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July 18, 2017

बहन मायावती का इस्तीफा : देश मे अघोषीत आपातकाल

By News Desk


राज्यसभा में बहन मायावती ने मंगलवार (18 July,2017) को सहारनपुर हिंसा का मुद्दा उठाया. उन्होंने सहारनपुर की पुरी घटना को केंद्र की साजिश बताया. और दलितो के साथ हो रहे भेदभाव के मुद्दे को संसद मे उठाना चाहा. पर दलित और पीछडा विरोधी बहरी सरकार को इस से कोइ फर्क नही पडता था. सहारनपुर जैसी संवेदनशील घटना पर भी सरकार का ये रुख बेहद नीराशाजनक है.

अभी वह अपनी बात रख ही रही थीं कि उपसभापति पी जे कुरियन ने घंटी बजाकर उन्हें बात जल्दी खत्म करने का इशारा दिया. इस पर मायावती नाराज हो गईं. उन्होंने कहा कि उन्हें बोलने से क्यों रोका जा रहा है??? और बाद मे उपसभापति और बहन मायावती की बहस हो गई. बाद मे मायावती जी ने कहा कि अगर उन्हें बोलने से रोका जाएगा तो वह राज्यसभा से इस्तीफा दे देंगी.

इसके बाद राज्यसभा विपक्ष के द्वारा सरकार पर दलित-विरोधी होने के नारे लगने शुरू हो गए. कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा, 'अगर सरकार को बहुमत दलितों, किसानों और अल्पसंख्यकों की लिंचिंग के लिए मिला है तो हम इस सरकार के साथ नहीं. दलित, किसान और अल्पसंख्यकों की लिंचिंग हो रही है.' 

हंगामे के बीच बहन मायावती गुस्से में सदन से उठकर बाहर चल दीं. विपक्ष के नेताओं ने भी उनका समर्थन करते हुए सदन से वॉकआउट कर दिया.

सदन के बाहर मीडिया से बीतचीत में मायावती ने कहा कि वह राज्यसभा में समाज के कमजोर वर्ग के बारे में बात करना चाहती थीं, लेकिन उन्हें ऐसा करने से रोका जा रहा है. बाद मे उन्होंने कहा, 'लानत है...अगर मैं अपने समाज की बात सदन में नहीं रख सकती तो मुझे सदन में रहने का अधिकार नहीं है. यही वजह है कि मैंने राज्यसभा से इस्तीफा देना का फैसला किया है. मेरी बात नहीं सुनी जा रही है...मुझे बोलने नहीं दिया जा रहा है.'

मायावती ने कहा कि दलितों और छोटे तबकों के लोगों पर लगातार अत्याचार हो रहा है. सहारनपुर में दलितों का बड़े पैमाने पर उत्पीड़न हुआ. गुजरात के ऊना में दलितों पर अत्याचार हुआ.  मुझे शब्बीरपुर में हेलीकॉप्टर से जाने की इजाजत नहीं दी गई. सड़क के रास्ते जाना पड़ा. जब मैं गांव पहुंची तो डीएम और एसपी गायब थे. मैंने वहां कोई ऐसी बात नहीं कही जिससे समुदायों के बीच लड़ाई हो जाए. यूपी में अभी भी महाजंगलराज और महागुंडाराज है. हमें पीड़ितों की मदद के लिए भी प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ी.

उना मामले मे जीस तरह बहन मायावती के द्वारा मुद्दा उठाये जाने पर सरकार को राष्ट्रीय और आंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीस तरह नालेशी का सामना करना पडा वह देख कर बौखलाये हुए सत्ता पक्ष ने उन की आवाज को दबाने का ये ही रास्ता चुना. 

भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय है ये.

पढीये बहन मायावती का दीया हुआ इस्तीफा ः-






Watch how the Democracy is Dying :-

June 18, 2017

चंद्रशेखर आजाद की रिहाई के लिए आज भिम आर्मी के सिपाही यों की जन्तर मन्तर पे फिर दहाड


18/06/2017 
Delhi , Jantar Mantar
क्रीकेट मेच से अगर फुरसत मील जाये तो एक बार ये भी देख लेना साथीयो.

आज जंतर मंतर पर बडी तादाद मे आंबेडकराईट लोगो का विरोध प्रदर्शन था. सरकार की दलीत विरोधी नीतीयो के चलते भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आझाद और भीम आर्मी के 30 कार्यकरो पर सरकार द्वारा की गई कार्यवाही का विरोध करने देश भर मे से समर्थक जुटे थे.

जीन दलीतो के 55 से ज्यादा घरो को जला दीया गया और हाथ पैर काट दीये गये बाद मे भी बहोत ही हिंसा की गई उन पर ही ये सब आरोप घडा जा रहा है. न्याय की धज्जीया उडा कर अपने हिंसक समर्थको का सरकार बचाव करने मे इतनी बेशर्म होती जा रही है की खुद जीन पर अत्याचार हुए उन को ही अब दोषी बना रहि है.

शब्बीर और गांव के लोग अभी भी दहेशत मे जी रहे है.
हिंसा के विरोध मे भीम आर्मी ने पंचायत बुलाई थी उस पंचायत को नाकाम बनाने की सरकार की कोशीषो ने इतने हद तक अपना दलीत विरोधी चहेरा दीखाया की अब पीडीत समुदाय ही गुनेहगार है योगी मोदी सरकार मे.
मोदीजी और योगीजी हमे बताये की इन सारे मामले को क्यो "Government Sponcered Riot" ना कहा जाये???

राजपुतों ने योगी-मोदी जिंदाबाद नारा लगाकर तांडव मचाया : अग्नि भाष्कर बोध, पीड़ित, शब्बीरपुर

दलितों के घर फूंके गए और सजा दलित ही भुगत रहे हैं. : शब्बीरपुर की पीड़िता अरुणा।


















(Creted By Vishal Sonara)


May 27, 2017

सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में बहुजनो पर जाति के आधार पर हुए हमले का सच

( क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन की अगुवाई में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र एवं नौजवान भारत सभा के कार्यकर्त्ताओ ने तथ्यों की जांच पड़ताल के लिए शब्बीरपुर गांव का दौरा 8 मई को किया इस जांच पड़ताल के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है।)
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सहारनपुर से लगभग 26 किमी दूरी पर शब्बीरपुर गांव पड़ता है । मुख्य सड़क से तकरीबन आधा किमी दूरी पर यह गांव है।इस गांव के आस पास ही महेशपुर व शिमलाना गांव भी पड़ते है। गांव के भीतर प्रवेश करते वक्त सबसे पहले दलित समुदाय के घर पड़ते है। जो कि लगभग 200 मीटर के दायरे में गली के दोनों ओर बसे हुए हैं। यहां घुसते ही हमें गली के दोनों ओर जले हुए घर, तहस नहस किया सामान दिखाई देता है। दलित समुदाय के कुछ युवक, महिलाएं व अधेड़ पुरुष दिखाई देते हैं जिनके चेहरे पर खौफ, गुस्सा व दुख के मिश्रित भाव को साफ साफ पढ़ा जा सकता है।

इस गांव के निवासियों के मुताबिक गांव में तकरीबन 2400 वोटर हैं जिसमें लगभग 1200 वोटर ठाकुर समुदाय के , 600 वोटर दलित (चमार)जाति के है। इसके अलावा कश्यप, तेली व धोबी, जोगी (उपाध्याय) आदि समुदाय से हैं। मुस्लिम समुदाय के तेली व धोबी के तकरीबन 12- 13 परिवार हैं। गांव में एक प्राइमरी स्कूल हैं जिसमें ठाकुर समुदाय के गिने चुने बच्चे ही पड़ते हैं जबकि अधिकांश दलितों के बच्चे यहां पड़ते हैं।
गांव की अधिकांश खेती वाली जमीन ठाकुरों के पास है लेकिन 25-35 दलित परिवारों के पास भी जमीन है। दलित प्रधान जो कि 5 भाई है के पास भी तकरीबन 60 बीघा जमीन है।

गांव में ठाकुर बिरादरी के बीच भाजपा के लोगों का आना जाना है। जबकि दलित समुदाय बसपा से सटा हुआ है। गांव का प्रधान दलित समुदाय से शिव कुमार है जो कि बसपा से भी जुड़े हुए हैं। इस क्षेत्र के गांव मिर्जापुर के दलित सत्यपाल सिंह ने बताया कि वह खुद आरएसएस(संघ) से लंबे समय से जुड़े हुए है शिमलाना, महेशपुर व शब्बीरपुर गांव में भी संघ की शाखाएं लगती हैं हालांकि इनमें दलितों की संख्या 6-7 के लगभग है और इस गांव से कोई भी दलित शाखाओं में नहीं जाता है।

घटना व घटना की तात्कालिक पृष्ठभूमि

5 मई को दलित समुदाय को निशाना बनाने से कुछ वक्त पहले कुछ ऐसी बातें हुई थी जिसने दलितों को सबक सिखाने की सोच और मज़बूत होते चले गई । 14 अप्रेल को अम्बेडकर दिवस के मौके पर गांव के दलित अपने रविदास मंदिर के बाहर परिसर में अम्बेडकर की मूर्ती लगाना चाह रहे थे । लेकिंन गांव के ठाकुर समुदाय के लोगों ने इस पर आपत्ति की।प्रशासन ने मूर्ति लगाने की अनुमति दलितों को नहीं दी । मूर्ति लगाने के दौरान पुलिस प्रशासन को गांव के ठाकुर लोगों ने बुलाया। पुलिस मौके पर पहुँची मूर्ति नही लगाने दी गई । दलितों से कहा गया कि वो प्रशासन की अनुमति का इंतजार करें। जो कि नहीं मिली।

5 मई को इस गांव के पास शिमलाना में ठाकुर समुदाय के लोग "महाराणा प्रताप जयंती" को मनाने के लिए एकजुट हुए थे। इनकी तादात हज़ारों में बताई गई है। इसमे शब्बीरपुर गांव के ठाकुर भी थे। ये सभी सर पे राजपूत स्टाइल का साफा पहने हुए थे, हाथों में तलवार थामे हुए थे व डंडे लिए हुवे थे।

5 मई को सुबह लगभग 10:30 बजे गांव के ठाकुर समुदाय के कुछ युवक बाइक में दलित समुदाय की ओर से जाने वाले रास्ते पर से डी जे बजाते हुए आगे बढ़ रहे थे। इस पर दलितों ने आपत्ति जताई । क्योंकि प्रशासन से इनकी अनुमति नहीं थी । इसका दलितों ने विरोध किया लेकिन इस पर भी मामला नही रुका तो दलित प्रधान ने पुलिस प्रशासन को सूचित किया। पुलिस आई और डी जे को हटा दिया गया। दलित समुदाय के लोगों ने आगे बताया कि इसके बाद ये बाइक में रास्ते से गुजरते हुए " अम्बेडकर मुर्दाबाद", "राजपुताना जिंदाबाद" महाराणा प्रताप जिंदाबाद" के नारे लगाते हुए आगे बढ़ने लगे। वह रास्ते से 2-3 बार गुजरे। इन दौरान फिर पुलिस भी आई।

ठाकुर समुदाय के लोगों का कहना था कि इन दौरान दलित प्रधान ने रास्ते से गुजर रहे इन लोगों पर पथराव किया। जबकि दलित समुदाय के लोग इससे इनकार करते हैं। हो सकता है दलितों की ओर से कुछ पथराव हुआ हो। क्योंकि इसी दौरान ठाकुर समुदाय के लोग महाराण प्रताप जिन्दाबाद का नारा लगाते हुए रविदास मंदिर पर हमला करने की ओर बढ़े।

लगभग 11 बजे के आस पास रविदास मंदिर पर हमला बोला गया। दूसरे गांव से आये एक ठाकुर युवक ने रविदास की मूर्ति तोड़ दी नीचे गिरा दी । दलितों ने बताया कि इस पर पेशाब भी की गई। और यह युवक जैसे ही मंदिर के अंदर से बाहर परिसर की ओर निकला वह जमीन पर गिर गया। और उसकी मृत्यु हो गई । इसकी हत्या का आरोप दलितों पर लगाया गया। इण्डियन एक्सप्रेस के मुताबिक पोस्टमार्टम में मृत्यु की वजह ( suffocation) दम घुटना है।

तुरंत ही दलितों द्वारा ठाकुर युवक की हत्या की खबर आग की तरह फैलाई गई । और फिर शिमलाना में महाराण प्रयाप जयंती से जुड़े सैकड़ो लोग तुरंत ही गांव में घुस आए। इसके बाद तांडव रचा गया। तलवार, डंडे से लैस इन लोगों ने दलितों पर हमला बोल दिया। थिनर की मदद से घरों को आग के हवाले कर दिया गया। लगभग 55 घर जले । 12 दलित घायल हुए इसमें से एक गंभीर हालत में है। गाय, भैस व अन्य जानवरों को भी निशाना बनाया गया।इस तबाही के निशान हर जगह दिख रहे थे। यहां से थोड़ी दूर महेशपुर में सड़क के किनारे दलितों के 10 खोखे आग के हवाले कर दिए गए। यह सब चुन चुन कर किया गया।

घायलों में 5 महिलाएं है जबकि 7 पुरुष। गांव के दलित प्रधान का बेटा गंभीर हालत में देहरादून जौलीग्रांट में भर्ती है। तलवार व लाठी डंडे के घाव इनके सिर हाथ पैर पर बने हुए हैं। रीना नाम की महिला के शरीर पर बहुत घाव व चोट है। इस महिला के मुताबिक इसकी छाती को भी काटने व उसे आग में डालने की कोशिश हुई। वह किसी तरह बच पायी।

शासन , पुलिस प्रशासन व मीडिया की भूमिका

सरकार व पुलिस प्रशासन की भूमिका संदेहास्पद है व उपेक्षापूर्ण है। यह आरोप है कि घटनास्थल पर हमले के दौरान मौजूद पुलिस हमलावरों का साथ देने लगी व कुछ दलितों के साथ इस दौरान मारपीट भी पुलिस ने की । संदेह की जमीन यहीं से बन जाती है कि जब संघ व भाजपा के लोग अम्बेडकर को हड़पने पर लगे है तब दलितों को उन्हीं के रविदास मंदिर परिसर में अम्बेडकर की प्रतिमा लगाने से रोक दिया गया व प्रशासन ने इसकी अनुमति ही नहीं दी।

दलितों पर कातिलाना हमले के बाद भी सरकार व मुख्यमंत्री के ओर से दलितों के पक्ष में कोई प्रयास नहीं हुए जिससे कि उन्हें महसूस होता कि उनके साथ न्याय हुआ हो। इसके बजाय मामला और ज्यादा भड़काने वाला हुआ । एक ओर पुलिस प्रशासन ने पीड़ितों व हमलवारों को बराबर की श्रेणी में रखा और हमलावर ठाकुर समुदाय के लोगों के साथ साथ दलितों पर भी मुकदमे दर्ज किए दिए गए । 8 मई तक मात्र 17 लोग ही गिरफ्तार किए गए इसमें लगभग 7 दलित समुदाय के थे जबकि 10 ठाकुर समुदाय के। जबकि दूसरी ओर ठाकुर समुदाय से मृतक परिवार के लोगों को मुआवजा देने की खबर आई व मेरठ में मुख्य मंत्री योगी द्वारा अम्बेडकर की मुर्ती पर माल्यार्पण न करने की खबर भी फैलने लगी।
घायल लोगों के कोई बयान पुलिस ने 8 मई तक अस्पताल में नहीं लिए थे। घायल लोगों के कपड़े घटना वाले दिन के ही पहने हुए हैं जो कि खून लगे हुए थे। ये पूरे शासन प्रशासन की संवेदनहीनता को दिखाता है।
इस दौरान गांव में डी एम ने एक बार दौरा किया व कुछ परिवारों को राशन दिया। लेकिन लोगो की जरूरत और ज्यादा की थी उन्हें छत के रूप में तिरपाल की भी जरूरत थी। लेकिन शासन प्रशासन ने फिर मदद को कोई क़दम नहीं उठाया। बाहर से जो लोग मदद पहुंचा रहे थे उन्हें भी प्रशासन ने रोक दिया।

लखनऊ से गृह सचिव व डी जी पी स्थिति का जायजा लेंने पहुंचे तो वे केवल अधिकारियों से वार्ता करके चले गए गांव जाना व वंहा दलितों से मिलने का काम इन्होंने नहीं किया।

बात यही नही रुकी। दलितों ने भेद भाव पूर्ण व्यवहार के विरोध में तथा मुआवजे के लिए एकजुट होने की कोशिश को भी रोका गया। दलित छात्रावास में रात को ही पीएसी तैनात कर दी गई। और जब गांधी पार्क से एकजुट दलित लोगों ने जुलूस निकालने की कोशिश की तो उस पर लाठीचार्ज कर दिया गया।

मीडिया ने इस कातिलाना हमले को दो समुदाय के टकराव(clash) के रूप में प्रस्तुत किया। हमलावरों व हमले के शिकार लोगों को एक ही केटेगरी में रखा गया। इसका नतीजा ये रहा कि दलितों में पुलिस प्रशासन व मीडिया के प्रति अविश्वास व नफरत बढ़ते गया।

शबीरपुर घटना की दीर्घकालिक वजह

सहारनपुर में दलितों की आर्थिक व राजनीतिक स्थिति तुलनात्मक तौर ठीक है और यह तुलनात्मक तौर पर मुखर भी है । आरक्षण के चलते थोड़ा बहुत सम्पन्नता दलितों में आई है अपने अधिकारों के प्रति सजग भी हुए है। लेकिन इन बदलाव को सवर्ण समुदाय विशेषकर ठाकुर समुदाय के लोग अपनी सामंती मानसिकता के चलते सह नहीं पाते। उन्हें यह बात नफरत से भर देती है कि कल तक जिन्हें वे जब तब रौंदते रहते थे आज वही उन्हें आँख दिखाते है ।

जब से एस सी एस टी एक्ट बना हुआ है इस मुकदमे के डर से ठाकुर समुदाय के लोगों को जबरन खुद को नियंत्रित करना पड़ता है कभी कभी तो जेल भी जाना पड़ता है। ये बात इन्हें नफरत से भर देती है।ठाकुर समुदाय के लोग महसूस करते है कि बसपा की सरकार थी तो बस इन दलितों का ही राज था। अभी बसपा की सरकार होती तो सारे ठाकुर अंदर होते, भाजापा के होने केवल 10-12 लोग ही अरेस्ट हुए। दलित व ठाकुरों के बीच के अंतर्विरोध अलग अलग वक्त पर झगड़ो के रूप में दिखते हैं।
चूंकी संघ ने निरंतर ही अपनी नफरत भरी जातिवादी विचारो का बीज इस इलाके में भी बोया है। सवर्ण समुदाय इससे ग्रसित है। वह आरक्षण व सामाजिक समानता का विरोधी है। इसलिए यह अंतर्विरोध और तीखा हुआ है। संघ मुस्लिमों के विरोध में सभी हिंदुओं को लामबंद करने की कोशिश कर रहा है अपने फास्सिट आंदोलन को मजबूत कर रहा है । शब्बीरपुर घटना उसके लिए फायदेमंद नहीं है।

चुकी शब्बीरपुर गांव में ठाकुरों के वोटर दलितों से दुगुने होने के बावजूद ठाकुर अपना प्रधान नहीं बना पाए। एक बार रिजर्ब सीट होने के चलते तो दूसरी दफा सामान्य सीट होने के के बावजूद।

जब ठाकुर समुदाय के लोगों से यह पूछा गया कि ऐसा कैसे हुआ ? तो उन्होंने जवाब दिया कि सारे चमार, तेली कश्यप एक हो गए हम ठाकुर एक नही हो पाए ज्यादा ठाकुर चुनाव में खड़े हो गए, वोट बंट गए और हार गए। इसका बहुत अफसोस इन्हें हो रहा था।

इसके अलावा दलितों के पास जमीन होना भी ठाकुर लोगों के कूड़न व चिढ़ को उनके चेहरे व बातों में दिखा रहा रहा था। ठाकुर लोगों से जब पूछा गया कि गांव में सबसे ज्यादा जमीन किसके पास है ? तो जवाब मिला - सबके पास है दलितों के पास भी बहुत है प्रधान के पास 100 बीघा है उसका भटटा भी है पटवारी भी दलित है जितना मर्जी उतनी जमीन पैसे खाकर दिखा देता है।

ठाकुर परिवार की महिलाएं बोली - हमारी तो इज्जत है हम घर से बाहर नही जा सकती, इनकी(दलित महिलाएं) क्या इज्जत, सब ट्रैक्टर मैं बैठकर शहर जाती है पैसे लाती है। ठाकुर लोग फिर आगे बोले-इनके ( दलितों) के तो 5-5 लोग एक घर से कमाते है 600 रुपये मज़दूरी मिलती है हमारी तो बस किसानी है हम तो परेशान हैं आमदनी ही नहीं है।

यही वो अंतर्विरोध थे जो लगातार भीतर ही भीतर बढ़ रहे थे दलितों को सबक सिखाने की मंशा लगातार ही बढ़ रही थी। और फिर 5 मई को डी जे के जरिये व फिर नारेबाजी करके मामला दलितों पर बर्बर कातिलाना हमले तक पहुंचा दिया गया। इसमें कम से कम स्थानीय स्तर के भाजपा , संघ व पुलिस प्रशासन की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।

5 मई को शिमलाना में महाराणा प्रताप जयंती का आयोजन किया गया । जिसमें हजारों लोग गांव में इकट्ठे हुवे थे। ऐसा कार्यक्रम सहारनपुर के गांव में पहली दफा हुआ। जबकि इससे पहले यह जिला मुख्यालय पर हुआ है।

दलित समाज की प्रतिकिया व शासन प्रशासन

जैसा कि स्पष्ट है विशेष तौर पर पुलिस प्रशासन के प्रति इनमें गहरा आक्रोश था। जब 9 तारीख को दोपहर में गांधी पार्क पर लाठी चार्ज किया गया तो शाम अंधेरा होते होते यह पुलिस प्रशासन से मुठभेड़ करते हुए दिखा। इनकी मांग थी - हमलावर ठाकुर समुदाय के लोगो को 24 घंटे के भीतर गिरफ्तार करो।

सहारनपुर के रामनगर,नाजीरपुरा,चिलकाना व मानकमऊ में सड़कें ब्लॉक कर दी गई । यह दलित समुदाय के युवाओं के एक संगठन 'भीम आर्मी' ने किया। लाठी डंडो से लैस इन युवाओं को पुलिस प्रशासन ने जब फिर खदेड़ने की कोशिश की तो फिर पुलिस को टारगेट करते हुए हमला बोल दिया गया।पुलिस थाने में आग लगा दी गई । पुलिस की कुछ गाड़िया जला दी गई ।पुलिस का जो भी आदमी हाथ आया उसे दौड़ा दौड़ा कर पिटा गया। अधिकारियों को भी इस आक्रोश को देख डर कर भागना पड़ा। एक दो पत्रकारों को भी पीटा गया व बाइक जला दी। एक बस से यात्रियों को बाहर कर बस में आग लगा दी गई।

इस आक्रोश से योगी सरकार के माथे पर कुछ लकीरें उभर आई। तुरंत ही अपनी नाकामयाबी का ठीकरा दो एस पी पर डालकर उन्हें हटा दिया गया। और अब वह "कानून का राज" कायम करने के नाम पर दलित युवाओं से बनी भीम आर्मी पर हमलावर हो गई है। अस्पताल से लेकर छात्रावास व गांव तक हर जगह इनको चिन्हित कर तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। जबकि ठाकुर समुदाय के तलवार के बल पर खौफ व दहशत का माहौल पैदा करने वाले महाराण प्रताप जयंती वाली सेना को सर आंखों पर बिठा कर रखा जाता है। उनके खिलाफ ऐसी कोई कार्यवाही सुनने या देखने पढ़ने को नही मिली।साफ महसूस हो रहा है कि पुलिस प्रशासन अब पुलिस कर्मियों पर हमला करने वाले दलित समुदाय के लोगों को सबक सिखाने की ओर अपने कदम बढ़ा चुका है।

कुल मिलाकर शासन -प्रशासन व राज्य सरकार का रुख दलितों के प्रति भेदभावपूर्ण, उपेक्षापूर्ण , दमनकारी व सबक सिखाने का बना हुआ है। इसलिये आने वाले वक्त में यह समस्या और गहराएगी। वैसे भी जब जातिवादी , साम्प्रदायिक व फासिस्ट विचारों से लैस पार्टी सत्ता में बैठी हुई हो तो इससे अलग व बेहतर की उम्मीद करना मूर्खता है।

May 26, 2017

MEMORANDUM TO HON’BLE PRESIDENT OF INDIA

हमारे गुजरात के चार साथी सहारनपुर में एक सप्ताह तक ठहरने के बाद अभी राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को उना तथा सहारनपुर पर मेमोरेन्डम देने जा रहे हैं. 

कर्मशील राजु सोलंकी ने उनको मेमोरेन्डम तैयार करके भेज दिया है, अवश्य पढ़े और शेअर करे... 




To,
Honourable President of India
New Delhi.


Dear Sir,

            We undersigned, concerned citizens of Gujarat and India, after visiting Saharanpur, demand to immediately dismiss Mr. Adityanath Yogi’s government in Uttar Pradesh in the wake of the complete breakdown of law and order enforcement machinery in the state. The situation is alarming as the central government has to send Rapid Action Force to Saharanpur, the hotbed of caste conflict under the nose of a regime which has been boasting of Hindu Unity and brotherhood among so-called higher and lower castes.


            In fact, Mr. Adityanath Yogi is running a quasi-military, armed gang named Hindu Yuva Vahini which is responsible for the present conflict where poor and marginalized communities like Dalits and Muslims are the worst sufferers. The Thakurs of Uttar Pradesh, who coincidentally belong to Mr. Yogi’s cast are primarily responsible for the initiation of present perpetrated violence, unabated and aggravated under the nose of Thakur-friendly police and administration.

               BJP the present party in power at both, center and state levels is determined to enforce political exclusion of Muslim community in our country, where our forefathers have painstakingly and purposefully nourished inclusive policy for all citizens of India. The present turmoil in Uttar Pradesh is an indicator of another sinister aspect of BJP and that is - a well-planned strategy to undermine and destroy the growing awareness among SCs, STs and OBCs and minorities.

           Our Prime Minister Mr. Narendra Modi is the mastermind in the very undemocratic process of drowning the ‘loudest voices’ of dissent. The witch hunt of Teesta Setalwad, use of CBI against political opponents and protection of fascist forces who are ready to shatter the composite and secular fabric of the nation. The Una incident of Gujarat was the glaring example of state patronage to goons who roam and ruin lives of innocents in the name of ‘holy cow’. The lynching of innocent Muslims in Jharkhand, Murder of a Muslim trader in Alwar, uprooting Tribals in name of development, killings of Dalits on the altar of age-old caste prejudices – these all are ominous signs of a brutal, fascist state.

           Looking at the grim picture, we request you to intervene as early as possible.

                                                                                                                                    Yours,
                                                                                                                        Ramesh Babariya, 
                                                                                                                         Arvind Khuman, 
                                                                                                                        Kishor Dhakhada, 
                                                                                                                           Mukesh Vanza.


























🌺સહારનપુર મુદે દિલ્હીથી લાઇવ...
🦁રાષ્ટ્રપતિ કાર્યાલય અને વડા પ્રધાન કાર્યાલયમાં રુબરુ જઇ સહારનપુરના મુદે મેમોરેન્ડમ આપ્યુ 🦁26/5/17
💥 દોસ્તો, .. છેલ્લા 8 દિવસથી સહારનપુરના પિડીતો, ભીમ આર્મીના સભ્યોને મળીને સહારનપુરની પરિસ્થિતિ સમજી આવેદનપત્ર તૈયાર કરેલ. કાનુની સહાયતા ગુપ - ગુજરાતના નામે રુબરુ જઈ રાષ્ટ્રપતિ તેમજ વડા પ્રધાન કાર્યાલયમાં આજ રોજ તા. 26/5/17 ના રોજ આવેદનપત્ર આપેલ છે, રુબરુ રજુઆત કરેલ છે.
💥 અમદાવાદથી રાજુભાઇ સોલંકીએ આવેદનપત્ર તૈયાર કરી મેઇલ કરેલ તે પણ આપેલ છે.
💥 વિકટ પરિસ્થિતિમા આ સમગ્ર કામગીરી ગ્રુપના સાથી મીત્રો કિશોરભાઈ ધાખડા, રમેશભાઈ બાબરીયા, મુકેશભાઇ વાંજા અને હુ અરવિંદભાઈની સખત મહેનતથી શક્ય બન્યુ છે. લગભગ કુલ 72,000/ નો ખર્ચ થયેલ જે દરેક સભ્યે પોતાના ખર્ચે સહારનપુરના પિડીતો માટે ખર્ચ કરેલ છે. કોઇ પાસેથી એક રુપીયે પણ ફાળા પેટે લીધલ નથી.
💥 આ આવેદનપત્રની માંગણીઓ મુજબ દરેક જિલ્લા, તાલુકામા આવેદનપત્રો આપો.. આવેદનપત્રની તૈયાર નકલ મેળવવા અમારો સંપર્ક કરો.
🙏(1) અરવિંદભાઈ મો. 8128321291 mail I D : khumanarvind01@gmail.com મેઇલ કરી મોકલી શકો છો.. અરવિંદભાઈ ,કિશોરભાઈ, રમેશભાઈ, મુકેશભાઇ અને ટીમના સભ્યો..






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May 24, 2017

योगीराज में प्रशासन भयमुक्त के जगह भययुक्त होता जा रहा है

सहारनपुर कल 23 मई को बीएसपी सुप्रीमो मायावती जी ने सहारनपुर का दौरा किया । मायावती जी शब्बीरपुर गांव के पीड़ितों से मिलने पहुंची थी।  जातिवादी नफरत से भरे लोगों ने कुछ अलग ही सोच रखा था । 
मायावती जी के लौटने के तुरंत बाद जब आसपास के गांवों से सभा में शामिल होने आए लोग जब वापिस जाने लगे तो रास्ते में उनपर ठाकुरों ने बंदूक, तलवार और कुल्हाड़ियों से हमला बोल दिया। इसके अलावा एक शख्स को गोली मार दी।  गांव के बाहर खेत में घंटों से घात लगाकर बैठे जातिवादी आतंकवादियों ने शब्बीरपुर के महज 500-600 मीटर की दूरी पर ही हमला बोल दिया ।


हमले में दर्जनों लोग घायल हुए जबकि 2 लोगों की मौत हो गई। तलवार बाजी में घायल दो दलितों की स्थिति गंभीर बनी हुई है। तलवारों और दूसरे हथियारों से लोगों के हाथ पैर पर इस तरह से प्रहार किए गए थे कि देखने वालों का दिल रो पड़े, हमले में गंभीर रूप से घायल लोगों को मेरठ के जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। 7 घायलों को सहारनपुर जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। लोगों का आरोप है कि पुलिस की मौजूदगी में लोगों पर हमला हुआ।

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि जिस तरह योजनाबद्ध तरीके से हमलावरों ने गाड़ी को निशाना बनाया और भाग गए उससे साफ है कि वे पूरी तैयारी से थे। हमलावरों को मालूम था कि गाड़ियों का काफिला एक बार शुरू हुआ तो फिर वे अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाएंगे। 
शाम करीब चार बजे मायावती शब्बीरपुर में सभा कर सरसावा एयरबेस के लिए रवाना हुईं। बड़गांब चौराहे से उनका काफिला सीधे निकल गया, जबकि कुछ लोग सहारनपुर के लिए मल्लीरोड निकले। इसी समय खेतों से निकलकर आए हमलावरों ने हमला कर दिया। 

मायावती के निकलने और हमला होने मे महज चंद मिनटों का फांसला रहा..!!!
प्रशासन की नाकामी साफ तौर पर देखी जा सकती है... 

सहारनपुर में एक महीने के अंदर ये तीसरा मामला है। पहला मामला 20 अप्रैल का है जब बाबासाहेब की जयंती को लेकर मुसलमानों और दलितों के बीच विवाद कराने की कोशिश की गई थी। उसके बाद दूसरी घटना सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में 5 मई हुई। जिसमें राजपूत समुदाय के लोगों ने दलितों के सैकड़ों घरों में लूटपाट की और 50 से ज्यादा घरों को आग के हवाले कर दिया। 

ठाकुरों का आरोप है कि मायावती के आने से पहले दलितों ने उनके घर पर पथराव व आगजनी की थी। जबकि दलित समुदाय के लोगों ने आरोप लगाया कि बीएसपी सुप्रीमो मायावती के आने की वजह से ठाकुर चिढ़े हुए थे, जिसकी वजह से उन्होंने हम पर हमला बोला है।

आला अफसरों ने ठाकुरों की बस्ती को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया। आसपास के जनपदों से भी पुलिस बल को बुलाया गया है। मेरठ से एडीजी आनंद कुमार शब्बीरपुर के लिए रवाना हो गए हैं। साथ ही गांव में मुजफ्फरनगर व शामली से फायर ब्रिगेड की गाड़ी व पीएसी बुलाई जा रही है।
जो बंदोबस्त निर्दोष लोगों के लिए होना चाहिए था वह लोगों के मरने के बाद दिया जा रहा है

मंगलवार को दलितों पर तलवारों से हुए हमले के बाद अब ओबीसी समुदाय के लोगों पर भी हमला किया गया है। सहारनपुर के नानौता बड़गांव मांर्ग पर ओबीसी समाज के दो लोगों पर हमला किया गया है। यहां एक आदमी को गोली भी मारी गई है।

बताया जा रहा है कि प्रजापति समाज के दो लोगों पर तब हमला किया गया जब वह सहारनपुर के नानोता बड़गांव मार्ग पर रात तीन बजे भट्टे पर जा रहे थे। इस दौरान एक शख्स को गोली मार दी गई। दोनों लोगों को जिला चिकित्सालय भेजा गया है।

क्या पूरे देश में गोधरा, सहारनपुर, मुज्जफरनगर, झारखंड, कश्मीर जैसे हालात बनने जा रहे हैं??? 
सहारनपुर (यूपी) की आग देशभर में फैल सकती है. इसके मुख्य कसूरवार सरकारी उदासीनता ही नहीं विध्वंसकारी नीति भी है...

हमारी मनुमीडिया के मुताबिक सहारनपुर हिंसा के लिए मायावती और भीम आर्मी जिम्मेदार। क्या उसकी जिम्मेदारी बिलकुल नहीं जो कानून व्यवस्था संभालनेमें नाकामयाब है?
ये सब घटना क्रम इस बात का सबूत है कि राष्ट्रवादीयों का राष्ट्रवाद और कुछ नहीं शोषित पीडित तबकों का दमन ही है ।

(Created by : ब्लु डायरी ब्यूरो)










हैवानियत भरी वारदातों को अंजाम देने वाले चाहे सवर्ण हो या अवर्ण, पर वो मनुष्य तो कदापी नहीं कहलाने चाहिए : निलेश तुलसीभाई

अज्ञानता, आज कल शिक्षित लोको में पाया जाने वाला सामान्य लक्षण और उसका उदाहरण है ऐसे मैसेज, 

"रोहित वेमुला क्या मरा, सभी सुवर नेता नंगे होकर नाच रहे थे और खबरंडियां घाघरा उठाये घूम रही थीं।
लेकिन सहारनपुर में एक सवर्ण युवा की हत्या की जाती है और सब चुप रहते हैं। अंतर स्पष्ट है।"
 

भाई ऐसे मैसेज बनानेवाले को बोलो, पहले खुद दोनों हत्याओं के बीच का अंतर समझे और ये भी समझे की ऐसे मैसेज फैलाने से कुछ हांसिल होगा तो सिर्फ होगा बदले की भावना, जातिवाद, हिंसा और तनाव। क्योंकि ऐसे Messages समाज को बाटते है, समाज मे उन्माद फैलाते है। रोहित वेमुला मरा नहीं था, उसकी भी हत्या हुई थी, Institutional Murder...
जब की सहारनपुर में मरनेवाला युवक अपने ही लोगो द्वारा पिछडो पर शब्बीरपुर में कीये गये हमले का खुद शिकार हो गया था।
आप खुद भी इस घटनाक्रम को अपने आप समझने की कोशिश करोंगे तो समझ पाओंगे।
ये अफसोसजनक घटनाक्रम आंबेडकर जयंती से शुरू हुवा था और महाराणा प्रताप जयंती को निकली रैली को लेकर हुई वारदात पर समाप्त हुवा। वो युवक अपने ही कुछ तथाकथित उच्चवर्णीय लोगो के साथ पिछडो के घर जलाने गया था और अपनों की ही लगाईं गई उसी आग में खुद झुलस गया। और इसी घटनाक्रम के चलते काफी सारे पिछडो के अब तक घर जलाये गये है, औरतो के साथ भी हिंसा हुई है, उनके हाथ पैर काट दीये गए है और इस तरह के जातावादी दंगों से जातिवाद की खाई और भी गहरी होती जा रही है। ऐसी हैवानियत भरी वारदातों को अंजाम देने वाले चाहे सवर्ण हो या अवर्ण, पर वो मनुष्य तो कदापी नहीं कहलाने चाहिए।
शिक्षित नागरिक होने की वजह से हमारी जिम्मेदारि रहती है कि किसी घटनाक्रम को अपनी विवेक बुद्धि से समझे, और ऐसी वारदातों को और जातिवादी सोच को आगे बढ़ने से रोके, ना की अफवाएं फैलाकर इस तरह की आग को चिंगारी दे। शिक्षा का वरदान मिला है तो उससे हांसिल हुई समझ का इस्तेमाल Constructive परिणाम पाने के लिए करे, ना की Destructive...!!!

- निलेश तुलसीभाई


May 17, 2017

શા કારણે અત્યાર સુધી કલમ થી લડતા પછાતો એ હિંસાનું શરણ લેવું પડ્યું ?? : આકાશ મકવાણા













સહારનપુર નો ઘટનાક્રમ શું છે ??
ભીમ આર્મી કોણ છે ?? 
શા કારણે અત્યાર સુધી કલમ થી લડતા પછાતો એ હિંસાનું શરણ લેવું પડ્યું ??
સહારનપુર ઘટના વિશે જાણવા જેવી રસપ્રદ બાબતો
સહરનપુર હિંસા માં જેમનું નામ આવ્યું છે તે "ચંદ્રશેખર આઝાદ"ના રૂમ માં થી ટોટલ ચાર પોસ્ટર મળી આવેલ છે જેમાં બંધારણ નિર્માતા ડો.બાબાસાહેબ,BSP Inventor કાંશીરામ, સંત વાલ્મીકી અને જ્યોતીરાઓ ફૂલે અને બુદ્ધ ના ફોટા મળી આવેલ છે અને એ પોતે ૩૦ વર્ષીય નવયુવાન અને મંજાયેલા એડવોકેટ છે.
ઘટનાક્રમ:-
એપ્રિલ ૧૪,ડો. ભીમરાવ  આંબેડકર ની ૧૨૬મી જન્મજયંતી એ સહારનપુર ના યુવાનો અને લોકો એક ભવ્ય સભાનું આયોજન કરવા માંગતા હતા જેનું સ્થાન ગુરુદ્વારા ના હક્ક હેઠળ ની જમીન પર નક્કી કરાયું અને એ દિવસે એ લોકો બાબાસાહેબ ની temporary મૂર્તિ નું સ્થાપન ઈચ્છતા હતા અને આ કામ કરતા એમને સહારનપુર ના ઠાકુરો દ્વારા રોકવામાં આવ્યા અને કહેવામાં આવ્યું કે જ્યાં સુધી તેઓ ને સહારનપુર નગરપાલિકા ની મંજુરી નહિ હોય ત્યાં સુધી સ્થાપન કે સભા કરવા દેવા માં આવશે નહિ...ઘણી દોડધામ બાદ પણ મંજુરી ના મળી અને આખરે સભા અને પ્રોગ્રામ રદ કરવામાં આવ્યો.
વાત ભરેલા આગની ની જેમ દબાઈ રહી છેક મે-૫ સુધી જયારે રાજપૂત રાજા મહારાણા પ્રતાપની જન્મ જયંતી આવી, ઠાકુરો એ વિશાળ રેલી નું આયોજન કર્યું ત્યારે ગામના જ એક પછાત ખેડૂત દ્વારા પૂછવામાં આવ્યું કે સુ તેમની પાસે પરમીશન છે ?? જો પછાતોએ રેલી કાઢવા પરમીશન જોઈએ તો ઠાકુરો એ પણ રેલી કાઢવા પરમીશન લીધેલી હોવી જ જોઈએ..... 
આ ટકરાવ બાદ ગુસ્સામાં સાંજે ઠાકુરો ની એક અસામાજિક ટોળકી દ્વારા શબ્બીરપુર માં વસતા પછાતો ના ક્વાર્ટર સળગાવી દેવામાં આવ્યા...જે ઘટના માં તેમના જ એક ઠાકુર નું આગની લપટો અને ભીષણ ધુમાડા માં શ્વાસ રૂંધાઇ જવાથી મોત નીપજ્યું...

જેમાં પછાતો ના ઘણા પ્રયત્નો છતાં કોઈ ફરિયાદ નોંધાઈ નહિ કે ના પોલીસ દ્વારા કોઈ પ્રોટેક્શન આપવા માં આવ્યું...વધારામાં ઠાકુરો એ પોલીસ ફરિયાદ કરી કે પછાતો એ અમારા પર અંગત અદાવત રાખી અમારા એક ઇસમ ને જીવતો સળગાવી દીધો...ચારેબાજુ થી ભરાયેલા પછાતો એ મે-૯ ના રોજ સહારનપુર શહેર માં આંદોલન છેડી દીધું જે "ભીમ આર્મી" ના બેનર હેઠળ નહોતું...હા પણ એમાં ભીમ આર્મી સંગઠન નો લોકજુવાળ ભેગો કરવા માં બહુ મોટો ફાળો હતો....દર વખત ની જેમ પોલીસે આંદોલન દબાવવા માટે લોકો ને લાઠીચાર્જ થી  પ્રતાડિત કરવાનું શરુ કરી દીધું... હવે આ વાત સોશિયલ મીડિયા માં બનાવાયેલા ગ્રુપ "ભીમ આર્મી : દ આંબેડકરઈટ આર્મી" જેના ભારત ના દરેક રાજ્ય શહેરોમાં થઇ ને કુલ ૪૦૦૦૦ ઉપર સભ્યો છે જેમાંથી શહેર માં હાજર લોકો નો ટેકો મળતા જ ભયંકર હિંસા અને તોફાનો માં પરિણમી...ક્યાંક દુકાનો સળગી ક્યાંક વાહનો તો ક્યાંક ઘરો સામસામી હિંસા એ વિકરાળ સ્વરૂપ ધારણ કરતા જ પોલીસે કર્ફ્યું નો સહારો લેવો પડ્યો.

ભીમ આર્મી નો ઈતિહાસ...
ભીમ આર્મી સંગઠન અને પબ્લિક ગ્રુપ ચંદ્રશેખર(૨૮) દ્વારા ૨૦૧૫ માં "કોલેજો માં ઠાકુરો એ એક પછાત વિધાર્થી ને માર માર્યો અને એનો હાથ તોડી નાંખ્યો  કેમકે તેને ઠાકુરો ના પહેલા કોલેજ ની પરબે થી પાણી પીધું હતું" એ કેસના પ્રતિઘાત ના રૂપમાં સ્થાપના પામ્યું અને એ કેસ માં વિનય રત્ન સિંહ જે ભીમ આર્મી ના રાષ્ટ્રીય અધ્યક્ષ છે એમને એ પછાત વિધાર્થી ની ખુબ મદદ કરી વધુ માં તેઓ જે ઠાકુરો પછાત વિધાથી ઓ ને કોલેજ ની  બેંચો સાફ કરાવતા,કચરો વળાવતા એવા શોષિત પછાત વિધાર્થી ઓ નું પીઠબળ બન્યું.
થોડા સમય બાદ વળી એક વખત ઠાકુરો એ વિરોધ ઉઠાવ્યો કે ગામ માં લાગેલું બોર્ડ "The Great Chamar"જેના પર "જાય ભીમ" "જાય ભારત" અને :આંબેડકરગ્રામ" લખેલું હતું તે જે જેતે માલિક ની અંગત હક્ક દવા ની જમીન પર હતું તે  હટાવી લો. થોડીક ચકમક થઇ જ હતી કે કોઈક ગ્રામજને ભીમ આર્મી ને ફોને કરી સ્થળ પર બોલાવી લીધી.ફરી એકવાર ઠાકુરો અને ભીમ આર્મી માં ઘર્ષણ થયું પરંતુ ભીમ આર્મી બોર્ડ બચાવવા માં સફળ રહી...
"અમે બાબાસાહેબ આંબેડકરની વિચારધારા પર ચાલીએ છીએ, જાતિ નિર્મુલન અને ઉચત્તમ ગુણવત્તાની શિક્ષા અમારું પહેલું કર્તવ્ય છે ભીમ આર્મી એ પાઠશાળા ઓ અને ઘણી સ્કૂલો નું નિર્માણ કર્યું છે જ્યાં સીનીયર વિધાર્થી ઓ સમય બચાવી તેમના જુનિયર વિધાર્થી ઓ ને ભણાવે છે જેથી એમની મદદ કરી શકાય અને સાથે સાથે સરકારી સ્કૂલો માં કથળતું જતું શિક્ષણ નું સ્તર ઊંચું લાવી શકાય"- વિનય રત્ન
"ચંદ્રશેખર કોઈનાથી ડરતો નથી"-વિનય ઉમેરે છે "અમે જાતિવાદ વિરુદ્ધ લડીએ છીએ જે સહારનપુર માં આસમાને છે તેથીજ લોકો અમને ઓળખે છે ભીમ આર્મી ના પોસ્ટરો ઉપર ચંદ્રશેખર બ્લ્યુ રંગ ના ગોગલ્સ પહેરે છે અને વળ ખાતી શેવરોન મૂછો રાખે છે અને પોતાને "રાવણ" નામથી ઓળખાવે છે કેમ કે....ચંદ્રશેખર નું માનવું છે કે "રાવણ સ્ત્રીઓ ની ઈજ્જત કરતો હતો અને પોતાની બહેન પર અત્યાચાર કરનારા લોકો ને પાઠ ભણાવવા તેણે યુદ્ધ કર્યું હતું" વિનય ઉમેરે છે  "એટલે જ ચંદ્રશેખર એ નામ નો ઉપયોગ કરે છે કેમ કે એ રાવણ બનવાનું પસંદ કરે છે જે સ્ત્રીઓ ની ઈજ્જત કરે અને અન્યાય સામે અવાજ ઉઠાવે ભલે સામે મોત જ કેમ ના હોય જેથી કોઈ અભાગી સ્ત્રીને અગ્નિપરીક્ષા ના આપવી પડે."
અમે જયારે જાણ્યું કે પોલીસ  ભીમ આર્મી ના નામે નક્સલીઓ સાથે જોડાયેલા અને કાશ્મીરી જેવા ખોટા અને ગંભીર  આરોપો  થોપવા માંગે છે ત્યારે તેમણે બહુજન સમાજવાદી પાર્ટી નો સંપર્ક કરવાનો પ્રયત્ન કર્યો પણ એમને ત્યાં હતાશા સાંપડી અને વધારે દુખ એ થયું કે એ બસપા ના સુપ્રીમો બહેન માયાવતી કે જે તેમની પહેલી લોકસભા ચુંટણી "કૈરાના" ગામ માંથી લડ્યા હતા જે સહારનપુર થી ફક્ત બે કલાક ના અંતરે છે.
ભીમ આર્મી ઉમેરે છે કે અમારો આક્રોશ છે કે અમારા લોકો અમારી સાથે નથી બસપા જેવી પાર્ટી ફક્ત પછાતો ના નામે પોલીટીક્સ કરે છે કોઈ અમારી મદદે નથી અફસોસ ની વાત છે.
મે-૯ પછી ભીમ આર્મી ની આક્રમક લડત સહારનપુર ની બહાર પણ ફેલાઈ જયારે આદિત્યનાથે ડો.આંબેડકર ને માળા પહેરાવી સન્માન કરવાની વાત ને નકારી દીધી જયારે તેઓ સહારનપુર માં પછાતો ની મુલાકાતે હતા...ગ્રામજનો એ તેમના વિરુદ્દ્ધ નારા લગાવ્યા અને આક્રમક આંદોલન પર ઉતારી આવ્યા.
શુશીલ ગૌતમ જે મેરઠ યુનીવર્સીટી માં થી પી.એચ.ડી. ડોક્તારેટ છે તે કહે છે " અહિયાં (સહરાનપુર માં) પછાતો પાસે ચેતના અને બુદ્ધિ છે પણ એ કાફી નથી..અહીંયા લોકો અને ભીમ આર્મી સરકારના કાયદા કાનુન થી પણ વાકેફ છે !! રાજકારણ થી પણ વાકેફ છે પણ હવે એ પુરતું નથી આપણે જાતે હથિયાર ઉપાડવા જ પડશે"
"અત્યાર સુધી માં કુલ ૩૦ ભીમ સૈનિકો ની ગિરફ્તારી કરાઈ ચુકી છે ચંદ્રશેખર ને ષડયંત્ર રચનાર ના રૂપ માં ગુનેગાર ગણી ધરપકડ કરવા પોલીસ ના ચક્રો ગતિમાન છે અને હિસા કાબુ માં છે."
-આકાશ મકવાણા
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