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November 07, 2017

કવિતા : હા.. અમે દલિત.

By Jigar Shyamlan ||  07 Nov 2017 


હમણાં કોઈકએ કહ્યું કે પોતાની ઈચ્છા કે મરજી વિરૂધ્ધ કોઈને પિડીત કે શોષિત ન રાખી શકાય... વાત બરાબર છે.

પણ સદીઓથી ધમઁ અને શાસ્ત્રોની આડ લઈ અપમાન અને ભરપુર શોષણ કરવા માટે વ્યવસ્થિત પ્લેટફોમઁ બનવામાં આવ્યું હોય ત્યારે શું....????

હા..અમે દલિત..

જો અનુભવ લેવો છે, કેવો હોય શાપ. અછૂતના ઘેર જન્મી જોઇ લેજો આપ.
સૌ એ નજરથી જુએ જાણે હોય પલિત.
હા.. અમે દલિત..

ખુદને માનો માણસ તો આપો જવાબ.
માણસ અડે માણસને લાગે શેનું પાપ.
માથું પછાડી લોહીથી રંગાઇ ગઇ ભીત.
હા.. અમે દલિત..

ગામમાં રહેવા ન મળ્યું તો વસ્યા બા'ર.
જીવીયે કે મરી ગ્યા કોણે રાખી દરકાર?
વારંવાર વલોવાઇને નિતરેલું નવનિત.
હા.. અમે દલિત..

કંઇ કિંમત ન હતી ન હતી અમારી વગ.
જોડા માથે મૂકી ચાલ્યા ભલે બળ્યા પગ.
કોઇની ફરમાઇશ વિના સર્જાયેલુ ગીત.
હા.. અમે દલિત..

કદી ન ગમી રોજ સૂણી તોછડી વાણી.
સહિયારા કૂવામાંથી ન મળ્યું બૂંદ પાણી.
હરખાય નહિ કોઇ જ્યારે અમને મળી જીત.
હા.. અમે દલિત..

કોઇએ કદી કરી નથી અમને પ્રીત લગાર.
માથે ઉપાડી મેલું અમેં વેંઢાર્યો છે ભાર.
ભભકતો લાવા મ્હાંય પણ બહારથી શીત.
હા.. અમે દલિત..

આગળ ક્યાંથી વધીયે શિક્ષા પર પ્રતિબંધ.
મંદીરોના દરવાજા પણ અમારા માટે બંધ.
સૌએ ઠોકી બેસાડી પરાણે વિકૃત રીત.
હા.. અમે દલિત..

કચડાતા રહ્યા રોજ તોય કરતા રહ્યા કર્મ.
નબળો ન બને દેશ એવો અપનાવ્યો ધર્મ.
સર્વજનના સુખ માટે પ્રગટ થયેલુ હિત.
હા.. અમે દલિત.
- જીગર શ્યામલન 

August 30, 2017

Poem : हम आएंगे



राम ..जब भी ..
तुम होगे संकट में ..
गुजरोगे  वेदनाओं से ..
मदद को हाथ हम ही बढ़ाएंगे ..
तेरे हर कष्ट निवारण हेतु ..
पुल तो हम ही बनायेंगे .....
बन केवट कभी करा देंगे ..
तुझे कष्टों की सरिता पार ..
बन शबरी कभी करेंगे ..
तुझ पर प्यार हम निस्सार ...
क्योंकि युगों से यही तो ..
होता आया है ......
इन्ही निर्बलों शोषितों ने ..
सदा सबल का साथ निभाया है ...
पर क्या तुम दे पाए ...कभी हमारा  साथ ?
किया तुमने हर बार प्रतिघात ...
दे धर्म की दुहाई  बनाया हर युग में .....
 हमें शम्भूक .......
हमारी  हर वेदना पर तुम बने रहे मूक ..
तुम पाते रहे ख्याति ले कर हमारा सहारा ..
छीन लिया षड्यंत्रों से तुमने सारा हक़ हमारा ....
पर देख तेरी व्यवस्था को देने ललकार 
सहस्त्र बहुजन खड़े आज तैयार 
तेरे जुल्मों से न डरे बहके अब तक 
तेरी हर वेदना यंत्रणा से उबर जायेंगे 
 सम्भल जा अब न समझना 
की थमने तेरा हाथ सुन ओ 
मौकापरस्त राम ! हम आएंगे 
-PD

Poem :- मनुवादी हथकंडे



प्रचार के लिए
देखो ये मनुवादी 
क्या क्या हथकंडे 
अपनाते हैं ,,
देते हैं सजा 
शम्भुक को ..
वही राम .....
जा शबरी के 
बेर खाते  हैं ,,
चढ़ते हैं नाव 
केवट की ,,
उतरने को 
नदी पार ..
हो जाते हैं 
वहीँ देखो 
लेने को 
वानरों की 
मदद तैयार 
खेलते हैं ..
द्रोणाचार्य ,,
जाति का दांव 
ले गुरु दक्षिणा 
देते एकलव्य को घाव 
कभी वाल्मीकि से 
रामायण रचवाते 
और लोकप्रियता की 
पायदान पर तुलसी को चढ़ाते 
कर खुद ही बंटवारा 
देते एकता का नारा 
देते झूठे भुलावे 
बस वादों के बहकावे 
जन जन को लड़वाते 
भाषणों से उकसाते 
युगों से अपने कहे अनुसार 
हमको चलाते हैं 
उलझा हमको 
खुद के अतित्व में 
सीढ़ी  सफलता का 
ये चढ़ जाते हैं ...
-PD

Poem : होगे राम तुम !



होगे राम तुम !
खाए होंगे दिखावे के लिए 
शबरी के बेर भी तुमने 
बैठे होगे ढोंग स्वांग रच 
बहुजन हिताय सुखाय का 
केवट की नाव  मे भी तुम 
झूठे आदर्शो की सरंचना लिए 
बने होगे पतितपावन भी तुम 
पर याद रख ओ ! मनुवादी राम 
अयोध्या नरेश सीताराम !
मैं ! शम्भूक नहीं हूँ  
तेरे निरर्थक तर्कों के आगे 
हार मान चढ़ा दिया जाऊं सूली 
तेरे दम्भ भरे झूठे शास्त्रों से 
मान हार मारा जाऊं अकारण 
मैं वो निरीह निर्बल अस्पृश्य 
शभूक नहीं हूँ 
तेरे धोखे छलकपट में आ 
बिखर जाऊं मैं वो दुर्बल नहीं हूँ 
मैं आज का शम्भूक हूँ 
जो ललकार रहा तुझको 
आ कर ले शास्त्रार्थ !
परख ले योग्यता को 
देख खड़ा साक्षात 
तेरे षड्यंत्रों  कुचक्रों से 
न होऊंगा देख ! आहत 
तेरी वाकपटुता से अब 
न होऊंगा तंित हताहत 
देख बांध ली मुट्ठी मैंने 
उठा लिए हथियार 
और तेरी हर प्रवंचना 
को देख रहा ललकार 
मर्द है तो अब कर के दिखा मर्दन 
मैं कर दूँगा हर चाल तेरी अवचेतन 
अब मैं लूंगा तुझसे प्रतिकार 
ये अंतिम होगा मेरा वार 
होगे हताहत सरेआम तुम 
आये गए ओ राम तुम !
-PD

August 14, 2017

गोरखपुर नरसंहार पर कविता : मासूम बच्चो के मां बाप के दर्द को महसूस करते हुये

By Veeru Ji  ||  13 Aug 2017 at 15:00


 कितनी मिन्नतों के बाद उसे पाया होगा।
तब जाके खुशियों का मौका आया होगा

कभी हाथों में तो कभी पलने में झुलाया होगा।
तब जाके बच्चे को चैन से सुलाया होगा।

उसकी किलकारी से पूरा घर चहकाया होगा।
उसे देख मां बाप का चैहरा मुशकुराया होगा ।

बच्चे को बुखार थोडा आया होगा
तब उसे गौरखपुर लाया होगा।

सहम कर डर चैहरे पे उतर आया होगा
जब बच्चे के मास्क में ऑक्सीजन न आया होगा।

आंखों से समंदर भी निकल आया होगा
जब जिगर के टुकडे को तडपता हुआ पाया होगा।

थम गंई होंगी सांसे जब बच्चे को खामौश पाया होगा।
जम गये होंगे होंठ जब बच्चे की लाश को उठाया होगा।

कल वो रोता था अब मां बाप को रुलाया होगा।
छोड गया लाल ये भी यंकी न आया होगा ।

कैसे अपने आप को समझाया होगा।
जब अपने कलेजे के टुकडे को दफनाया होगा।

चीख पुकार और मातम का साया होगा।
ये देख शर्म से आसमां भी शर्माया होगा

अभी तलक अन्न न खाया होगा
जब अांचल से दूध को बहाया होगा

हर बार बच्चे का चैहरा अपनी आंखों मे आया होगा।

जब अपने सामने बच्चे को खोया होगा...