तक बच्चा मृत नही रहना चाहिए। जब उससे खून निकाल लिया जाता है, तब भी तो आत्मा वहीं रहेगी ? फिर बच्चा जीवित क्यों नहीं रहता ? जब 70 मिनट के बाद खून डालकर पुनः तापमान सामान्य कर दिया जाता है, तब आत्मा कहां से आ टपकती है, जो बच्चा जीवित हो जाता है?
स्पष्ट है कि सारा खेल भौतिक तत्वों का ही है। उनमें जब गड़बड़ी होती है जीवन उससे प्रभावित होता है। उसमें आत्मा जैसी काल्पनिक चीजों की कोई भूमिका नहीं।" 
ठीक ऐसा ही एक उत्तर भंते नागसेन ने सम्राट मिलिंद को दिया था। भंते नागसेन ने कहा था, शरीर मे यदि आत्मा ही मूलभूत है तो आंखों के निकाल देने पर बड़े-बड़े गड्ढ़े हो जाने पर तो और ज्यादा देखेगी। कानों के पर्दो में बड़े-बड़े छेद कर देने पर तो और ज्यादा सुनेगी। नाक में बड़े-बड़े छेद कर दिए जाए तो और ज्यादा सूंघेंगी। जीभ को जड़ से उखाड़ लेने पर बड़े छिद्र होने पर तो आत्मा और ज्यादा स्वाद ले सकेगी। यह सारा अनुभव आत्मा का नहीं, मन के द्वारा है। अतः आत्मा की कल्पना गपोड़संखियो की है, जिससे भारत के लोग गुमराह हो गए है। आत्मा नही है, यह असलियत ब्राह्मण भी जानता है, लेकिन उसमें यह हिम्मत नहीं कि वह इस प्रकार का प्रचार कर सके, क्योंकि वह जानता है ऐसा करने से उसके पुरखों के जमाने से जो हराम का हलवा माड़ा मिल रहा है, उसमे कमी आ जायेगी। ब्राह्मण भली प्रकार जानते है कि जितना ज्यादा अंधविश्वास होगा, जितनी ज्यादा अविद्या होगी और जितना ज्यादा अज्ञान होगा, दूसरों के द्वारा उतना ही ब्राह्मण पूज्य, प्रशंसित एवं सम्मानित होगा। यही कारण है यह वर्ग सदैव परिवर्तन का कट्टर विरोधी रहा है और अंधविश्वासों का समर्थक रहा है।
यह तीन भागों के वांचन के बाद आप उतने तो समर्थ हो ही चुके होंगे और आपकी तर्क शक्ति और वैज्ञानिक दृष्टि से आप इतने तो पक्के हो ही गए होंगे कि आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है। जब आत्मा ही नहीं तो परमात्मा (ईश्वर) किस खेत की मूली है !

(पढ़ते रहिएगा... अगर आत्मा ही नहीं है तो परमात्मा कैसे ?... आगे जारी रहेंगे। पढ़ेगा इंडिया... तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया। भाग - 4 जल्द ही आपके सामने प्रस्तुत होगा।)

संदर्भ:
1. गीता की शव परीक्षा - डॉ. अज्ञात
2. भारत की गुलामी में गीता की भूमिका - आचार्य भद्रशील रावत
3. फ़ोटो - गूगल

सबसे सुंदर हसीन कल्पना : आत्मा-परमात्मा , भाग - 2

By Sanjay Patel Bauddha



निरर्थक एवं शरारती बातों में एक नाम आता है, आत्मा का। 
"आत्मा विषयक अन्य कई बातों की तरह गीता का यह सिद्धांत भी गलत और भ्रांत है। यदि सब के अंदर अनुभव करनेवाली एक ही आत्मा है, तब एक के पानी पीने पर सबको संतुष्टि अनुभव क्यो नही होती ? यदि सबके अंदर एक ही ज्ञाता है तो फिर अर्जुन को उपदेश क्यों दिया गया ? उसे स्वतः ही कृष्ण का ज्ञान क्यों नहीं प्राप्त हुआ ? यदि सबके अंदर एक ही आत्मा है तो फिर गाय के आगे चारा और शेर के आगे मांस क्यों परोसा जाता है ? बिल्ली चूहे क्यों खाती है और वैष्णव प्याज से परहेज क्यों करते है ? गीता की सबके अंदर एक ही आत्मा होनेवाली बात बिलकुल गलत है।"
गीता कहती है कि आत्मा का विभाजन नहीं होता। 
"गीता के आत्मा विषयक ये उदगार नितांत काल्पनिक है। केंचुए को मध्य से काट दो तो दो सजीव केंचुए बन जाते है। ऐसे में क्या केंचुए के बीच की आत्मा दो शरीरों में आधी-आधी होकर नहीं चली जाती ? छिपकली की पूंछ काट देने पर कटी हुई पूंछ काफी समय अलग पड़ी तड़पती रहती है। क्या यह छिपकली की आत्मा का अंश ही पूंछ में नहीं तड़पता ? ऐसे में आत्मा के बारे में यह कहना कि इसे शस्त्र नहीं काट सकते, सरासर गलत है। अगर कथित आत्मा न कटती तो केंचुए का कटा भाग और छिपकली की कटी पूंछ दोनों ही निष्क्रिय होकर पड़े रहते। यदि आत्मा को अग्नि जला नही सकती, पानी इसे भिगों नहीं सकता और हवा इसे सूखा नहीं सकती, यदि यह फायरप्रूफ, वाटरप्रूफ और एयरप्रूफ है तो यह आत्मा बिजली के करंट वाली तार के शरीर से छू जाने पर शरीर से क्यों निकल भागती है ? पानी में डूबने से वह क्यों निकल भागती है ? अधिक गर्मी से लोग क्यों मरते है ?"
गीता कहती है कि आत्मा नया शरीर धारण करती है।
"आत्मा विषयक यह सिद्धांत भी असत्य है। यदि मृत्यु का अर्थ एक पुरानी कमीज को छोड़कर नई कमीज पहनने के समान ही होता, तो हर कोई मृत्यु के प्रति उसी तरह उत्साहित और उत्कंठित होता जैसे प्रत्येक व्यक्ति को नई कमीज का चाव व उत्साह होता है। लेकिन देखने मे इसके बिलकुल उलट मिलता है कोई भी प्राणी मरना नहीं चाहता । कोई भी इस पुरानी कमीज को छोड़ना नहीं चाहता।
जो छोटे बच्चे, बलिष्ठ युवक युवतियां हार्टफेल हो जाने से मर जाते है, उनके शरीर तो जीर्ण नहीं हुए होते, वे तो पुराने नहीं हुए होते, फिर उन्हें आत्मा क्यों छोड़ जाती है ? उधर बहुत से कुष्ठ रोगी घूमते फिरते है, उनके शरीर पूरी तरह और बुरी तरह जीर्ण हुए होते है, लेकिन उनकी आत्मायें उन्हें नहीं छोड़ती। ....असलियत यह है कि दुनिया में आत्मा नामक कोई चीज है ही नहीं।"
(पढ़ते रहिएगा... आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व को नकारने उदाहरणों के साथ आगे जारी रहेंगे। पढ़ेगा इंडिया... तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया। भाग - 3 जल्द ही आपके सामने प्रस्तुत होगा।)

संदर्भ:
1. गीता की शव परीक्षा - डॉ. अज्ञात
2. भारत की गुलामी में गीता की भूमिका - आचार्य भद्रशील रावत
3. फ़ोटो - गूगल


July 02, 2017

सबसे सुंदर हसीन कल्पना : आत्मा-परमात्मा भाग - 1


(पिछली 2 पोस्ट गीता के रहस्य के बारे में थी उनमें बात छिड़ी थी कि गीता पे वार क्यों ? और मैने जवाब दिया था कि जिस ग्रंथ ने देश को गुलाम बनाया है और देश को विज्ञान से दूर रखकर हाँसी के पात्र बनाया है ऐसे ग्रंथो की सच्चाई तो बाहर लानी ही पड़ेगी न ! उसी परिप्रेक्ष्य में यह पोस्ट है)

संसार में मनुष्य समस्त प्राणियों में ज्ञानवान माना जाता है और इस ज्ञानवान की सबसे सुन्दर हसीन कल्पना यदि कोई है तो केवल आत्मा-परमात्मा की कल्पना ! इस हसीन कल्पना ने संसार के समस्त बुद्धिवादियों को चक्कर में डाला है। इस आत्मा-परमात्मा का न तो मनोवैज्ञानिक दॄष्टिकोण से कोई अस्तित्व है, न ही विकासवाद की दॄष्टि से अस्तित्व है, न प्राकृतिक रूप से अस्तित्व है, न वैज्ञानिक दॄष्टिकोण से अस्तित्व है और न अनुभव की कसौटी पर इसका अस्तित्व है। यह तो सिर्फ आत्मा-परमात्मा के नाम पर हलवा-मांडा खाने वाले पुरोहितों, मोटी-मोटी रकम डकार कर कवि-कर्म करने वाले कवियों की मात्र हसीन कपोल कल्पना है। अनुभव की कसौटी पर परखने के बाद ही सबसे प्रथम तथागत बुद्ध ने इस आत्मा-परमात्मा पर सशक्त हथौड़ा बजाया था। भदन्त आनंद कौशल्यायन कहते है, "कहने वालों का कहना है की तथागत बुद्ध ने ईश्वर का कहीं खंडन नहीं किया, वे ईश्वर के बारे में केवल मौन रहे। इस कथन में इतनी सच्चाई जरूर है की पालि त्रिपिटक में ईश्वर का अधिक खंडन-मंडन नहीं है। उसका कारण यह है कि उस समय तक स्वयं ईश्वर को पूरी तरह खड़ा नहीं किया गया था। तथागत बुद्ध के लगभग तीन सौ वर्ष बाद तक ईश्वर की कल्पना उत्तरोत्तर विकसित और परिवर्धित होती रही है। पतंजलि के समय तक कहीं जाकर 'ईश्वर' का अर्थ, जो आजकल ग्रहण किया जाता है, जड़ीभूत हुआ। किन्तु इसका यह मतलब नहीं की पालि-वांग्मय में ईश्वर का खंडन है ही नहीं। अंगुत्तर निकाय में तथागत बुद्ध का यह वचन सुरक्षित है, "भिक्खुओ कुछ लोग कहते ही की यह सृष्टि ईश्वरकृत है, तब तो वह ईश्वर बड़ा निर्दयी होगा, जिसने ऐसी दुखपूर्ण सृष्टि की रचना की है।"
वे आगे आत्मा के बारे में कहते है,"जो बात ईश्वर के बारे में कही जाती है अथवा जो भ्रांति जानबुझ कर ईश्वर के बारे में फैलाई जाती है, वैसी ही भ्रांति आत्मा के बारे में भी फैलाई जाती है कि तथागत बुद्ध ने आत्मा का कहीं खंडन नहीं किया अथवा उन्होंने आत्मा के अस्तित्व को कहीं भी अस्वीकार नहीं किया। बुद्ध ने संसार भर के चिंतन जगत को जो सबसे बड़ी और अनमोल देन दी है, वह उनका अनात्मवाद ही है। उन्होंने आत्मवाद को 'सम्पूर्ण मूर्खता' या 'परिपूर्ण बाल-धर्म' कहा है।
ईश्वर तथा आत्मा के लिए बौद्ध धम्म में कोई स्थान न होना कुछ लोगों की दृष्टि में बौद्ध धर्म की कमी है। यह ऐसा ही है कि जैसे कोई कहे कि किसी भी स्वतंत्र आदमी के हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेड़ी न होना उसकी कमी है।"

डॉ. आम्बेडकर का कथन है, "तथागत की दृष्टि में ईश्वर विश्वास बड़ी खतरनाक बात थी, क्योंकि ईश्वर विश्वास ही प्रार्थना और पूजा की सामर्थ्य में विश्वास का उत्पादक है और प्रार्थना कराने की जरूरत ने ही पंडा-पुरोहित को जन्म दिया और पुरोहित ही वह शरारती दिमाग था जिसने इतने अंधविश्वासों को जन्म दिया और सम्यक दृष्टि के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया।"
बाबासाहेब प्रश्न करते हुए कहते है कि- "क्या तथागत बुद्ध आत्मा में विश्वास रखते थे ? नहीं, एकदम नहीं। आत्मा के संबंध में उनका 'अनात्मवाद' कहलाता है। यदि एक अशरीरी आत्मा को स्वीकार कर भी लिया जाय, तो उसके संबंध में बहुत से प्रश्न पैदा होते है। आत्मा क्या है ? आत्मा का आगमन कहाँ से हुआ ? शरीर के मरने पर इसका क्या होता है ? शरीर के न रहने पर यह परलोक में कैसे रहता है ? वहां यह कब तक रहता है ? जो लोग आत्मा के अस्तित्व के सिद्धांत के समर्थक थे, तथागत बुद्ध ने उनसे ऐसे प्रश्नों का उत्तर चाहा था।"
वैदिक साहित्य में कहीं आत्मा को 'अंगूठे' के समान, तो कहीं चावल के दाने के समान माना गया है। उपनिषदों ने एक निश्चित भ्रांति को पाला, उसका प्रचार कर भोले-भाले भारतीयों को गुमराह किया। इसका प्रभाव भगवद्गीता पर भी पड़ा है। गीता ने आत्मा-परमात्मा का प्रचार कर भारतीयों को अंधेरे में धकेला है।

(गीता और दूसरे धर्म ग्रंथो ने भारत की गुलामी में कैसे भूमिका निभाई है वह जानने और आत्मा-परमात्मा को जानने आगे पढ़ते रहिएगा... पढ़ेगा इंडिया...तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया...) भाग-2 जल्द ही आएगा...

संदर्भ:
1. तथागत का शाश्वत संदेश - भदंत आनंद कौशल्यायन
2. बुद्ध और उनका धम्म - डॉ. बी. आर. आम्बेडकर
3. गीता की शव परीक्षा - डॉ. सुरेन्द्र अज्ञात
4. भारत की गुलामी में गीता की भूमिका - आचार्य भद्रशील रावत

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June 28, 2017

गीता रहस्य : भाग - २




By Sanjay Patel Bauddha

गीताकार कृतज्ञ नहीं है !
ऐसा प्रतीत होता है की गीताकार कृतज्ञ नहीं है! वह कृघ्नता के साथ-साथ ईमानदार भी नहीं है। उसने गीता में जहा से सामग्री चोरी की है, उस सामग्री के स्रोत को न बताकर गीता को मौलिक कृति बनाने की घृष्टता की है। संस्कृत साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. सुरेंद्र कुमार शर्मा कहते है की, "गीता यध्यपि एक स्वतंत्र पुस्तक है तथापि उसमे बहुत कुछ पहले विद्यमान वांगमय से लिया गया है। इसमें महाभारत के २७ पुरे श्लोक, कही कही अक्षरशः और कही थोड़े परिवर्तन से मिलते है।

ऐसे ही कठोपनिषद के ७ श्लोक गीता में अक्षरशः व कुछ परिवर्तन के साथ मिलते है श्वेताश्वतर उपनिषद के भी बहुत से श्लोक और भाव गीता में मिलते है। गीता के दूसरे अध्याय का आत्मा का वर्णन, आठवें अध्याय क अक्षर-ब्रह्म वर्णन और १३वें अध्याय के क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विचार अक्षरशः उपनिषदों से लिया गया है।

और भी बहुत सी पुस्तकों के भाव, शब्द और श्लोक गीताकार ने लिए है। उसने एक सभ्य लेखक की तरह उनके मूलस्रोतो का उल्लेख नहीं किया, बल्कि अपनी मौलिकता सिद्ध करने की उच्चाकांक्षा के वशीभूत होकर हर एक उठाए श्लोक व भाव को ऐसे पेश किया है, मानो वह उसकी अपनी रचना हो। आज अगर गीताकार ऐसा करता, शायद कॉपीराईट-कानून के अधीन जेल की हवा खाता। गीताकार के इस पक्ष की ओर विद्वानों ने ध्यान दिया है और सख्त टिप्पणियां भी की है।

लेकिन इस बात की ओर बहुत कम लोगो ने ध्यान दिया हैं की गीताकार ने बौद्ध वांगमय से भी बहुत कुछ उठाया है- कही भाव, कही उपमाएं और कही पारिभाषिक शब्दावली। यह अलग अलग बात है की उसने कही-कही मूल शब्दों को वह अर्थ में प्रयोग किया है, जो उनका असल में अर्थ नहीं है।
दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञ के विषय में १८ श्लोको में जो कुछ कहा है, ठीक वही कुछ बौद्ध वांगमय के सुत्तनिपात १८ गाथाओ में अंकित है।
गीता के अध्याय १२ में सच्चे साधक के जो गुण बताए गए है, वे बुद्धिज़्म से लिए गए है। इन्हे बौद्ध वांगमय में 'भावना' कहते है। भावना में चार ब्रह्मविहार होते है। वे निम्नलिखित है - करुणा, मैत्री, मुदिता और उपेक्षा।

गीता का १६वां अध्याय 'धम्मपद' और 'सुत्तनिपाद' पर पूरी तरह आधारित है। गीता में 'निर्वाण' शब्द बौद्ध धर्म से लिया गया है, क्योंकि वेदों, ब्राह्मण ग्रंथो तथा उपनिषदों में यह 'निर्वाण' शब्द कहीं नहीं है। गीताकार ने इसमें ब्रह्म शब्द जोड़कर इसे ब्राह्मणवादी शिक्षा बनाने की कोशिश की है। गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक ४० से ७२ तक ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करने के जो पांच सोपान बतलाए है, वे ये हैं- श्रद्धा, व्यवसाय, स्मृति, समाधी, प्रज्ञा। यही पांच सोपान आरंभिक बुद्धिज़्म में बतलाए गए है।
गीता का १७वा अध्याय तप के वर्गीकरण से संबंधित है। कृष्ण ने अपनी पूरी जिंदगी में कही तप नहीं किया या फिर कही पे भी कृष्ण के तप का वर्णन नहीं है तो फिर कृष्ण के पास तप का ज्ञान कैसे आया ? यह बुद्ध द्वारा तपस्या के विभिन्न वर्गों के विषय में प्रकट किये विचार है। गीता में विराट दर्शन भी कुछ कुछ बुद्ध तथा मार विजय की नक़ल है।

गीताकार ने बौद्ध संस्कृति और दर्शन के प्रचलित शब्दों को बहुत स्थानों पर अपना अर्थ देने की शरारतपूर्ण कोशिश की है। इसका उद्देश्य वही था, जो मछली पकड़ने के लिए फेंकी गई कंटिया के आगे लगे मांस का होता है, यानि बौद्ध विचारो से प्रभावित लोगों को इन शब्दों से आकृष्ट कर ब्राह्मणवादी शिक्षाए दिमागों में भरना।

हिन्दू वांग्मय के विद्वान् तथा भारतीय संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर का कहना है की, "गीता ने 'निर्वाण' सिद्धांत कहा से लिया ? निश्चय ही यह सिद्धांत उपनिषदों से नहीं लिया गया है क्योंकि किसी भी उपनिषद में 'निर्वाण' शब्द का उल्लेख नहीं है। यह बौद्ध धर्म से ली गई है। यदि इस संबंध में किसी को संदेह हो तो उसे भगवद्गीता के ब्रह्मनिर्वाण की तुलना बौद्ध धर्म की निर्वाण संबंधी अवधारणा से करना चाहिए जिसका विवेचन महापरिनिब्बान सुत्त में किया गया है।

गीता में भावना, कर्मयोग, लोक संग्रह, योगक्षेम, शब्द गीताकार ने बौद्ध धर्म से चुराये है। अतः डॉ. सुरेन्द्र कुमार अज्ञात का कथन शाट-प्रतिशत सही है की "बुद्ध और बुद्धिज़्म की शिक्षाओं का मुकाबला करने के लिए ब्राह्मणो ने अपने ग्रंथो की नए ढंग से व्याख्या शुरू की। कई नये ग्रंथो की रचना की और नायको और देवताओ को नए रूप में पेश किया। ब्रह्मसूत्र ऐसे ग्रंथो में मुख्य था। लेकिन वह सर्वजन सुगम नहीं था। अतः एक सरल ग्रन्थ था भगवद्गीता जिसमे बुद्ध के स्थान पर कृष्ण को स्थापित किया गया। "

संदर्भ:
1. गीता की शव परीक्षा - डॉ. सुरेन्द्र अज्ञात
2. भारत की गुलामी में गीता की भूमिका - आचार्य भद्रशील रावत
3. बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय, खंड - 7 - डॉ. आंबेडकर



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June 27, 2017

गीता रहस्य : पढ़ेगा इंडिया , तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया

By Sanjay Patel Bauddha
सूचना: जिस किसीकी आस्था-श्रद्धा कमजोर हो वह न पढ़े और अगर फिर भी पढ़ते है और उनकी कमजोर आस्था-श्रद्धा को ठेस पहुंचे तो इसके जिम्मेवार वह खुद रहेंगे ।

भारत के कुछ कुर्सी तोड़ विद्वान भोलेभाले लोगों को यह कहकर गुमराह किया करते है कि आज से लगभग 5-6 हजार वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ था, जिसमें गीता समाहित है... मगर आज यहा कई किताबों के रेफरेंस और अध्ययन से इस बात का खंडन करेंगे...
कहते है कि अपराधी अपने पीछे अपराधपन का कोई न कोई प्रमाण अवश्य ही छोड़ जाता है ! ऐसी ही कुछ प्रामाणिक बातें गीताकार ने भी छोड़ी है । गीता का लेखक अपने घर में बैठकर गीता लिख रहा है। वह गीता के 18वें अध्याय के श्लोक 70 में कृष्ण के मुंह से कहला बैठता है -

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादभावयो: ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति: ।
अर्थ: जो कोई हम दोनों के संवाद रूप इस 'धर्म' को पढ़ेगा तो मेरा मत है कि उसके ऐसा करने से मैं ज्ञान यज्ञ द्वारा पूजित होऊंगा ।

गीताकार ने जो 'अध्येष्यते' शब्द का प्रयोग किया है; यहीं पर वह पकड़ा गया है। सभी जानते है कि युद्ध के समय कृष्ण और अर्जुन में मौखिक वार्तालाप हो रहा था और मौखिक वार्तालाप में 'अध्येष्यते' का प्रयोग सरासर गलत है। गीताकार स्वयं भूल गया था कि कृष्ण और अर्जुन का मौखिक वार्तालाप है। इसीलिए भूलवश वह 'अध्येष्यते' (पढ़ेगा) का प्रयोग कर बैठा। 'पढ़ेगा' का अर्थ है कि गीताकार घर में जो पोथी लिख रहा है, उसे भविष्य में कोई पढ़ेगा (=अध्येष्यते) अतः गीता का संबंध वास्तव में किसी युद्ध से न होकर वह तो केवल गीताकार की घर में बैठे ही बैठे कोरी कल्पना ही है ।
कहते है कि कृष्ण ने समय को भी रोक दिया था, अर्जुन और कृष्ण के अलावा सब रुक गया था तो फिर गीता लिखी किसने ? न अर्जुन ने न कृष्ण ने तो यह तीसरा कहा से आया ?
गीता की रचना कब की गई है, इसका प्रमाण स्वयं गीता में ही मिल जाता है! प्रसिद्ध इतिहासकार धर्मानंद कोसंबी ने खोज करके बताया है कि बालादित्य राजा के राज्यकाल (5वीं शताब्दी) में वादरायण या उसके किसी अज्ञात नामा शिष्य ने इसकी रचना की होगी ।
"गीता की भाषा 500 ईशवी पूर्व वाली नही है । यह भाषा बहुत कुछ आधुनिक संस्कृत जैसी है । यह कालिदास के काफी निकट है । फिर इसमें बौद्ध दर्शन के 'निर्वाण' आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है । इससे स्पष्ट है कि यह बुद्ध के बाद कि रचना है।
गीता का समय निश्चित करने में स्वयं गीता काफी मदद करती है। अध्याय 13 के श्लोक 4 में 'ब्रह्मसूत्र' पदों का उल्लेख है। ब्रह्मसूत्रों में बुद्ध दर्शन के चारों संप्रदायों वैभाषिक, सौत्रान्त्रिक, योगाचार और माध्यमिक का खंडन है। योगाचार का विकास असंग और वसुबंधु नाम के भाइयों ने सन 350 ईशवी के आसपास किया । इसके 40-50 वर्ष बाद ही योगाचार इतना प्रसिद्ध हुआ कि इसके पृथक खंडन की जरूरत पड़ी। स्पष्ट है, सन 400 ईसवी के बाद ही ब्रह्मसूत्रों की रचना हुई। लगभग इसी समय वादरायण हुआ जिसका शंकर की गुरु परंपरा में आदि स्थान है- वादरायण, उसका शिष्य गोविंद भागवदपद और उसका शिष्य आदि शंकराचार्य (जन्म 788 ईसवी) शंकर के जन्म से दो-ढाइसो वर्ष पहले कहीं हुआ होगा।
गीता की रचना बौद्ध धर्म के विकास के बाद ही हुई है। बौद्ध धर्म से मुकाबला करने के उद्देश्य से ही किसी अल्प विद्वान ने इसकी रचना घर मे बैठकर की है। पांचवी शताब्दी के आसपास बौद्ध धम्म उच्च शिखर पर था। उस समय के वर्णाश्रम धर्म के मुकाबले में बौद्ध धम्म श्रेष्ठ माना जाता था। जो गंदगी, दलदल, अनैतिकता तथा अंधविश्वास वैदिक धर्म में थे, बौद्ध धम्म इन सबसे मुक्त था। इसीलिए लोग पुराने दलदल को छोड़कर बौद्ध धम्म अंगीकार कर रहे थे। इस धर्म परिवर्तन को रोकना गीताकार का मूल उद्देश्य था। गीताकार यह भी जानता है कि वैदिकधर्म गुण रहित है और बौद्ध धम्म गुण श्रेष्ठ है। इसीलिए बौद्ध धम्म से वह भयभीत है। तभी तो गीताकार को कहना पड़ता है -

श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: || (गीता, अध्याय 03/35)
अर्थ: अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है । अपने धर्म में तो मरना भी कल्याण कारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है ।।
गीताकार इतना डरा हुआ प्रतीत हो रहा है कि गीता के इस श्लोक को उलट फेर करके गीता अध्याय 18 के श्लोक 47 में उसी बात को फिर दोहरा बैठता है-

श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् || 47||
अर्थ: अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है ;क्योंकि स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता ।। ४७ ।।

इन दोनों श्लोकों पर सोचा जाए तो पता चलता है कि, अगर मान लिया जाए कि सृष्टि का सबसे पुराना धर्म हिन्दू है तो फिर कृष्ण यह श्लोकों में कौन से दूसरे धर्म की बात करता है? अगर हिन्दू धर्म अच्छा है तो अर्जुन को यह समझाने की क्या आन पड़ी ?
डॉ. श्रीराम आर्य ने गीता विवेचन में लिखा है कि, " गीता की रचना... यह प्रकट करती है कि वह अन्य शास्त्रों में से चोरी करके बनाई गई पुस्तक है। गीताकार ने जो भी सामग्री महाभारत, मनुस्मृति व उपनिषदों और बौद्ध साहित्य में से ली है, उसे तोड़-मरोड़कर व उसमे मिलावट करके उपस्थित किया है...
गीता में 'निर्वाण' शब्द बौद्ध धर्म से लिया गया है क्योंकि वेदों, ब्राह्मण ग्रंथो तथा उपनिषदों में यह 'निर्वाण' शब्द कहीं नही है।

(अगले पोस्ट में गीता में कहा कहा से चोरी करके लिखा गया है उसकी जानकारी विस्तृत से बताऊंगा)
प्रसिद्ध आलोचक एवं संस्कृत साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. सुरेन्द्र अज्ञात भगवदगीता के बारे में लिखते है, "गीता का रचयिता न संस्कृत व्याकरण का पूरी तरह ज्ञाता है और न उसे वेदों व दूसरे धर्म तथा दर्शन-सिद्धांतो का ठीक से ज्ञान है। गीता में 176 के लगभग व्याकरण विषयक गलतियां मिलती है, चार श्लोकों के बाद एक गलती कहीं संधिविषयक गलती है, तो कहीं गणविषयक; कहीं समास विषयक गलती है तो कहीं लकार विषयक। 
अतः "यह निर्विवाद है कि गीता न कृष्ण की रचना है, न व्यास और न किसी विद्वान की, यह किसी कामचलाऊ पंडित की रचना है जो वेद, दर्शन और संस्कृत व्याकरण का भी ज्ञाता नहीं है।"
इस प्रकार निःसंदेह रूप से यह बात प्रमाणित होती है कि गीता कृष्ण के द्वारा न रची गई है या न कृष्ण का कोई उपदेश है। उसे बनाने वाले ने उपनिषद, मनुस्मृति, महाभारत और बौद्ध वांगमय से भी सामग्री लेकर, उसे तोड़-मरोड़कर व उसमें मिलावट करके इस रूप में प्रस्तुत किया है कि श्री कृष्ण जी को साक्षात परमेश्वर सिद्ध (बुद्ध को भुलाने और बुद्ध से मुकाबला करने) किया जा सकें । यदि ऐसा न करता तो उसे अपनी बात को प्रभाव पूर्ण ढंग से रखने का अवकाश भी नहीं मिल सकता था।
(बने रहिएगा... पढ़ेगा इंडिया...तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया... आगे जारी रहेगा गीता का रहस्य अगले पोस्ट में)
संदर्भ:
1. पालि साहित्य का इतिहास
2. गीता की शव परीक्षा - डॉ. सुरेन्द्र अज्ञात
3. गीता विवेचन - डॉ. श्रीराम आर्य
4. भारत की गुलामी में गीता की भूमिका - आचार्य भद्रशील रावत
5. श्रीमद भागवद गीता
6. विकिपीडिया 

June 26, 2017

धर्म का भय क्यों?

By Sanjay Patel Bauddha

डॉक्टर बी आर अंबेडकर ने अपनी पुस्तक "जाति-प्रथा का विध्वंस" में लिखा है कि धर्म और कानून दो अलग-अलग चीज होते हैं।
प्रत्येक धर्म के कुछ सिद्धांत होते हैं। ये सभी मनुष्यों पर समान रूप से लागू होते हैं। धर्म में किसी खास व्यक्ति या समूह के लिए कुछ पाबंदी हो या दूसरे समूह के लिए कुछ छूट हो ऐसा नहीं होता।
कानून या नियम मनुष्य के जीवन को नियंत्रित करने के लिए बनाए जाते हैं। जैसे किसी देश का संविधान या स्कूलों के नियम। स्कूलों में कुछ खास नियम होते हैं- समय पर आने का, पढ़ने का, छुट्टी का, अध्यापकों के साथ व्यवहार करने का आदि।
कानून या नियमों को बदला जा सकता है। जैसे जनहित में संविधान में संशोधन किया जा सकता है। जिसका कोई बुरा नहीं मानता।
लेकिन धर्मों के सिद्धांतों में कोई परिवर्तन नहीं करता है और ना ही करना चाहता है क्योंकि वह सोचता है कि धर्म के सिद्धांत ईश्वर के बनाए हुए हैं, या ईश्वर के दूत के बनाए हुए हैं।
हिंदू धर्म में वास्तव में सिद्धांत नहीं है, वे कानून ही है जैसे कि ब्राम्हण को किस तरह व्यवहार करना चाहिए, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्रों को किस तरह से व्यवहार करना चाहिए। उनके अलग-अलग अधिकार बताये गए हैं। लेकिन इन कानूनों को धर्म का रूप दिया हुआ है जिससे लोग उसको सुधारने की हिम्मत ना करें।
दूसरी बात है कि हिंदू धर्म में ब्राम्हण को सम्मानित माना जाता है और भू-देवता माना जाता है। जैसा वह चाहता है वैसा ही किया जाता है। वह कभी नहीं चाहेगा कि हिंदू धर्म में सुधार हो क्योंकि उसमें उसका बहुत फायदा है। मंदिरों में बिना मेहनत के गाढ़ी कमाई होती है। लोगों की जन्म, मृत्यु, शादी में मुफ्त में खाने को मिलता है। ब्राह्मण ऐसा अधिकार क्यों छोड़ना चाहेगा?
इन कारणों के होते हुए हिंदू धर्म में सुधार संभव नहीं है। यदि जनता को समझ में आ जाए कि हिंदू धर्म की असमानतावादी व्यवस्था धर्म का सिद्धांत नहीं बल्कि शोषण का कानून है तो वे उस को बदलने में कोई संकोच नहीं करेंगे।
वह केवल श्रद्धा के नाम पर रुका हुआ है और अपना शोषण करवाता रहता है। ज्ञान प्राप्त होते ही वह बिना किसी की डरे इस सड़े-गले कानून को मानने से मना कर देगा और वर्ण व्यवस्था से मुक्त हो जाएगा।
इस प्रकार से मनुष्य का डर केवल अज्ञान के कारण है।

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June 07, 2017

क्या प्रधानमंत्री जी विदेश घूम कर आते है तो बिल आपको देते है ?

कुछ लोग कई दिनों से सोसिअल मीडिया पे ऐसी कई तस्वीरें फैला रहे है जिसमे दिखाया जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन जी ने और प्रधानमंत्री मोदी जी ने विदेश प्रवास पे कितना खर्च किया !


मैने RTI की तो जानकारी मिली कि प्रधानमंत्री जी के खर्च की जानकारी नही दे पाएंगे !


तो ऐसे फरेबी लोगों से में जानना चाहता हु की क्या प्रधानमंत्री जी विदेश घूम कर आते है तो बिल आपको देते है ? अगर किसी भक्त के पास सही जानकारी है तो हमे भी साझा कीजियेगा तो सच क्या है पता चले और आम जनता सच्चाई जान पाए !

- संजय पटेल

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May 23, 2017

દબંગ જાતિ એટલે કઈ જાતિ ? : સંજય પટેલ

તમે ક્યારેય એવું સાંભળ્યું કે કોઈ સ્ત્રીએ પુરુષ પર બળાત્કાર કર્યો કે પછી પાંચ-છ સ્ત્રીઓએ એક પુરુષ પર સામુહિક બળાત્કાર કર્યો !
સ્વાભાવિક છે કે આનો જવાબ 'ના' જ હશે... 
હમેંશા પુરુષો જ સ્ત્રીઓ પર બળાત્કાર કરતા આવ્યા છે અને આ પુરુષો કોણ છે તમે ઓળખો છો ?
મીડિયાવાળા કે છાપા વાળા તેમને દબંગ જાતિના કહેતા હોય છે આ દબંગ જાતિ એટલે કઈ જાતિ ?
તો જાણો...
જો તમે એવું માનતા હોય કે આ સૃષ્ટિની રચના બ્રહ્મા એ કરી છે (હું નથી માનતો) તો આ સૃષ્ટિ પર સૌથી પેલો બળાત્કાર બ્રહ્મા એ કર્યો હતો પોતાની જ દીકરી સરસ્વતી પર. (સરસ્વતી પુરાણ માં આવું લખેલું છે)
વિષ્ણુ અને ઇન્દ્રે પણ બળાત્કાર કરેલ છે એવા ઉલ્લેખ હિન્દૂ ધર્મ શાસ્ત્રો માં આવે છે.
તો આ દબંગ જાતિ આમની જ વંશજ છે.
જેમના પૂર્વજો એ વિશ્વમાં સૌથી પેલા બળાત્કાર કર્યા હોય અને એ પણ પોતાની જ દીકરી પર તેમના વંશજો સુધરે ખરા !?
રહી વાત સ્ત્રીઓની તો સ્ત્રી તો આ દેશની મૂળનિવાસી છે... મુળનિવાસીઓ ના લોહી કે સંસ્કાર માં આવા નીચ કામો આવે જ નઈ !
સ્ત્રીઓ માટે અમને સન્માન છે અને હંમેશા રહેશે...
સ્ત્રીઓ ને ગુલામીમાંથી આઝાદ કરાવનાર એવા નારીમુક્તિદાતા ડૉ. ભીમરાવ આંબેડકરને કોટી કોટી વંદન...
- સંજય પટેલ



















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डर, आस्था या अंधश्रद्धा ? - संजय पटेल

"डर" शब्द है तो बहुत छोटा लेकिन अगर इसे परिभाषित करे तो कह सकते है कि यह जीवन भर साये की तरह हमारे साथ चलता है और यह हमारी इच्छाशक्ति पर निर्भर रहता है कि हम इसे अपने से कितना दूर रह सकते है l डर कई प्रकार के होते है लेकिन मैं जिस डर की बात कर रहा हूँ वह है ईश्वर का डर l बहुत से लोग न चाहते हुए भी इस वजह से पूजा-पाठ नहीं छोड़ते कि कही उनका अनिष्ट न हो जाये पर क्या यह सच है ?
दूसरी बात हम अपनी किस्मत बदलने के चक्कर में मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाते रहते है लेकिन अगर मंदिर जाने से ही किस्मत बदल जाती तो आज मंदिरों की सीढ़ियों पर बैठने वाले भिखारियों की किस्मत पहले बदल जाती क्योकि वे भगवान के सबसे नज़दीक रहते है l आप ने यह भी देखा होगा कि मंदिर में चढ़ावे के सामान को देवी-देवताओं की मूर्ति तक पहुंचाने में 5 से 10 रुपये वह पर खड़े लोग वसूल लेते है l न देने पर हो सकता है आपको अपना चढ़ावा ठीक से न चढ़ा पायें l जाने अनजाने हम किसी और की तिजोरियां भरते जा रहे है यानि जो सदियों से हमें गुलाम बनाकर रखा और बाबा साहेब डा० अम्बेडकर जी ने हमें अपने संघर्ष से आज़ाद कराया l यह हमारी अज्ञानता का परिचय ही है कि हम यह नहीं समझ पाते कि जब वे लोग मंदिर में खड़े होकर पाप कर रहे है और कोई डर नहीं तो फिर हम घर में बैठ कर ईश्वर से क्यों डरते है l
इसके विपरीत अगर हम बौद्ध धम्म की बात करे तो वहां इस डर नाम की चीज़ नहीं मिलेगी क्योंकि बौद्ध धम्म आत्मा-परमात्मा को नहीं मानता l बौद्ध धम्म कहता है कि स्वयं की शक्ति पर विश्वास रखो और गौतम बुद्ध ने कभी अपने को ईश्वर की रूप में नहीं परिभाषित किया बल्कि उन्होंने अपने आपको मार्गदाता बताया और कहा कि मेरे बताये हुए रास्ते पर चलते है तो आप खुद का और समाज का हित कर सकते है इसी लिए युगपुरुष बाबा साहेब ने सभी धर्मों में बौद्ध धम्म को श्रेष्ठ माना और बौद्ध धम्म की दीक्षा ली l
प्यारे मित्रों हम सभी को जागरूक बनना पड़ेगा और लोगों को भी जागरूक करना होगा तभी हम देश में फैले पाखण्ड को मिटा सकते है l
- संजय पटेल



May 17, 2017

ब्राह्मण मुसलमान विरोधी घृणा आंदोलन क्यों चलाता है? - संजय पटेल

क्योकि ब्राह्मणवाद और बुद्धिज्म के टकराव के समय बहुत से बौद्धिष्ट मुसलमान बन गये थे उन्होंने ब्राह्मण धर्म को नहीं अपनाया था। ब्राह्मण जानता है कि आज भारत में जितने भी मुसलमान है वो सब मूलनिवासी है इसीलिए ब्राह्मण मुसलमानों के खिलाफ घृणा का आंदोलन चलाते रहता है ताकि ब्राह्मण किसी भी तरह मूलनिवासियों की एक शाखा को पूरी तरह खत्म कर सके।

अंग्रेजों के गुलाम ब्राह्मण था और उनके गुलाम मूलनिवासी थे। आज़ादी की जंग में आज़ादी के लिए आंदोलन करने वाले लोगों के सामने यह सबसे बड़ी समस्या थी। इसीलिए डॉ. भीम राव अम्बेडकर ने अंग्रेजों को कहा कि ब्राह्मणों को आज़ाद करने से पहले मूलनिवासी बहुजनों को जरुर आज़ाद कर देना चाहिए। अगर ब्राह्मण मूलनिवासियों से पहले आज़ाद हो गया तो ब्राह्मण मूलनिवासियों को कभी आज़ाद नहीं करेगा। ये आशंका सिर्फ डॉ. भीम राव अम्बेडकर के मन में ही नहीं थी बल्कि मुसलमान नेताओं के मन में भी थी। इसीलिए 14 अगस्त को पाकिस्तान बना। मुसलमानों ने अंग्रेजों को कहा कि गाँधी से एक दिन पहले हमे आज़ादी देना और हमारे बाद गाँधी को देना। अगर तुमने पहले गाँधी को आज़ादी दे दी तो गाँधी बनिया है हमको कुछ नहीं देगा। ब्राह्मणों ने अपनी आज़ादी की लड़ाई मूलनिवासियों को सीडी बनाकर लड़ी और वो अंग्रेजों को भगा कर आज़ाद हो गये।

DNA संशोधन से सामने आया कि ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य भारत के मूलनिवासी नहीं है। व्यवहारिक रूप से भी देखा जाये तो ब्राह्मणों ने कभी भारत को अपना देश माना भी नहीं है। ब्राह्मण हमेशा राष्ट्रवाद का सिद्धांत बताता आया है लेकिन खुद कितना देशभक्त है ये बात किसी को नहीं बताता। इसका मतलब एक विदेशी गया और दूसरा विदेशी मालिक हो गया, DNA ने सिद्ध कर दिया। दूसरे विदेशी ब्राह्मणों ने ये प्रचार किया कि भारत आज़ाद हो गया। लेकिन आज भी भारत पर ब्राह्मणों का राज है। इससे यह साबित होता है कि मूलनिवासियों को भविष्य में आज़ादी हासिल करने का कार्यक्रम चलाना ही पड़ेगा। DNA परिक्षण के आधार पर यह भी कहा जा सकता है कि आज भी देश के 130 करोड में से 32 करोड लोग बाकि 98 करोड़ लोगों पर राज कर रहा है। कल्पना करो कितना मुलभुत और महत्वपूर्ण संशोधन है।

- संजय पटेल



May 12, 2017

आस्था के नाम पर आप अपने आप को कब तक धोखा देते रहोगे ??? : संजय पटेल

दोस्तों आप मेरी सीधी भाषा से तो समझते नहीं है क्योकि आप सभी को रामायण और महाभारत जैसी कहानी सुनने की आदत जो हो गयी है... तो आइये आज मैं भी आपको एक कहानी सुनाता हु शायद आपको समझ आ जाये... 

आस्था या अंधश्रद्धा !???

  एक नई नवेली दुल्हन जब ससुराल में आई तो प्रथा के अनुसार उसकी सास बोली बहु कल माता के मन्दिर में चलना है बहू ने पूछा सासुमाँ एक माँ जिसने मुझे जन्म दिया वो है और एक माँ आप हो और कोनसी माँ है ?

सास बढ़ी खुश हुई की मेरी बहू तो बहुत सीधी है सास ने कहा बेटा पास के मन्दिर में दुर्गा माता है... नयी दुल्हन को माता के दर्शन करवाने की प्रथा है तो कल सुबह हम चलेगे ।

सुबह होने पर दोनों एक साथ मन्दिर जाती है आगे सास पीछे बहु । मन्दिर के पटांगण में गाय और बछड़े की एक पत्थर की मूर्ति थी और उस मूर्ति में से दूध गिर रहा था उसे देखकर बहु ने कहा माजी देखो ये गाय का दुध ऐसे ही गिर रहा है और बछड़ा ऐसे ही खड़ा है मै बाल्टी लाती हूँ और दूध निकालेंगे सास ने अपने सिर पर हाथ पीटा की बहु तो पागल है और बोली बेटा ये पत्थर की मूर्ति है ये दूध नहीं दे सकती ये दूध नकली है सफ़ेद चुने का पानी है।
चलो मन्दिर में... जैसे ही प्रवेश किया तो एक शेर की मूर्ति दिखाई दी फिर बहू ने कहा माँ आगे मत जाओ ये शेर खा जायेगा सास को चिंता हुई की मेरे बेटे का तो भविष्य खराब हो गया और बोली बेटा पत्थर का शेर कैसे खायेगा चलो अंदर चलो.. मंदिर में प्रवेश करके सास बोली बेटा ये माता है और इससे मांग लो बहू ने कहा माँ ये तो पत्थर की है ये क्या दे सकती है ?
जब पत्थर की गाय दूध नही दे सकती... पत्थर का बछड़ा दूध नही पी सकता... पत्थर का शेर खा नही सकता तो ये पत्थर की मूर्ति क्या दे सकती है ?

अगर दे सकती है तो वो आप है... आप ही मेरी माँ है आप मुझे आशीर्वाद दीजिये तब सास की आँखे खुली अउर अपनी बहु को गले लगा लिया...
तो साथियो वो बहू पढ़ी लिखी थी क्या आप भी पढ़े लिखे है ???

"दुनिया में अगर कोई सबसे बड़ा धोखा है तो, वो है अपने आप को धोखा देना और आस्था के नाम पर आप अपने आप को कब तक धोखा देते रहोगे ???"

जागो दोस्तों जागो... अन्धविश्वास भगाओ... देश बचाओ...
- संजय पटेल
















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आरक्षण का विरोध करनेवाले लोग बिना तथ्य और जूठी बातो से लोगो को भरमाते है : संजय पटेल

आरक्षण का विरोध करनेवाले लोग बिना तथ्य और जूठी बातो से लोगो को भरमाते है की 40%  वाले को क्वॉटा से मेडिकल और इंजीनियरिंग में एडमिशन मिल जाता है और 90% वाले General Candidate को नहीं मिलता और लोग भी बिना सोचे समझे उनकी बातो को सच मानकर उनके साथ भेड़-बकरियो की तरह पीछे लग जाते है मगर पहले सच तो जानलो...

40 % वाले को एडमिशन मिल जाता है, मगर वो OBC,  SC या ST वाले को नहीं General वाले को मिलता है।
मैनेजमेंट कोटा और NRI कोटा जैसे आरक्षण में General Candidate 35% में भी एडमिशन लेते है... आज तक उनका तो कोई विरोध नहीं हुआ... क्या ये आरक्षण नहीं है ?
समृद्ध समाज के गरीब लोग ये विरोध क्यों नहीं करते ???
और आरक्षण कोई गरीबी मिटाने का साधन नहीं है जो सबको मिल जाता है। आरक्षण जाती आधारित था, है और रहेगा... जब तक भारत में जातीया रहेगी।
आरक्षण सामजिक व्यवस्था को समान करने के लिए रखा गया एक अधिकार है।

गरीबी मिटाने के लिए सरकार ने BPL कार्ड योजना दे रखी है तो कृपिया आरक्षण को गरीबी से न जोड़े तो अच्छा है।
तुम चाहे इसे बैसाखी कहो ! 
तुम चाहे इसे भीख कहो ! 
तुम चाहे इसे जातिवाद कहो ! 
तुम चाहे जो कहो. कुतर्क करो. पर ?? ?
जब तक हर जगह हमारे जनसंख्या के हिसाब से लोग पर्याप्त जगह नहीं पा लेते तब तक हम आरक्षण लेते रहेंगे....
तुम गरीबी का झूठा रोना मत रोओ, 
जाओ बीपीएल कार्ड बनवाओ ! 
बच्चों को कटोरा देकर सरकारी स्कूल भेजो. 
मंहगा इलाज नहीं करवा सकते, सरकारी अस्पताल में लाइन लगाओ ! 
नरेगा में फावड़ा चलाओ ! 
दैनिक मजदूरी करो ! 
हजारों NGO हैं, वहां गिङगिङाओ...
लोहा रद्दी अखबार टीना खरीदो. 
पंचर दुकान खोलो 
स्टेशन पर जूते पालिश करो ...
गरीबी दूर होगी. .तुम्ही तो कहते हो भगवान भी उसी की मदद करते हैं, जो अपनी मदद खुद करता है. तो करो !
और वैसे भी तुम लोग तो यही कहते हो की शूद्र में जन्म लेना या अछूत में जन्म लेना वो तो पूर्व जन्म और कर्मो के आधीन है तो फिर ये आरक्षण को भी उसी कर्म के आधीन ही रखो।
आरक्षण का विरोध करनेवालो विरोध करना है तो सरकार से ये करो की सेल्फ फाइनेंस कॉलेजो का धंधा बंध करो और सरकारी कॉलेज की संख्या बढ़ाओ...
आज भी कई सेल्फ फाइनेंस कॉलेज में सीटे खाली पड़ी है ।
बरसो से जो सरकारी नोकरियो की भर्तीया बंध की है उस खाली जगहों को भरो।
किसीको अनामत मांगने की जरुरत नहीं पड़ेगी और वैसे भी 74 % SC/ST/OBC को सिर्फ 49% ही आरक्षण है जब की 15 % General को 50 % है।
सरकार से अधिकार मांगो... आम जनता को अफवाह और जूठी बाते बोलकर जातिवाद की राजनीति खेलना बंध करो।

जातिवाद भगाओ... देश बचाओ...
#जातिवाद_एक_रोग
- संजय पटेल




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दलित हिन्दुओ को कोई हक़ नहीं है कि वो बुद्धिस्ट के नाम पे गर्व ले : संजय पटेल

पिछले कई दिनों से बार बार मेरे ध्यान में आ रहा है कि सोसिअल मीडिया पे हमारे लोग मनुवादियो के खिलाफ पोस्ट लिखते रहते है।
यह बहोत अच्छी बात है मगर कई पोस्ट में हमारे लोग यह दावे के साथ गर्व करते रहते है कि

  • आयुर्वेद की खोज हमारे बुद्धिस्ट लोगों ने की थी,
  • नालंदा की स्थापना हमारे बुद्धिस्ट लोगो ने की थी,
  • मार्शल आर्ट और कराटे की विद्या बुद्धिस्ट भन्ते की देन है,
  • योग विद्या हमारे बुद्धिस्टो की खोज है,
  • इस भारत के एक ही महान सम्राट है और वह है सम्राट अशोक और वह बुद्धिस्ट थे,
  • पूरी दुनिया में भगवान-माताजी को कोई नहीं जानता मगर बुद्ध को पूरा विश्व जानता है,
  • मनुवादीओ के साथ डिबेट करने में हिन्दू देवी-देवता की तो ऊपर से नीचे एक कर देते है और बुद्ध को ही श्रेष्ठ बताते है !


ऐसी कई सारी बातें लिखकर यह हमारे हिन्दू दलित लोग ब्राह्मणों को निचा दिखाने के लिए बुद्धिस्ट का सहारा लेते है और जब धर्मान्तरण की बात आए तो बुद्धिस्टो की खोज पे गर्व लेनेवाले यही लोग को सांप सूंघ जाता है।
मनुवाद-ब्राह्मणवाद से आझादी चाहिए के नारे लगानेवाले लोगो को किसने जकड़ कर रखा है यह हिन्दू धर्म में ?
क्या किसी ब्राह्मणने आपको बाँध के रखा है उनके इस हिन्दू धर्म में ? तो रास्तों पे जाकर चिल्लाते रहते हो... हमें चाहिए आजादी...
आझाद होना है तो निकलो न इस धर्म से... निकलो न इस मनुवाद से...
मगर यह हिन्दू दलित लोगो को यह माता-महादेव अपने घर से निकलते नहीं !

जब तक आपका यह दोगलापन रहेगा तब तक आप दलित ही रहेंगे और जब तक दलित रहोगें तब तक आप पे जुल्म होते रहेंगे। #जातिवाद_एक_रोग_है ऐसा ट्रेंड करते रहते है हमारे लोग मगर जाति को तोड़ने के लिए क्या आपने कोशिश की ? अगर जातिवाद को तोड़ना है तो एक ही ट्रेंड लाना होगा... #चलो_बुद्ध_की_ओर

दलित हिन्दुओ को कोई हक़ नहीं है कि वो बुद्धिस्ट के नाम पे गर्व ले !
अभी भी वक्त है बाबासाहेब के दिखाए हुए धम्म में आकर बाबासाहब का सपना #प्रबुद्धभारत बनाने का... वैसे तो बाबासाहेब के कई ऋण है हमारे पर जिसे हम कभी भी उतार नहीं पाएंगे मगर एक ऋण का उधार उतारो और अगर समाज में एकता लानी है तो बाबासाहेब ने जो रास्ता दिखाया है उस पर चलना पड़ेगा...
नामांतरण करो...
स्थळांतरण करो...
धर्मांतरण करो...

जय भीम
नमो बुद्धाय
-संजय पटेल
























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May 08, 2017

हम कब सुधरेंगे ??? : संजय पटेल

हम बस सिर्फ चिल्लाते ही रहते है... कुत्तों की तरह भौंकते ही रहते है, सरकार ने ये कर दिया, सरकार ने वो नहीं किया, मनुवादियों ने ये किया, मीडिया ने ये किया...

क्या बोलने की सिवा हमने कभी प्रयास किए ?
हमारा कोई मीडिया शुरू होता है तो हमारे लोग ही सपोर्ट नहीं करते है और मनुवादी मीडिया के ऊपर चिल्लाते रहते है कि हमारी खबर नही दिखाता, वो क्यों दिखाएंगे हमारी बात या हमारा सच ? बनाओ खुद का मीडिया और दिखाते रहो पूरे दिन अपनी बात... है हैसियत ??? या सिर्फ बातें ही करनी है ?
सरकार ने वेबसाइट से बाबासाहेब के वॉल्यूम हटा दिए... तो खुद अपनी साइट बनाओ और डालो न सभी बुक किसीने आपको मना किया है ?
सरकार अब बाबासाहेब के वॉल्यूम नहीं छापती... अरे भाई हमारे कितने सारे प्रकाशन है जो बाबासाहेब के सभी वॉल्यूम छापती है कभी आपने खरीदे ?
सरकार ये अन्याय कर रही है वो अन्याय कर रही है बोलते रहते है मगर आपने कभी खुद की सरकार बनाने के प्रयास किए ???
सवर्ण जाति ने दलितों पर अत्याचार किया, जुल्म किया आदि आदि... क्या आपने कभी उनको चमत्कार दिखाया ?
निर्भया कांड में फांसी की सजा हुई तो डेल्टा कांड में क्यों नहीं ये सवाल हम सोसिअल मीडिया पे करते है मगर दिल्ली में जो निर्भया के लिए कैंडल मार्च हुआ था ऐसा मार्च कभी हमने किया ?
न्यूज़ पेपरवाले ने हमारी ये खबर नहीं छापी उसका बहिष्कार करो... मगर क्या हमने कभी ये प्रयास किये की हमारा खुद का दैनिक पेपर निकाले और उसमें हमारी पूरी खबरे छाप दे !
बस सिर्फ बातें ही करनी हैं, काम नहीं...
बाबासाहेब को मानते है मगर उनकी बातों को नही...
जब तक संगठित नहीं होंगे तब तक बस हमारी औकात गली के कुत्तों के जैसी ही रहेगी। कब सुधरेंगे हम ? कब समझेंगे हम ?
अगर सफल होना है और आगे बढ़ना है तो संगठित होना पड़ेगा... अभी भी वक्त है संगठित हो जाओ अन्यथा सहारनपुर में जो 25 घर जले है वैसे हररोज हर गांव में जलेंगे।
पहले जातिवाद ने हमें तोड़कर रखा था... हमे एक नहीं होने दिया और आज यह संस्था वाद ने हमें तोड़ दिया है। जातिवाद, संस्थावाद और अपना अहम छोड़ो और एक हो जाओ... यह अस्तित्व की लड़ाई है जो हम सभी को साथ मिलकर लड़नी पड़ेगी।
हमारे लोगों को मदद करो... प्रोत्साहित करो... हमारे युवाओं को आगे बढ़ाओ...
- संजय पटेल


May 07, 2017

भगवान सिर्फ एक अंधविश्वास !! - संजय पटेल


लोग कहते हैं कि कण कण मे भगवान है..  अगर कण कण मे भगवान है तो कण कण मे भ्रष्टाचार क्यों है ? अगर जर्रे जर्रे मे भगवान है और बगैर भगवान की मर्जी के पत्ता भी नही हिलता, तो क्या भगवान ही कत्ले आम करवाता है ? जब सब कुछ भगवान की मर्जी से होता है तो भगवान बलात्कार भी करवाता होगा ? डकैती भी डलवाता होगा ?अगर यह सब भगवान ही करवाता है तो,

 कितना निर्दयी है भगवान !

लोग कहते हैं कि भगवान गरीबो, मजलूमों, असहायों की रक्षा करता है। तो भारत की आधे से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने के लिए मजबूर क्यों है ? भगवान क्यों नही इन्हें अमीर बना देता? दुनिया मे हर कहीं असहाय, मजलूम ही प्रताडित हो रहा है, भगवान क्यों नही इनकी मदद करता ?

लोग कहते है कि भगवान दुष्ट, चोर,गुण्डो को सजा देता है। तो फिर जगह जगह चोरी डकैती, गुण्डागर्दी क्यों हो रही है ? अगर भगवान इनको रोकने मे सक्षम है तो पुलिस ,सेना, कोर्ट कचहरी क्यों है ?

सच यह है कि भगवान कुछ नही कर सकता। आज तो भगवान की खुद शामत आ गयी है।

आंतकवादी मंदिर, मस्जिद,चर्च देखकर ब्लास्ट कर रहा है.. भगवान अपनी बचत नही कर पा रहा है। भगवान की अष्टधातु मूर्तियों को चोर चुरा कर अंतर्राष्ट्रीय बाजार मे बेंच कर करोडो कमा रहा है, भगवान अपनी रक्षा नही कर पा रहा है।

कितना बेबस है भगवान!

लोग कहते है कि भगवान दूसरो को पवित्र बनाता है, अपने दर्शन से। लेकिन यह भगवान दलितों के छूने से ही छुईमुई के पौधे की तरह खुद सिकुड जाता है । दलित के छूने से अपवित्र हो जाता है । और फिर गाय, भैंस, बकरी की पाखाना, पिसाब से पवित्र हो जाता है।

कैसा भगवान है!

भगवान जब सबसे ताकतवर है तो उसकी सिक्युरिटी मे पुलिस , कमाण्डों , सेना क्यों लगायी जाती है ? किसी भी धार्मिक स्थल पर जाइए, वहां गेट पर सबसे ज्यादा लूले, लंगडे, अपाहिज, कोढी लाइन लगाये रहते है.. अंधे को आंख देत ,कोढिन को काया वाला भगवान कहां रहता है, क्यों नही इनकी समस्या दूर कर देता है ?

किसी ने कहा है कि "इंसान को बनाकर भगवान ने सबसे बडी गलती की या भगवान को बनाकर इंसान ने।" उत्तर साफ है कि "भगवान को बनाकर इंसान ने सबसे बडी गलती की।" अगर इंसान ने भगवान की कल्पना नही की होती तो इसके नाम पर इतना ज्यादा लुटता, पिटता नही ।

- संजय पटेल