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February 26, 2018

માર્કસવાદ ની દુર્દશા

By Jigar Shyamlan ||  15 February 2018 at  10:09am




ભારત દેશમાં જો કોઈ મહત્વપૂર્ણ વિશેષતા જો કોઈ હોય તો એ જાતિ છે.
હવે આને ભૂલ ગણો કે હાથે કરી ભુલાવી દેવાની વૃત્તિ પણ માર્કસવાદી આંદોલને આ જાતિ બાબતે ખાસ ધ્યાન આપ્યુ હોવાનું ખાસ નોંધાયું નથી.

ત્યાર પછી કદાચ સમાજવાદી વિચારો દ્વારા ઉભી થયેલ ભરપુર આલોચનાઓ પછી આ માર્કસવાદીઓએ પોતાની ભૂલ સુધારવાનો પ્રયાસ કરતા હોય તેમ માર્કસવાદ અને આંબેડકરવાદને ભેગા કરી એક નવી વિચારધારા બનાવવાનો પ્રયાસ કરી જોયો.

માર્કસવાદીઓએ હંમેશા વર્ગવિહીન સમાજ પર ભાર આપ્યો પરંતુ વર્ણવિહીન સમાજ માટે એમને ઝાઝો રસ દાખવ્યો ન હતો.

ભારતમાં માર્કસવાદ લાવનાર બ્રાહ્મણ જ હતા અને દાયકાઓ સુધી એ મનુવાદી બ્રાહ્મણોના હાથમાં જ રહ્યો.

જેવી રીતે મિસ્ટર ગાંધી અને કોન્ગ્રેસે આઝાદીના આંદોલન માટે વસ્તીની દ્રષ્ટિએ સૌથી મોટા એવા બહુજન સમાજનો ઉપયોગ કર્યો તેવો જ ઉપયોગ કરવાની આ મંશા હોઈ શકે એ વાત નકારી શકાય તેમ નથી.

પ્રસિધ્ધ ઈતિહાસકાર એસ.કે.બિશ્વાસ પોતાના પુસ્તક "માર્કસવાદ કી દુર્દશા" માં લખે છે કે -
"મનુવાદી બ્રાહ્મણ માત્ર એક જ ઉદ્દેશ લઈને માર્કસવાદી બન્યા અને એ ઉદ્દેશ હતો માર્કસવાદનું અપહરણ કરવું તથા સંસ્કૃતિકરણના નામે આખી વિચારધારાનું હિન્દુકરણ કરવું"

આ વાંચીને એક શંકા ખરેખર સાચી પડતી જણાઈ કે મૂળ તો આ બુધ્ધ આંબેડકરની ક્રાન્તિ અને બહુજન આંદોલનને નુકશાન કરવાનું એક વ્યવસ્થિત ષડયંત્ર જ છે, Nothing else...

February 24, 2018

लाल सलामकी बाते हमे रोमांचित अवश्य करती है पर यह बहुजन आंदोलन को सफल नहीं बनाती।

By Jigar Shyamlan ||  2 February 2018




आजकल भारत का पूंजीवादी मीडिया जिस तरह से दलित आंदोलन का कवरेज कर रहा है यह देखकर तो ऐसा ही लगता है जैसे भूतकाल में कोई दलित आंदोलन हूआ ही नही।

वैसे तो मुझे दलित शब्द पसंद नही, यह शब्द गैर संवीधानीक है। ईसलिये जहां तक हो सकता है यह शब्द ईस्तमाल नही करता। परंतु यह बात समझाने के लिये यह शब्द प्रयोग अति आवश्यक है ईसलिये प्रयोग किया गया है।

यह बात खुली किताब सी है कि दलित आंदोलन काफी सालो से चल है, और ईस आंदोलन से काफी सारे लोग भी जूडे हूए है। यह आंदोलन भिन्न भिन्न नामो से जरूर है पर एक सबका उद्दैश्य एक ही है।

दलित आंदोलन में बाबा साहब आंबेडकर के बाद अगर कोई स्मरणीय कहा जा सके वैसा नाम है तो वोह कांशीराम का रखा जा सकता है।

अब महत्वपूणँ बात काशीराम काफी सालो से ईस दीशा में काम कर रहे थे। लेकिन फिर भी उस वक्त समाचारो में कहीं भी उनका कोई नामोनिशान नही था।

मान लीया जाये उस वक्त टी.वी.चैनल्स की शुरूआत थी, सिफँ अखबार थे लेकिन फिर भी अखबारो ने काशीराम को ईतना कवरेज नही दीया था।

बडी हैरानी की बात यह है कि जब बहूजन समाज पाटीँने सरकार बनाई तब काशीराम को समाचारो मे जगह मिली थी। उसके बाद काशीराम के फोटो, ईन्टँरव्यु, प्रेस वाताँलाप मीडिया मे देखने को मिले। बहोत से लोग ऐसै थे जिन्होने काशीराम की फोटो पहली बार देखी थी। कुछ लोग तो पहचानते भी नही थे।

लेकिन आज भारत पूंजीवादी मीडिया दलित आंदोलन के हीरो को जिस तरह से कवरेज दे रहा है, लगता है दाल में कुछ काला हो न हो परंतु लाल जरूर है।

गुजरात के ऊनाकांड से उभरे लाल सलाम नेता को आज दलितो के महानेता बनाने की जो मुहीम चल रही है यह बात सोचने को मजबूर कर देती है।

क्या किसी बहुजन या मूलनिवासी जो समाज एवं आंदोलन का सच्चा हितैषी हो उसको भारत का मुख्यधारा का पूंजीवादी मीडिया इतना कवरेज देता है..??

मैने कभी वामन मेश्राम, मायावती और विजय मानकर जैसे लोगो का कभी भी कहीं भी ईतना ज्यादा मीडिया कवरेज भारत के पूंजीवादी मिडीया में नही देखा।

यह लाल सपुत ने आख़िर कौन सा क्रांतिकारी आंदोलन किया जो हर चैनल वाले उसका अकेले-अकेले इंटरव्यू कर रहे है। सिफँ एक चूनाव ही तो जीता है वह भी कान्ग्रेस के पूणँ सपोटँ के साथ। मान लिजीये यदी कान्ग्रेस ने उम्मीदवार खडा किया होता तो क्या होता..?? यह जीत जिस पर इतना दम लगाया जा रहा है। वोह असल में खुद की नही पर किसीकी उधार दी हूई है।

लाल सपूत लाल सलाम बोलते है। अपने आप को क्रान्तिकारी और दलित हितेषी बता रहे है, पर बाबा साहब की बातो को नही मानते। लाल सपुत कहते है कि बाबा साहब की बाते पथ्थर की लकिर नही। यह लाल सपुत बोल रहे है, सारे बहूजन फैक है।

कहीं यह मुख्यधारा के मीडिया और राजनीतिक संगठनों की, स्थापित बहुजन आंदोलन एवं नेतृत्व के प्रति बहुजन जनता में अविश्वास पैदा करने की, मीडिया के माध्यम से बहुजनों में भ्रम फैलाने की साज़िश तो नहीं..??

विचारधारा ही एक तत्व है जिससे आंदोलन चलाया जा सकता है, जो टिकाऊ और बहूजनो के हित में होगा।

लाल सलामकी बाते हमे रोमांचित अवश्य करती है पर यह बहुजन आंदोलन को सफल नहीं बनाती।

जय भीम बोलीए
लाल सलाम छोडीए




January 17, 2018

मैं कम्युनिस्टों का एक शापित दुश्मन हूं : डो. आंबेडकर

By Jigar Shyamlan ||  13 January 2018


In September 1938 while addressing a district conference of the Depressed Classes at Masur, Dr Ambedkar categorically caste aside any idea of his joining the labour movement led by the communists. In that speech, he was reported to have declared:
‘It is absolutely impossible for me to keep relations with the communists. I am an implacable enemy of the Communists.’

हिन्दी अनुवाद..
सितंबर 1938 में मसूर में पिछडे वर्गोके एक जिला सम्मेलन के दौरान डो. आंबेडकर ने स्पष्ट रूप से साम्यवादियों के नेतृत्व में चल रहे श्रम आंदोलन में शामिल नही होने की बात अपने संबोधन में जाहीर कि थी।
आंबेडकर ने कहा था - ''कम्युनिस्टों के साथ संबंध रखना मेरे लिए यह बिल्कुल असंभव है। मैं कम्युनिस्टों का एक शापित दुश्मन हूं। ''

लाल सलाम मे शामिल होने से पहले बाबा साहब को पढ लो...

By Jigar Shyamlan ||  25 December 2017 at 01:35 

पता नही क्या हो रहा है..??
पिछले पांच सात महीनो से देख रहा हुं, पहले जो लोग जय भीम बोल रहे थे, लिख रहे थे ,आज साथ में लाल सलाम लिखना और बोलना सीख रहे है। यह मेरा अनुभव है।
मैं पसँनली लाल सलाम का विरोधी नही हुं। पर मैने बाबा साहब को पढा है।
बाबा साहबने ईससे दुर रहने की नसिहत दी है। अब मै बाबा साहब से ज्यादा ज्ञानी तो हुं नही।
आंबेडकर मिशन में यह सलाम की एंट्री होने की वजह से हम जो रेसीपी बनाना चाह रहे थे वह अब बिगडती मालूम हो रही है।
नव युवान झांसे में आ रहे है। और बाबा साहब को पढे बिना लाल सलाम में शामिल हो रहे है।
मेरी उन सबसे नम्र अपिल है कि पहले बाबा साहब को पढ ले। यह सब करके क्या हम खूद को आनेवाले समय में जोकर बने हूये देखना चाहते है..??
हमे माक्सँ की क्या आवश्यकता है..??
क्या कोई लाल सलाम ने जातीवाद हटाने के लिये कभी कोई आंदोलन चलाया है..??
हमारी जंग जातीवाद से है पूंजीवाद से नही। हमारा मिशन जातीवाद मिटाना है, अमीरी मिटाना नही।
हमने सदीयो तक कष्ट झैले हमारी पिछडी जाती के कारण, हमारी गरीबी के कारण नही।
आज भी हमे मंदीरो मे जाने की अनूमति नही..
हम गांव में शादीओ में बैन्ड बाजा, बारात नही निकाल पाते,
आज भी शादीओ में हमारे लडको को घोडी पर नही चडने दीया जाता..
ईन सबका कारण क्या हमारी गरीबी है..??? नही.. कभी नही। ईसका कारण हमारी गरीबी नही परंतु समाज में सदीयो से फैला जातीवाद है।
हमारा मिशन हमारा अपना है। जो हमे हमारे ही बहूजन महा नायको ने दिया है। तथागत बुध्ध, ज्योतिबा फूले, शाहूजी महाराज, बाबा साहब आंबेडकर, रामास्वामी पेरियार.. यह हमारे नायक हो सकते है। काल माक्सँ या कोमरैड लाल सलाम बोलनेवाले लोग नही।
हमको आज 70 साल लग गये कान्ग्रेस को समझने में।
हमे और 70 साल लाल सलाम कम्युनिस्ट को समझने में खराब नही करने है।
हमे जय भीम, जय भारत, या जय भीम, नमो बुध्धाय पर ही डंटे रहना है। यह लाल सलाम हमारे मिशन को ईतना बिगाड देगा कि हम सोचते ही रह जायेगें।
अब वक्त हमारे हाथो में है। हमे यह तय करना है कि हमे किसको चूनना है। यदी हमने गलत लोगो का साथ दे दिया तो फिर आनेवाले 70 साल के बाद हम फिर वही राग अलापेंगे की ब्राह्मण बहुत चालाक है , फिर दगा कर गया !!!!
आनेवाले भविष्य में हमारी हालत पर ब्राह्मण को दोष देने से अच्छा यह है कि हम बाबा साहब को पढे और समझदार बने।