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July 06, 2017

सबसे सुंदर हसीन कल्पना : आत्मा-परमात्मा , भाग - 3

By Sanjay Patel Bauddha




भाग-2 में हमने आत्मा के अस्तित्व पे जो खंडन किया उसको आगे बढ़ाते अगर देखे तो आत्मा विषयक जंगली विश्वास जो गीता ने प्रचारित किया है, इसने भारत का बेड़ा गर्क किया है । आत्मा की यह जंगली कल्पना पूर्णतः भ्रामक है, असत्य है, अनुभव शून्य है तथा वैज्ञानिक घेरे के बाहर है। इसी संदर्भ में डॉ. अज्ञात एक मेडिकल ऑपेरशन का वर्णन करते हुए कहते है-
"सन 1976 ईसवी में मद्रास में जो एक ऑपेरशन हुआ, उससे आत्मा विषयक रही सही शंका भी समाप्त हो गई। दिनांक 15.03.1976 के वीर प्रताप (हिंदी दैनिक) में छपी विस्तृत रिपोर्ट में कहा गया है, तीन वर्ष तक के बच्चे के दिल की बनावट के दोष दूर करने के लिए एक नई ऑपेरशन विधि 1967 में जापान में विकसित की गई थी। इसके सफल प्रयोग न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में हो चुके है। भारत मे ऑस्ट्रेलिया के डॉक्टरों की देखरेख में उस वक्त के पैराम्बूर रेलवे अस्पताल मद्रास के डायरेक्टर टी. जे. चेरियन और सर्जन के. एस. चेरियन ने ऐसे चार ऑपेरशन किये है।
ऑपेरशन से पहले बच्चे के शरीर मे से खून निकाल लिया जाता है और शरीर का तापमान सामान्य 37℃ से कम करके 18℃ पर लाकर उसका ऑपेरशन किया जाता है, जिसमे एक घंटा 10 मिनट तक समय लग जाता है। हृदय की बनावट को ठीक करके उसे शरीर मे स्थापित किया जाता है। ऑपेरशन के बाद शरीर मे फिर खून डाला जाता है। कुछ मिनिटों के बाद बच्चा जी उठता है।
यदि आत्मा हो तो 70 मिनट तक बच्चा मृत नही रहना चाहिए। जब उससे खून निकाल लिया जाता है, तब भी तो आत्मा वहीं रहेगी ? फिर बच्चा जीवित क्यों नहीं रहता ? जब 70 मिनट के बाद खून डालकर पुनः तापमान सामान्य कर दिया जाता है, तब आत्मा कहां से आ टपकती है, जो बच्चा जीवित हो जाता है?
स्पष्ट है कि सारा खेल भौतिक तत्वों का ही है। उनमें जब गड़बड़ी होती है जीवन उससे प्रभावित होता है। उसमें आत्मा जैसी काल्पनिक चीजों की कोई भूमिका नहीं।" 
ठीक ऐसा ही एक उत्तर भंते नागसेन ने सम्राट मिलिंद को दिया था। भंते नागसेन ने कहा था, शरीर मे यदि आत्मा ही मूलभूत है तो आंखों के निकाल देने पर बड़े-बड़े गड्ढ़े हो जाने पर तो और ज्यादा देखेगी। कानों के पर्दो में बड़े-बड़े छेद कर देने पर तो और ज्यादा सुनेगी। नाक में बड़े-बड़े छेद कर दिए जाए तो और ज्यादा सूंघेंगी। जीभ को जड़ से उखाड़ लेने पर बड़े छिद्र होने पर तो आत्मा और ज्यादा स्वाद ले सकेगी। यह सारा अनुभव आत्मा का नहीं, मन के द्वारा है। अतः आत्मा की कल्पना गपोड़संखियो की है, जिससे भारत के लोग गुमराह हो गए है। आत्मा नही है, यह असलियत ब्राह्मण भी जानता है, लेकिन उसमें यह हिम्मत नहीं कि वह इस प्रकार का प्रचार कर सके, क्योंकि वह जानता है ऐसा करने से उसके पुरखों के जमाने से जो हराम का हलवा माड़ा मिल रहा है, उसमे कमी आ जायेगी। ब्राह्मण भली प्रकार जानते है कि जितना ज्यादा अंधविश्वास होगा, जितनी ज्यादा अविद्या होगी और जितना ज्यादा अज्ञान होगा, दूसरों के द्वारा उतना ही ब्राह्मण पूज्य, प्रशंसित एवं सम्मानित होगा। यही कारण है यह वर्ग सदैव परिवर्तन का कट्टर विरोधी रहा है और अंधविश्वासों का समर्थक रहा है।
यह तीन भागों के वांचन के बाद आप उतने तो समर्थ हो ही चुके होंगे और आपकी तर्क शक्ति और वैज्ञानिक दृष्टि से आप इतने तो पक्के हो ही गए होंगे कि आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है। जब आत्मा ही नहीं तो परमात्मा (ईश्वर) किस खेत की मूली है !

(पढ़ते रहिएगा... अगर आत्मा ही नहीं है तो परमात्मा कैसे ?... आगे जारी रहेंगे। पढ़ेगा इंडिया... तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया। भाग - 4 जल्द ही आपके सामने प्रस्तुत होगा।)

संदर्भ:
1. गीता की शव परीक्षा - डॉ. अज्ञात
2. भारत की गुलामी में गीता की भूमिका - आचार्य भद्रशील रावत
3. फ़ोटो - गूगल

सबसे सुंदर हसीन कल्पना : आत्मा-परमात्मा , भाग - 2

By Sanjay Patel Bauddha



निरर्थक एवं शरारती बातों में एक नाम आता है, आत्मा का। 
"आत्मा विषयक अन्य कई बातों की तरह गीता का यह सिद्धांत भी गलत और भ्रांत है। यदि सब के अंदर अनुभव करनेवाली एक ही आत्मा है, तब एक के पानी पीने पर सबको संतुष्टि अनुभव क्यो नही होती ? यदि सबके अंदर एक ही ज्ञाता है तो फिर अर्जुन को उपदेश क्यों दिया गया ? उसे स्वतः ही कृष्ण का ज्ञान क्यों नहीं प्राप्त हुआ ? यदि सबके अंदर एक ही आत्मा है तो फिर गाय के आगे चारा और शेर के आगे मांस क्यों परोसा जाता है ? बिल्ली चूहे क्यों खाती है और वैष्णव प्याज से परहेज क्यों करते है ? गीता की सबके अंदर एक ही आत्मा होनेवाली बात बिलकुल गलत है।"
गीता कहती है कि आत्मा का विभाजन नहीं होता। 
"गीता के आत्मा विषयक ये उदगार नितांत काल्पनिक है। केंचुए को मध्य से काट दो तो दो सजीव केंचुए बन जाते है। ऐसे में क्या केंचुए के बीच की आत्मा दो शरीरों में आधी-आधी होकर नहीं चली जाती ? छिपकली की पूंछ काट देने पर कटी हुई पूंछ काफी समय अलग पड़ी तड़पती रहती है। क्या यह छिपकली की आत्मा का अंश ही पूंछ में नहीं तड़पता ? ऐसे में आत्मा के बारे में यह कहना कि इसे शस्त्र नहीं काट सकते, सरासर गलत है। अगर कथित आत्मा न कटती तो केंचुए का कटा भाग और छिपकली की कटी पूंछ दोनों ही निष्क्रिय होकर पड़े रहते। यदि आत्मा को अग्नि जला नही सकती, पानी इसे भिगों नहीं सकता और हवा इसे सूखा नहीं सकती, यदि यह फायरप्रूफ, वाटरप्रूफ और एयरप्रूफ है तो यह आत्मा बिजली के करंट वाली तार के शरीर से छू जाने पर शरीर से क्यों निकल भागती है ? पानी में डूबने से वह क्यों निकल भागती है ? अधिक गर्मी से लोग क्यों मरते है ?"
गीता कहती है कि आत्मा नया शरीर धारण करती है।
"आत्मा विषयक यह सिद्धांत भी असत्य है। यदि मृत्यु का अर्थ एक पुरानी कमीज को छोड़कर नई कमीज पहनने के समान ही होता, तो हर कोई मृत्यु के प्रति उसी तरह उत्साहित और उत्कंठित होता जैसे प्रत्येक व्यक्ति को नई कमीज का चाव व उत्साह होता है। लेकिन देखने मे इसके बिलकुल उलट मिलता है कोई भी प्राणी मरना नहीं चाहता । कोई भी इस पुरानी कमीज को छोड़ना नहीं चाहता।
जो छोटे बच्चे, बलिष्ठ युवक युवतियां हार्टफेल हो जाने से मर जाते है, उनके शरीर तो जीर्ण नहीं हुए होते, वे तो पुराने नहीं हुए होते, फिर उन्हें आत्मा क्यों छोड़ जाती है ? उधर बहुत से कुष्ठ रोगी घूमते फिरते है, उनके शरीर पूरी तरह और बुरी तरह जीर्ण हुए होते है, लेकिन उनकी आत्मायें उन्हें नहीं छोड़ती। ....असलियत यह है कि दुनिया में आत्मा नामक कोई चीज है ही नहीं।"
(पढ़ते रहिएगा... आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व को नकारने उदाहरणों के साथ आगे जारी रहेंगे। पढ़ेगा इंडिया... तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया। भाग - 3 जल्द ही आपके सामने प्रस्तुत होगा।)

संदर्भ:
1. गीता की शव परीक्षा - डॉ. अज्ञात
2. भारत की गुलामी में गीता की भूमिका - आचार्य भद्रशील रावत
3. फ़ोटो - गूगल


June 28, 2017

गीता रहस्य : भाग - २




By Sanjay Patel Bauddha

गीताकार कृतज्ञ नहीं है !
ऐसा प्रतीत होता है की गीताकार कृतज्ञ नहीं है! वह कृघ्नता के साथ-साथ ईमानदार भी नहीं है। उसने गीता में जहा से सामग्री चोरी की है, उस सामग्री के स्रोत को न बताकर गीता को मौलिक कृति बनाने की घृष्टता की है। संस्कृत साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. सुरेंद्र कुमार शर्मा कहते है की, "गीता यध्यपि एक स्वतंत्र पुस्तक है तथापि उसमे बहुत कुछ पहले विद्यमान वांगमय से लिया गया है। इसमें महाभारत के २७ पुरे श्लोक, कही कही अक्षरशः और कही थोड़े परिवर्तन से मिलते है।

ऐसे ही कठोपनिषद के ७ श्लोक गीता में अक्षरशः व कुछ परिवर्तन के साथ मिलते है श्वेताश्वतर उपनिषद के भी बहुत से श्लोक और भाव गीता में मिलते है। गीता के दूसरे अध्याय का आत्मा का वर्णन, आठवें अध्याय क अक्षर-ब्रह्म वर्णन और १३वें अध्याय के क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विचार अक्षरशः उपनिषदों से लिया गया है।

और भी बहुत सी पुस्तकों के भाव, शब्द और श्लोक गीताकार ने लिए है। उसने एक सभ्य लेखक की तरह उनके मूलस्रोतो का उल्लेख नहीं किया, बल्कि अपनी मौलिकता सिद्ध करने की उच्चाकांक्षा के वशीभूत होकर हर एक उठाए श्लोक व भाव को ऐसे पेश किया है, मानो वह उसकी अपनी रचना हो। आज अगर गीताकार ऐसा करता, शायद कॉपीराईट-कानून के अधीन जेल की हवा खाता। गीताकार के इस पक्ष की ओर विद्वानों ने ध्यान दिया है और सख्त टिप्पणियां भी की है।

लेकिन इस बात की ओर बहुत कम लोगो ने ध्यान दिया हैं की गीताकार ने बौद्ध वांगमय से भी बहुत कुछ उठाया है- कही भाव, कही उपमाएं और कही पारिभाषिक शब्दावली। यह अलग अलग बात है की उसने कही-कही मूल शब्दों को वह अर्थ में प्रयोग किया है, जो उनका असल में अर्थ नहीं है।
दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञ के विषय में १८ श्लोको में जो कुछ कहा है, ठीक वही कुछ बौद्ध वांगमय के सुत्तनिपात १८ गाथाओ में अंकित है।
गीता के अध्याय १२ में सच्चे साधक के जो गुण बताए गए है, वे बुद्धिज़्म से लिए गए है। इन्हे बौद्ध वांगमय में 'भावना' कहते है। भावना में चार ब्रह्मविहार होते है। वे निम्नलिखित है - करुणा, मैत्री, मुदिता और उपेक्षा।

गीता का १६वां अध्याय 'धम्मपद' और 'सुत्तनिपाद' पर पूरी तरह आधारित है। गीता में 'निर्वाण' शब्द बौद्ध धर्म से लिया गया है, क्योंकि वेदों, ब्राह्मण ग्रंथो तथा उपनिषदों में यह 'निर्वाण' शब्द कहीं नहीं है। गीताकार ने इसमें ब्रह्म शब्द जोड़कर इसे ब्राह्मणवादी शिक्षा बनाने की कोशिश की है। गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक ४० से ७२ तक ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करने के जो पांच सोपान बतलाए है, वे ये हैं- श्रद्धा, व्यवसाय, स्मृति, समाधी, प्रज्ञा। यही पांच सोपान आरंभिक बुद्धिज़्म में बतलाए गए है।
गीता का १७वा अध्याय तप के वर्गीकरण से संबंधित है। कृष्ण ने अपनी पूरी जिंदगी में कही तप नहीं किया या फिर कही पे भी कृष्ण के तप का वर्णन नहीं है तो फिर कृष्ण के पास तप का ज्ञान कैसे आया ? यह बुद्ध द्वारा तपस्या के विभिन्न वर्गों के विषय में प्रकट किये विचार है। गीता में विराट दर्शन भी कुछ कुछ बुद्ध तथा मार विजय की नक़ल है।

गीताकार ने बौद्ध संस्कृति और दर्शन के प्रचलित शब्दों को बहुत स्थानों पर अपना अर्थ देने की शरारतपूर्ण कोशिश की है। इसका उद्देश्य वही था, जो मछली पकड़ने के लिए फेंकी गई कंटिया के आगे लगे मांस का होता है, यानि बौद्ध विचारो से प्रभावित लोगों को इन शब्दों से आकृष्ट कर ब्राह्मणवादी शिक्षाए दिमागों में भरना।

हिन्दू वांग्मय के विद्वान् तथा भारतीय संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर का कहना है की, "गीता ने 'निर्वाण' सिद्धांत कहा से लिया ? निश्चय ही यह सिद्धांत उपनिषदों से नहीं लिया गया है क्योंकि किसी भी उपनिषद में 'निर्वाण' शब्द का उल्लेख नहीं है। यह बौद्ध धर्म से ली गई है। यदि इस संबंध में किसी को संदेह हो तो उसे भगवद्गीता के ब्रह्मनिर्वाण की तुलना बौद्ध धर्म की निर्वाण संबंधी अवधारणा से करना चाहिए जिसका विवेचन महापरिनिब्बान सुत्त में किया गया है।

गीता में भावना, कर्मयोग, लोक संग्रह, योगक्षेम, शब्द गीताकार ने बौद्ध धर्म से चुराये है। अतः डॉ. सुरेन्द्र कुमार अज्ञात का कथन शाट-प्रतिशत सही है की "बुद्ध और बुद्धिज़्म की शिक्षाओं का मुकाबला करने के लिए ब्राह्मणो ने अपने ग्रंथो की नए ढंग से व्याख्या शुरू की। कई नये ग्रंथो की रचना की और नायको और देवताओ को नए रूप में पेश किया। ब्रह्मसूत्र ऐसे ग्रंथो में मुख्य था। लेकिन वह सर्वजन सुगम नहीं था। अतः एक सरल ग्रन्थ था भगवद्गीता जिसमे बुद्ध के स्थान पर कृष्ण को स्थापित किया गया। "

संदर्भ:
1. गीता की शव परीक्षा - डॉ. सुरेन्द्र अज्ञात
2. भारत की गुलामी में गीता की भूमिका - आचार्य भद्रशील रावत
3. बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय, खंड - 7 - डॉ. आंबेडकर



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June 27, 2017

गीता रहस्य : पढ़ेगा इंडिया , तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया

By Sanjay Patel Bauddha
सूचना: जिस किसीकी आस्था-श्रद्धा कमजोर हो वह न पढ़े और अगर फिर भी पढ़ते है और उनकी कमजोर आस्था-श्रद्धा को ठेस पहुंचे तो इसके जिम्मेवार वह खुद रहेंगे ।

भारत के कुछ कुर्सी तोड़ विद्वान भोलेभाले लोगों को यह कहकर गुमराह किया करते है कि आज से लगभग 5-6 हजार वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ था, जिसमें गीता समाहित है... मगर आज यहा कई किताबों के रेफरेंस और अध्ययन से इस बात का खंडन करेंगे...
कहते है कि अपराधी अपने पीछे अपराधपन का कोई न कोई प्रमाण अवश्य ही छोड़ जाता है ! ऐसी ही कुछ प्रामाणिक बातें गीताकार ने भी छोड़ी है । गीता का लेखक अपने घर में बैठकर गीता लिख रहा है। वह गीता के 18वें अध्याय के श्लोक 70 में कृष्ण के मुंह से कहला बैठता है -

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादभावयो: ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति: ।
अर्थ: जो कोई हम दोनों के संवाद रूप इस 'धर्म' को पढ़ेगा तो मेरा मत है कि उसके ऐसा करने से मैं ज्ञान यज्ञ द्वारा पूजित होऊंगा ।

गीताकार ने जो 'अध्येष्यते' शब्द का प्रयोग किया है; यहीं पर वह पकड़ा गया है। सभी जानते है कि युद्ध के समय कृष्ण और अर्जुन में मौखिक वार्तालाप हो रहा था और मौखिक वार्तालाप में 'अध्येष्यते' का प्रयोग सरासर गलत है। गीताकार स्वयं भूल गया था कि कृष्ण और अर्जुन का मौखिक वार्तालाप है। इसीलिए भूलवश वह 'अध्येष्यते' (पढ़ेगा) का प्रयोग कर बैठा। 'पढ़ेगा' का अर्थ है कि गीताकार घर में जो पोथी लिख रहा है, उसे भविष्य में कोई पढ़ेगा (=अध्येष्यते) अतः गीता का संबंध वास्तव में किसी युद्ध से न होकर वह तो केवल गीताकार की घर में बैठे ही बैठे कोरी कल्पना ही है ।
कहते है कि कृष्ण ने समय को भी रोक दिया था, अर्जुन और कृष्ण के अलावा सब रुक गया था तो फिर गीता लिखी किसने ? न अर्जुन ने न कृष्ण ने तो यह तीसरा कहा से आया ?
गीता की रचना कब की गई है, इसका प्रमाण स्वयं गीता में ही मिल जाता है! प्रसिद्ध इतिहासकार धर्मानंद कोसंबी ने खोज करके बताया है कि बालादित्य राजा के राज्यकाल (5वीं शताब्दी) में वादरायण या उसके किसी अज्ञात नामा शिष्य ने इसकी रचना की होगी ।
"गीता की भाषा 500 ईशवी पूर्व वाली नही है । यह भाषा बहुत कुछ आधुनिक संस्कृत जैसी है । यह कालिदास के काफी निकट है । फिर इसमें बौद्ध दर्शन के 'निर्वाण' आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है । इससे स्पष्ट है कि यह बुद्ध के बाद कि रचना है।
गीता का समय निश्चित करने में स्वयं गीता काफी मदद करती है। अध्याय 13 के श्लोक 4 में 'ब्रह्मसूत्र' पदों का उल्लेख है। ब्रह्मसूत्रों में बुद्ध दर्शन के चारों संप्रदायों वैभाषिक, सौत्रान्त्रिक, योगाचार और माध्यमिक का खंडन है। योगाचार का विकास असंग और वसुबंधु नाम के भाइयों ने सन 350 ईशवी के आसपास किया । इसके 40-50 वर्ष बाद ही योगाचार इतना प्रसिद्ध हुआ कि इसके पृथक खंडन की जरूरत पड़ी। स्पष्ट है, सन 400 ईसवी के बाद ही ब्रह्मसूत्रों की रचना हुई। लगभग इसी समय वादरायण हुआ जिसका शंकर की गुरु परंपरा में आदि स्थान है- वादरायण, उसका शिष्य गोविंद भागवदपद और उसका शिष्य आदि शंकराचार्य (जन्म 788 ईसवी) शंकर के जन्म से दो-ढाइसो वर्ष पहले कहीं हुआ होगा।
गीता की रचना बौद्ध धर्म के विकास के बाद ही हुई है। बौद्ध धर्म से मुकाबला करने के उद्देश्य से ही किसी अल्प विद्वान ने इसकी रचना घर मे बैठकर की है। पांचवी शताब्दी के आसपास बौद्ध धम्म उच्च शिखर पर था। उस समय के वर्णाश्रम धर्म के मुकाबले में बौद्ध धम्म श्रेष्ठ माना जाता था। जो गंदगी, दलदल, अनैतिकता तथा अंधविश्वास वैदिक धर्म में थे, बौद्ध धम्म इन सबसे मुक्त था। इसीलिए लोग पुराने दलदल को छोड़कर बौद्ध धम्म अंगीकार कर रहे थे। इस धर्म परिवर्तन को रोकना गीताकार का मूल उद्देश्य था। गीताकार यह भी जानता है कि वैदिकधर्म गुण रहित है और बौद्ध धम्म गुण श्रेष्ठ है। इसीलिए बौद्ध धम्म से वह भयभीत है। तभी तो गीताकार को कहना पड़ता है -

श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: || (गीता, अध्याय 03/35)
अर्थ: अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है । अपने धर्म में तो मरना भी कल्याण कारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है ।।
गीताकार इतना डरा हुआ प्रतीत हो रहा है कि गीता के इस श्लोक को उलट फेर करके गीता अध्याय 18 के श्लोक 47 में उसी बात को फिर दोहरा बैठता है-

श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् || 47||
अर्थ: अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है ;क्योंकि स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता ।। ४७ ।।

इन दोनों श्लोकों पर सोचा जाए तो पता चलता है कि, अगर मान लिया जाए कि सृष्टि का सबसे पुराना धर्म हिन्दू है तो फिर कृष्ण यह श्लोकों में कौन से दूसरे धर्म की बात करता है? अगर हिन्दू धर्म अच्छा है तो अर्जुन को यह समझाने की क्या आन पड़ी ?
डॉ. श्रीराम आर्य ने गीता विवेचन में लिखा है कि, " गीता की रचना... यह प्रकट करती है कि वह अन्य शास्त्रों में से चोरी करके बनाई गई पुस्तक है। गीताकार ने जो भी सामग्री महाभारत, मनुस्मृति व उपनिषदों और बौद्ध साहित्य में से ली है, उसे तोड़-मरोड़कर व उसमे मिलावट करके उपस्थित किया है...
गीता में 'निर्वाण' शब्द बौद्ध धर्म से लिया गया है क्योंकि वेदों, ब्राह्मण ग्रंथो तथा उपनिषदों में यह 'निर्वाण' शब्द कहीं नही है।

(अगले पोस्ट में गीता में कहा कहा से चोरी करके लिखा गया है उसकी जानकारी विस्तृत से बताऊंगा)
प्रसिद्ध आलोचक एवं संस्कृत साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. सुरेन्द्र अज्ञात भगवदगीता के बारे में लिखते है, "गीता का रचयिता न संस्कृत व्याकरण का पूरी तरह ज्ञाता है और न उसे वेदों व दूसरे धर्म तथा दर्शन-सिद्धांतो का ठीक से ज्ञान है। गीता में 176 के लगभग व्याकरण विषयक गलतियां मिलती है, चार श्लोकों के बाद एक गलती कहीं संधिविषयक गलती है, तो कहीं गणविषयक; कहीं समास विषयक गलती है तो कहीं लकार विषयक। 
अतः "यह निर्विवाद है कि गीता न कृष्ण की रचना है, न व्यास और न किसी विद्वान की, यह किसी कामचलाऊ पंडित की रचना है जो वेद, दर्शन और संस्कृत व्याकरण का भी ज्ञाता नहीं है।"
इस प्रकार निःसंदेह रूप से यह बात प्रमाणित होती है कि गीता कृष्ण के द्वारा न रची गई है या न कृष्ण का कोई उपदेश है। उसे बनाने वाले ने उपनिषद, मनुस्मृति, महाभारत और बौद्ध वांगमय से भी सामग्री लेकर, उसे तोड़-मरोड़कर व उसमें मिलावट करके इस रूप में प्रस्तुत किया है कि श्री कृष्ण जी को साक्षात परमेश्वर सिद्ध (बुद्ध को भुलाने और बुद्ध से मुकाबला करने) किया जा सकें । यदि ऐसा न करता तो उसे अपनी बात को प्रभाव पूर्ण ढंग से रखने का अवकाश भी नहीं मिल सकता था।
(बने रहिएगा... पढ़ेगा इंडिया...तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया... आगे जारी रहेगा गीता का रहस्य अगले पोस्ट में)
संदर्भ:
1. पालि साहित्य का इतिहास
2. गीता की शव परीक्षा - डॉ. सुरेन्द्र अज्ञात
3. गीता विवेचन - डॉ. श्रीराम आर्य
4. भारत की गुलामी में गीता की भूमिका - आचार्य भद्रशील रावत
5. श्रीमद भागवद गीता
6. विकिपीडिया 

April 30, 2017

ભારતમાં દરેક સમસ્યા થી અટવાયેલો માણસ છુ.

હુ રામાયણ મહાભારત અને ગીતા મા વગોવાયેલો શુદ્ર છુ...
હુ ભાજપ અને કોગ્રેસ મા વેહચાયેલો દલિત છુ
હુ બ્રાહમણવાદ અને પુજીવાદમા પીછાયેલો મુળનિવાસી છુ...
હુ ગાધીજી અને ઠક્કર બાપાના હાથે છપાયેલો હરીજન છુ...
હુ ડો.ભીમરાવ આબેડકરના નામથી ચાલતા હજારો સંગઠન મા ખેચાયેલો શોષિત પિડીત વંચિત છુ...
હુ ભારતમાં દરેક સમસ્યા થી અટવાયેલો માણસ છુ...
હુ બધુ જ છુ હુ બધુ જ છુ હુ બધુ જ છુ.....


- ગૌતમ મકવાણા 




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