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April 17, 2018

पुराणो मे क्षत्रीयो और ब्राह्मणो के बीच की लडाई : राजा वेन की कहानी

By Social Media Desk




आप को तो सिर्फ परशुराम और क्षत्रीयो की ही कहानी पता है, पर ब्राह्मणो और क्षत्रीयों के बीच मे ऐसी लडाईयों का बहोत सा वर्णन वेदो और पुराणो मे पाया जाता है, इस मे से एक बताता हु.

एक महा प्रतापी राजा वेन नाम का राजा हुआ, उसने अपने राज्य का सर्वे सर्वा अपने आप को घोषीत कर दिया और यग्न और अन्य धार्मीक परंपराओ को त्याग दिया. ब्राह्मणो ने बाद मे उस राजा को समजाया पर वो नही समजा तो उसे हराकर मार दिया और उस के पुत्र पृथु को राजा बनाआ. पृथु ने अपने पीता की मोत का बदला लेने की जगह ब्राह्मणो का भक्त बनकर राज किया.

- ये सब वर्णन "हरिवंश पुराण" के प्रथम अध्याय मे है. ब्राह्मणो के इतने अंधे भक्त ये लोग हो चुके थे की अपने पुरखो की मौत का बदला लेने कि सोच तो न रख पाते पर उनको ही पुजते चले गए.

इस प्रकार की बहोत सी बाते क्षत्रीयो और ब्राह्मणो के बीच के मुद्दो को पुराणो मे सामेल किया गया है ताकी मानसीक गुलामी कभी कम न हो. पर आज इस आधुनीक युग मे भी अगर ब्राह्मण अपनी श्रेष्ठता को मनवाने के लिए क्षत्रीयों को अछुतो और शुद्रो के बीच लडा रहा हो तब क्षत्रीयों को ये सब चालबाजी समज लेनी चाहिए और धार्मीक किताबो मे लिखा गया गुलामी का इतिहास समजकर समजदारी से काम लेना चाहिए. आज क्षत्रीयों का हिस्सा भी SC ST OBC नही ब्राह्मण खा रहा है. दिमाग को खोलकर हमे साथ अगर नही भी दे सकते तो रास्ते मे रोडा मत डालो. आप के हिस्से की भी लडाई लडी जा रही है.


(This Story also narrated By Dr Ambedkar , Volume 3, CHAPTER 15 , Brahmins Versus Kshatriyas )

December 25, 2017

जब पुस्तक प्रेमी ने एक पुस्तक जलाया

By Social Media Desk




जब पुस्तक प्रेमी ने एक पुस्तक जलाया

आज 25 दिसंबर है न...

जी हाँ मैं बाबासाहब अम्बेडकर और मनुस्मृति की ही बात कर रहा हूँ

ब्राह्मणवाद के खिलाफ एक बहुत ही बड़ा क्रांतिकारी कदम जो इतिहास में दर्ज हो चूका है |

महाड महासंघर्ष का हिस्सा बनी हुई इस क्रांतिकारी घटना से कुछ ऐसी बाते भी जुडी हुई है जिसे आज के दिन  याद करना जरूरी है |

इस दिन के अवसर पर.....

मुस्लिम सज्जन फत्ते खान को याद करना जरुरी है क्योंकि  मनुवादियोने तो भरसक प्रयास किया था की मनुस्मृति दहन के इस क्रांतिकारी कार्यक्रम के लिए कोई मैदान ही न मिले; ऐसे में फ़तेह खान ने अपनी निजी जमीन Free of Cost दी थी |

मनुवादीयो ने  इस बात का भी ध्यान रखा था की वहां पर पानी, खाना और यहाँ तक की वहां तक पहुँचने के लिए कोई वाहन  भी न मिले |

इसीलिए तो.... 

स्वयं बाबासाहब को मुंबई से पदमावती नामक बोट से वाया धरमतार आने की बजाय दसगाँव पोर्ट से आना पड़ा था और वह भी 5 किलोमीटर तो चलना पड़ा था | क्योंकि कोई भी वाहन चालक मनुवादियों के विरोध के चलते  ले जाने के लिए तैयार न था |

कार्यकर्ता ओको पानी और खाना साथ लेकर आने के लिए कहा गया था |

कार्यकर्ताओ को शपथ दिलाई गई थी की....

1. मैं चातुर्वर्ण में विश्वास नहीं रखूंगा ।

2. मैं जाति आधारित भेदभाव को नहीं मानूंगा ।

3. मैं अश्पृश्यता को हिंदुत्ववादी अभिशाप मानूंगा और उसे ख़तम करने का हर संभव प्रयास करूँगा ।

4. मैं असमानता का विरोध करूँगा और खान-पान के किसीभी प्रतिबन्ध का पालन नहीं करूँगा ।

5. मैं इस बात को भलीभांति मानूंगा की अछूतों को भी मंदिर प्रवेश, जलसंसाधन, पाठशाला एवं अन्य सुविधाओ का समान अधिकार है |

बाबासाहब ने अपना ऐतिहासिक भाषण देते हुए... 

इस मीटिंग  की तुलना  24 जनवरी 1749 के दिन फ्रांस में मिली किंग 16th लुइ की मीटिंग के साथ की थी; जहाँ पर समानता की एक ऐसी ज्योत जली थी की जिसमे राजा रानी समेत कई सामंत जलकर खाक हो गए थे | और उसके बाद 15 साल तक फ्रांस में गृहयुद्ध चलता रहा |

 इस फ्रेंच क्रांति ने न केवल फ्रांस के लिए सुख समृद्धि की नींव डाली बल्कि समूचे यूरोप में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया |

बाबासाहब ने यह भी कहा था की केवल मनुस्मृति को जलाने मात्र से ब्राह्मण्य ख़तम नहीं होगा; हमें हमारे अन्दर जो  ब्राह्मण्य ग्रस्त व्यक्ति है उसको भी जलाना होगा ।

यह भी कहा था की....

अश्पृश्यता को ख़तम करना है तो हमें अंतर्भोज एवं अंतरजातीय विवाह को मान्यता देनी होगी |

उन्होंने उच्चवर्णीयो को हिदायत देते हुए कहा था की.....  

वे इस सामाजिक क्रांति को रोकने की कोशिश न करे, न्याय के सिद्धांत के आधार पर उसे शांतिपूर्ण तरीके से  आकार लेने दे; अगर वे चाहते हे की भविष्य में सशस्त्र संघर्ष न हो |

25 दिसंबर 1927 के दिन रात 9 बजे 
बापुसाहिब सहस्त्रबुध्धे और अन्य 5-6 अछूत संतो के करकमलो से मनुस्मृति का दहन किया गया |

उस वक्त के प्रचार माध्यमो ने बाबासाहब को भीमासुर नाम से नवाजा था |

मगर बाबासाहब को इस बात की जरा से भी परवाह नहीं थी क्योंकि 

वे समता, स्वतंत्रता, बंधुता एवं न्याय के आन्दोलन को आगे ले जाने के लिए अपनी जान के किम्मत पर भी प्रतिबध्ध थे |

मनुस्मृति दहन दिन के इस ऐतिहासिक अवसर पर सामाजिक क्रांति की ढेर सारी मंगल कामनाए

November 22, 2017

झाँसी की झलकारी

By Social Media Desk


पूरा नाम : झलकारी बाई
जाति : कोरी , बहुजन
जन्म : 22 नवम्बर 1830
मृत्यु ः 1858
जन्म स्थान : भोजला ग्राम
पिता : सदोबा सिंह कोरी
माता : जमुना देवी
विवाह : पूरन सिंह कोरी


झलकारी बाई का इतिहास :
झलकारी बाई का जन्म एक साधारण कोरी परिवार में हुआ था। वे एक साधारण सैनिक की तरह रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल हुई थी। लेकिन बाद में वह रानी लक्ष्मीबाई की विशेष सलाहकार एवं महिला सेना की सेनापति बनी और महत्वपूर्ण निर्णयों में भी भाग लेने लगी।
बगावत के समय, झाँसी के किले पर युद्ध के समय वह अपने आप को झाँसी की रानी कहते हुए लड़ी ताकि रानी लक्ष्मीबाई सुरक्षित रूप से आगे बढ़ सके.
बुन्देलखण्ड में झलकारी बाई कोरी की महानता एवं वीरता को हमेशा याद किया जाता है।
उनका जीवन और विशेष रूप से ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ उनके लड़ने की कला को बुन्देलखण्ड ही नही बल्कि पूरा भारत हमेशा याद रखेगा। कोरी जाति के तौर पर उनकी महानता ने उत्तरी भारत में कोरी जाति के जीवन पर काफी प्रभाव डाला। बाद में कुछ समय बाद ब्रिटिशों द्वारा झलकारीबाई को फाँसी दे दी गयी थी।
उनके नाम को कोरी जाति का सम्मान और गर्व बताया जाता है। इसे देखते हुए उनके जीवन पर काफी शोध किये गये और उनके जीवन के बारे में कुछ रोचक तथ्य भी मिले। लेकिन अधिकतर समय झलकारी बाई को कोरी जाति की इतिहासिक नायिका कहा गया है।
झलकारी बाई कोरी की जीवनी –
झलकारी बाई सदोबा सिंह और जमुना देवी की बेटी थी। उनका जन्म 22 नवम्बर 1830 को झाँसी के नजदीक भोजला ग्राम में हुआ था। उनकी माता के मृत्यु के बाद, जब वह किशोर थी, तब उनके पिता ने उनका एक बेटे की तरह पालन पौषण किया, बचपन से ही वह घुड़सवारी और हथियार चलाने में माहिर थी। लेकिन उस समय की सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए, झलकारी बाई प्रारंभिक शिक्षा नहीं ले सकीं। लेकिन एक योद्धा की तरह झलकारी बाई ने काफी प्रशिक्षण प्राप्त किया था।
झलकारीबाई को रानी लक्ष्मीबाई के समान माना जाता है। उन्होंने एक तोपची सैनिक पूरन सिंह से विवाह किया था। जो रानी लक्ष्मीबाई के ही तोपखाने की रखवाली किया करते थे, पूरन सिंह कोरी ने ही झलकारीबाई को रानी लक्ष्मीबाई से मिलवाया था।बाद में झलकारी बाई भी रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल हो गयी थी। सेना में शामिल होने के बाद झलकारीबाई ने युद्ध से सम्बंधित अभ्यास ग्रहण किया और एक कुशल सैनिक बनी।
1857 के विद्रोह के समय जनरल रोज ने अपनी विशाल सेना के साथ 23 मार्च 1858 को झाँसी पर आक्रमण किया। रानी ने वीरतापूर्वक अपने 5000 के सैन्य दल से उस विशाल सेना का सामना किया। रानी कालपी में पेशवा द्वारा सहायता की प्रतीक्षा कर रही थी ,लेकिन उन्हें कोई सहायता नहीं मिल सकी क्योकि तात्या टोपे जनरल रोज से पराजित हो चुके थे।
जल्द ही अंग्रेज फ़ौज झाँसी में घुस गयी थी और रानी अपनी झाँसी को बचाने के लिए जी जान से लड़ रही थी। तभी झलकारीबाई ने रानी लक्ष्मीबाई के प्राणों को बचाने के लिये खुद को रानी बताते हुए लड़ने का फैसला किया, इस तरह झलकारीबाई ने पूरी अंग्रेजी सेना को अपनी तरफ आकर्षित कर रखा था। ताकि दूसरी तरफ से रानी लक्ष्मीबाई सुरक्षित बाहर निकाल सके।
इस तरह झलकारीबाई खुद को रानी बताते हुए लडती रही और जनरल रोज की सेना भी झलकारीबाई को ही रानी समझकर उन पर प्रहार करती रही, लेकिन दिन के अंत में उन्हें पता चल गया था की वह रानी नही है।
झलकारीबाई की प्रसिद्धि :
1951 में वी. एल. वर्मा द्वारा रचित उपन्यास झाँसी की रानी में उनका उल्लेख किया गया है। वर्मा ने अपने उपन्यास में झलकारीबाई कोरी को विशेष स्थान दिया है। उन्होंने अपने उपन्यास में झलकारीबाई को कोरियन और रानी लक्ष्मीबाई के सैन्य दल की साधारण महिला सैनिक बताया है।
एक और उपन्यास में हमें झलकारीबाई का उल्लेख दिखाई देता है।
जो रामचन्द्र हेरन द्वारा लिखा गया था, उस उपन्यास का नाम माटी था। हेरन ने झलकारीबाई को “उदात्त और वीर शहीद” कहा है।
झलकारीबाई कोरी का पहला आत्मचरित्र 1964 में भवानी शंकर विशारद द्वारा लिखा गया था। भवानी शंकर ने उनका आत्मचरित्र का लेखन वर्मा के उपन्यास और झलकारी बाई के जीवन पर आधारित शोध को देखते हुए किया था।
बाद में कुछ समय बाद महान जानकारो ने झलकारीबाई की तुलना रानी लक्ष्मीबाई के जीवन चरित्र से भी की।
झलकारीबाई की महानता :
कुछ ही वर्षो में भारत में झलकारीबाई की छवि में काफी प्रख्याति आई है, झलकारीबाई की कहानी को सामाजिक और राजनैतिक महत्ता दी गयी और लोगो में भी उनकी कहानी सुनाई गयी। बहुत से संस्थाओ द्वारा झलकारीबाई के मृत्यु दिन को शहीद दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
झलकारीबाई की महानता को देखते हुए ही उन्हें सम्मानित करने के उद्देश से पृथक बुन्देलखण्ड राज्य बनाने की मांग की गयी थी। भारत सरकार ने झलकारीबाई के नाम का पोस्ट और टेलीग्राम स्टेम्प भी जारी किया है।
भारतीय पुरातात्विक सर्वे ने अपने पंच महल के म्यूजियम में झाँसी के किले में झलकारीबाई का भी उल्लेख किया है।
भारत की सम्पूर्ण आज़ादी के सपने को पूरा करने के लिए प्राणों का बलिदान करने वाली वीरांगना झलकारीबाई का नाम अब इतिहास के काले पन्नो से बाहर आकार पूर्ण चाँद के समान चारों ओर अपनी आभा बिखेरने लगा है।

झलकारी बाई की बहादुरी को हम निम्न पंक्तियों में देख सकते है-
जा कर रण में ललकारी थी!
वह तो झाँसी की झलकारी थी!!
गोरों से लड़ना सिखा गयी!
है इतिहास में झलक रही,
वह भारत की ही नारी थी!!