April 28, 2017

बाबासाहब डॉ आम्बेडकर द्वारा दिया गया मूल संदेश : शिक्षित करो, आंदोलित करो, संगठित करो..

"Educate Agitate Organise - शिक्षित करो, आंदोलित करो, संगठित करो.. "

दिनांक 9 मार्च, 1924 को मुंबई के दामोदर होल में शाम 4.00 बजे एक सभा का आयोजन किया गया था.. उस सभा में “बहिस्कृत हितकारिणी सभा” नाम की संस्था गठन करने का प्रस्ताव बाबासाहब डॉ आंबेडकर ने रखा और उसे मान्य किया गया था..

इसी सभा में संगठन का घोषवाक्य तय किया गया, “Educate Agitate Organise” अर्थात "शिक्षित बनाओ, आंदोलित करो (चेताओ, सावधान करो, ) और संगठित करो"..

मूलतः इस वाक्य का जो विस्तृत अर्थ सभा में तय किया गया था वह यह था की “लोगो को शिक्षित करो, उनके मन में अपनी दुर्दशा के प्रति चिढ उत्पन्न करो और उनका संगठन बनाओ”.. यहाँ पर शिक्षित करने का मतलब केवल डिग्रीधारी बनाने से नहीं है बल्की जागृत करने से है..

बाबासाहब ऐसा भी कहते थे की “जो कोम अपना इतिहास नहीं जानती वह अपने भविष्य का निर्माण नहीं कर सकती”.. इसका साफ मतलब यह है की बाबासाहब चाहते थे की समाज को उनके इतिहास के बारे में जानकारी दी जाय.. वह क्या थे? और क्या बन चुके है? उसकी जानकारी दी जाय.. उन्हें उनकी दीन-हीन अवस्था के प्रति जागृत किया जाय, सावधान किया जाय.. इसके लिये कौन जिम्मेवार है? इसकी जानकारी दी जाय ताकि उनको दोस्त और दुश्मन की पहचान हो सके..

बाबासाहब का कहना यह था की अगर इस दिशा में समाज को शिक्षित किया गया तो स्वाभाविक रूप से उनके मन में अपनी दुर्दशा के प्रति चिढ उत्पन्न होगी.. जब यह चिढ उत्पन्न हो जायगी तो फिर उनका जो संगठन निर्माण करना है वह आसान हो जायेगा..

मनोविज्ञान का एक सिध्धांत है की जो लोग समदुखी (Co-Sufferer) होते है वह आसानी से एक दुसरे की मदद के लिए इकठ्ठा आ जाते है..  जब उन्हें पता चलेगा की वह सब मनुवादी व्यवस्था के शिकार है तो वह इकठ्ठा हो कर स्वाभाविक रूप से उस व्यवस्था के खिलाफ बगावत करेंगे..

यहाँ शिक्षित करने का मतलब गुलामी का एहसास कराने से भी है; इसीलिए तो बाबासाहब कहते थे की, "गुलामो को गुलामी का अहसास करा दो वह स्वयं ही विद्रोह कर उठेंगे"..

बाद के दिनों में इस घोषवाकय में कुछ फेर बदल हुआ और वह इस तरह से पहचाने जाना लगा, “Educate Organise Agitate” अर्थात “शिक्षित करो, संगठित करो और संघर्ष करो”.. यहाँ तक तो कोई समस्या नहीं थी क्यूंकि यह भी कुछ हद तक तर्कसंगत है |

यहाँ शिक्षित करो का वही अर्थ रहता है जो बहिस्कृत हितकारिणी सभा में तय हुआ था और जो चेताओ का नारा था वह भी इस शिक्षित करो के नारे में सम्मिलित हो जाता है..

अब जिनको शिक्षित किया गया है उनको संगठित करना आवश्यक है क्यूंकि व्यवस्था परिवर्तन का जो संघर्ष है वह कडा संघर्ष है उसमे बहुत ज्यादा सामूहिक प्रयासों की.. बाबासाहब तो कहते थे की एक दयाहीन संघर्ष की आवश्यकता है.. इसीलिए इसी क्रम में इस सूत्र को बाबासाहब के जीवन काल में ही तर्कसंगत माना गया..

मगर अनर्थ तो तब हो गया जब आज के दीनो में इस सूत्र को कुछ इस तरह से प्रचलित किया जा रहा है की  “Educate Organise  Agitate” अर्थात “शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो”..

यहाँ पर यह जिम्मेवारी समाज पर छोड़ दी गई की आप शिक्षित बनो और यहाँ शिक्षा का जो अर्थ है वह डिग्रीधारी बनने तक सिमित रह गया.. अब तो आन्दोलन में कार्यरत समूह तो शिक्षित (डिग्रीधारी) बनते गया साथ साथ उनका अनुकरण करते हुए समाज से आये गरीब और वंचित लोग भी शिक्षित (डिग्रीधारी) बनते गए.. वे समाज का बुध्धिजीवी वर्ग बनते चला गया.. साथ साथ उपभोगवादी भी बनते गया.. कुछ हद तक वह संगठित भी हुआ मगर संघर्ष करते वक्त अपने आप को स्थापित करने के मार्गक्रमण में वह संकुचित बन गया.. क्यूँकी संघर्ष में विस्थापन अवश्यंभावी होता है; वह अब अपने हितो को स्थापित रखना चाहता है इसीलिए वह विस्थापन से कोशो दूरी बनाये रखने के लिए संघर्ष के मार्ग पर चलना नहीं चाहता..

अब वह एक ऐसा अजगर (उदितराज, आठवले, पासवान, जाधव) बन गया है की जिसे पेट भरने के लिए किसी नीतिशास्त्र की आवश्यकता नहीं.. बस उसे तो सिर्फ खाना चाहिए..

इस तरह बाबासाहब का जो व्यवस्था परिवर्तन का लक्ष्य था, जो स्वप्न था वह इसी संकुचितता की वजह से अपने गंतव्य तक पहुँचने में लड़खड़ा रहा है..

यह हालात बाबासाहब डॉ अम्बेडकर ने अपने जीते जी देख लिया था इसीलिए तो 18 मार्च 1956 को आगरा के रामलीला मैदान में कहा था की, “मुझे पढ़े लिखे लोगो ने धोखा दिया है “

यही हालात इस बात की ओर इंगित करते है कि हम बाबा को तो मानते है मगर बाबा की नहीं मानते..


- कुंदन कुमार





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