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July 07, 2018

દિવંગત લીના પટેલની સ્મૃિતમાં

By Raju Solanki  || Written on 3 June 2018

‘એક ટુકડો આકાશનો’, લીના પટેલના લેખોનો સંગ્રહ છે. ‘સેવા’ સંસ્થાના મુખપત્ર ‘અનસુયા’માં લીનાએ શાકભાજી વેચતી, માર્કેટમાં માથે વજન ઉંચકીને ફેરા કરતી ને માથોડા કામદારના નામે ઓળખાતી, અગરબત્તી બનાવતી, બીડી બનાવતી સ્ત્રીઓના જીવલેણ જીવતરની વ્યથાકથાઓ આલેખી હતી. એમની રોજિંદી એવી સમસ્યાઓ કે જે ક્યારેય સભ્ય સમાજને સમસ્યા લાગી જ નથી, જેમ કે માર્કેટમાં આખો દિવસ શાકભાજી વેચતી સ્ત્રીઓ માટે ટોઇલેટની નાની અમથી વ્યવસ્થા હોવી જોઇએ એ આપણને સમજાયું જ નથી. લીનાએ આ બધા પ્રશ્નોની ભીતરમાં જઇને ફીલ્ડ વર્ક કરેલું અને આ અભણ સ્ત્રીઓને સમજાય એવી બોલચાલની ભાષામાં એમની જિંદગીનો નિચોડ શબ્દસ્થ કરેલો. લીનાની સ્મૃિતમાં એના લેખો ગ્રંથસ્થ થાય એવી લાગણીથી પ્રેરાઈને સંગીતા પટેલે સંપાદન કર્યું. એ આ નાનકડું પુસ્તક.
સેવાની કાર્યકર બહેનોને સિવિલ હોસ્પિટલમાં કેન્સરની તપાસ અર્થે લઈ જતાં અને કેન્સરની આગોતરી જાણ સારુ યોજેલી તાલીમ દરમિયાન લીનાને પોતાને ખબર પડી કે તેને પણ સ્તન કેન્સર થયું છે અને અહીંથી શરૂ થયો હતો તેનો મહાભયાનક કેન્સર સામેનો જંગ. કેન્સર થયું છે એવું ‘સેવા’ના એકપણ સહકાર્યકરને તેણે જણાવેલું નહીં. માત્ર તેના આપ્તજનોને જ રોગની ખબર હતી. ઓપરેશન પછી ધીરે ધીરે સૌને ખબર પડેલી. કેન્સરનો મહાવજ્રપાત જીરવવો સહેલો નહોતો.
મુદ્રણ કળાની નિષ્ણાત લીનાએ જે ખંતથી અને લગનથી વાલજીભાઈ પટેલનો લેખ સંગ્રહ ‘કર્મશીલની કલમે’ કે દિવંગત ટીકેશ મકવાણાનો લેખ સંગ્રહ ‘પથ્થર તો તબિયત સે ઉછાલો યારો’ કે ‘સેવાના ચાંદ’ જેવા ગ્રંથો તૈયાર કરેલા એટલી ચીવટથી એના લેખોનો આ સંગ્રહ અલબત્ત, બહાર પાડી શકાયો નથી. થોડીક પ્રુફની ભૂલો રહી ગઈ છે. એ બદલ ક્ષમા પ્રાર્થનાસહ લીનાના મિત્રો, શુભેચ્છકો, એના સુખદુખના સાથીદારો સમક્ષ મુકીએ છીએ આ ‘એક ટુકડો આકાશનો.’

August 27, 2017

पढ़िए, राम रहीम केस की पीड़िता साध्वी की चिट्ठी, जिससे शिकंजे में फंसा बलात्कारी बाबा

By Vishal Sonara || 27 Aug 2017 at 09:13

डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को दो महिलाओं से बलात्कार के आरोप में पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत ने दोषी करार दिया है। 
रेप पीड़िता साध्वी की प्रधानमंत्री को लिखी गुमनाम चिट्ठी को पंचकूला के स्थानीय सांध्य दैनिक अखबार 'पूरा सच' में अक्षरश: प्रकाशित किया गया था। इसके बाद 'पूरा सच' अखबार के संपादक रामचन्द्र छत्रपति के घर में घुसकर उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया गया था। उसी चिट्ठी के आधार पर राम रहीम को सीबीआई कोर्ट ने रेपिस्ट करार दिया है। पीडीत साध्वी की उसी गुमनाम चिट्ठी को आप पढ़िए किन शब्दों में पीड़िता ने बयां किया था दर्द-:


सेवा में,
माननीय प्रधानमंत्री महोदय जी
श्री अटल बिहारी वाजपेयी, भारत सरकार
विषय : डेरे के महाराज द्वारा सैकड़ों लड़कियों से बलात्कार की जांच करें।
 श्रीमान जी,
यह है कि मैं पंजाब की रहने वाली हूं और अब पांच साल से डेरा सच्चा सौदा सिरसा, हरियाणा (धन-धन सतगुरु तेरा ही आसरा) में साधु लड़की के रूप में सेवा कर रही हूं। मेरे साथ यहां सैकड़ों लड़कियां भी डेरे में 18-18 घंटे सेवा करती हैं। हमारा यहां शारीरिक शोषण किया जा रहा है। साथ में डेरे के महाराज गुरमीत सिंह द्वारा यौनिक शोषण (बलात्कार) किया जा रहा है। मैं बीए पास लड़की हूं। मेरे परिवार के सदस्य महाराज के अंध श्रद्धालु हैं जिनकी प्रेरणा से मैं डेरे में साधु बनी थी।
साधु बनने के दो साल बाद एक दिन महाराज गुरमीत की परम शिष्या साधु गुरुजोत ने रात के 10 बजे मुझे बताया कि आपको पिता जी ने गुफा (महाराज के रहने का स्थान) में बुलाया है। मैं क्योंकि पहली बार वहां जा रही थी, मैं बहुत खुश थी। यह जानकर कि आज खुद परमात्मा ने मुझे बुलाया है। गुफा में ऊपर जाकर जब मैंने देखा महाराज बेड पर बैठे हैं। हाथ में रिमोट है, सामने टीवी पर ब्लू फिल्म चल रही है। बेड पर सिरहाने की ओर रिवॉल्वर रखा हुआ है। मैं यह सब देखकर हैरान रह गई। मुझे चक्कर आने लगे। मेरे पांव के नीचे की जमीन खिसक गई। यह क्या हो रहा है। महाराज ऐसे होंगे? ऐसा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।
 
महाराज ने टीवी को बंद किया व मुझे साथ बिठाकर पानी पिलाया और कहा कि मैंने तुम्हें अपनी खास प्यारी समझकर बुलाया है। मेरा यह पहला दिन था। महाराज ने मेरे को बांहों में लेते हुए कहा कि हम तुझे दिल से चाहते हैं। तुम्हारे साथ प्यार करना चाहते हैं क्योंकि तुमने हमारे साथ साधु बनते वक्त तन-मन-धन सब सतगुरु के अर्पण करने को कहा था। तो अब ये तन-मन हमारा है। मेरे विरोध करने पर उन्होंने कहा कि इसमें कोई शक नहीं हम ही खुदा हैं। जब मैंने पूछा कि क्या यह खुदा का काम है तो उन्होंने कहा -
1 - श्री कृष्ण भगवान थे, उनके यहां 360 गोपियां थीं जिनसे वह हर रोज प्रेम लीला करते थे। फिर भी लोग उन्हें परमात्मा मानते हैं, यह कोई नई बात नहीं है।
2 - यह है कि हम चाहें तो इस रिवॉल्वर से तुम्हारे प्राण पखेरू उड़ाकर दाह संस्कार कर सकते हैं। तुम्हारे घरवाले इस प्रकार से हमारे पर विश्र्वास करते हैं व हमारे गुलाम हैं। वह हमारे से बाहर जा नहीं सकते। यह तुमको अच्छे से पता है।
3 - यह कि हमारी सरकार में बहुत चलती है। हरियाणा व पंजाब के मुख्यमंत्री, पंजाब के केंद्रीय मंत्री हमारे चरण छूते हैं। राजनीतिज्ञ हमसे समर्थन लेते हैं, पैसा लेते हैं और हमारे खिलाफ कभी नहीं जाएंगे। हम तुम्हारे परिवार के नौकरी लगे सदस्यों को बर्खास्त करवा देंगे। सभी सदस्यों को अपने सेवादारों (गुडों) से मरवा देंगे। सबूत भी नहीं छोड़ेंगे। यह तुम्हें अच्छी तरह पता है कि हमने गुंडों से पहले भी डेरे के प्रबंधक फकीर चंद को खत्म करवा दिया था जिनका अता-पता तक नहीं है। ना ही कोई सबूत बकाया है। जो कि पैसे के बल पर हम राजनीतिक व पुलिस और न्याय को खरीद लेंगे।
इस तरह मेरे साथ मुंह काला किया और पिछले तीन मास में 20-30 दिन बाद किया जा रहा है। आज मुझको पता चला कि मेरे से पहले जो लड़कियां रहती थीं, उन सबके साथ मुंह काला किया गया है। डेरे में मौजूद 35-40 साधु लड़की 35-40 वर्ष की उम्र से अधिक हैं जो शादी की उम्र से निकल चुकी हैं। जिन्होंने परिस्थितियों से समझौता कर लिया है। इनमें ज्यादातर लड़कियां बीए, एमए, बीएड, एमफिल पास हैं मगर घरवालों के अंधविश्र्वासी होने के कारण नरक का जीवन जी रही हैं।
हमें सफेद कपड़े पहनना, सिर पर चुन्नी रखना, किसी आदमी की तरफ आंख न उठाकर देखना, आदमी से 5-10 फुट की दूरी पर रहना महाराज का आदेश है। दिखाने में देवी हैं मगर हमारी हालत वेश्याओं जैसी है। मैंने एक बार अपने परिवारवालों को बताया कि डेरे में सबकुछ ठीक नहीं है तो मेरे घर वाले गुस्से में होते हुए कहने लगे कि अगर भगवान के पास रहते हुए ठीक नहीं है तो ठीक कहां है। तेरे मन में बुरे विचार आने लग गए हैं। सतगुरु का सिमरण किया कर। मैं मजबूर हूं। यहां सतगुरु का आदेश मानना पड़ता है। यहां कोई भी दो लड़कियां आपस में बात नहीं कर सकतीं। घरवालों को टेलीफोन मिलाकर बात नहीं कर सकतीं।
घरवालों का हमारे नाम फोन आए तो हमें बात करने का महाराज के आदेशानुसार हुक्म नहीं है। यदि कोई लड़की डेरे की इस सच्चाई के बारे में बात करती है तो महाराज का हुक्म है कि उसका मुंह बंद कर दो। पिछले दिनों बठिंडा की लड़की साधु ने जब महाराज की काली करतूतों का सभी लड़कियों के सामने पर्दाफाश किया तो कई साधु लड़कियों ने मिलकर उसे पीटा। जो आज भी घर पर इस मार के कारण बिस्तर पर पड़ी है। जिसका पिता ने सेवादारों से नाम कटवाकर चुपचाप घर बैठा दिया है। जो चाहते हुए भी बदनामी और महाराज के डर से किसी को कुछ नहीं बता रही।
एक कुरुक्षेत्र जिले की एक साधु लड़की जो घर आ गई है, उसने अपने घर वालों को सब कुछ सच बता दिया है। उसका भाई बड़ा सेवादार था, जो कि सेवा छोड़कर डेरे से नाता तोड़ चुका है। संगरूर जिले की एक लड़की जिसने घर आकर पड़ोसियों को डेरे की काली करतूतों के बारे में बताया तो डेरे के सेवादार / गुंडे बंदूकों से लैस लड़की के घर आ गए। घर के अंदर से कुंडी लगाकर जान से मारने की धमकी दी व भविष्य में किसी से कुछ भी नहीं बताने को कहा। इसी प्रकार कई लड़कियां जैसे कि जिला मानसा (पंजाब), फिरोजपुर, पटियाला, लुधियाना की हैं। जो घर जाकर भी चुप हैं क्योंकि उन्हें जान का खतरा है। इसी प्रकार जिला सिरसा, हिसार, फतेहबाद, हनुमान गढ़, मेरठ की कई लड़कियां जो कि डेरे की गुंडागर्दी के आगे कुछ नहीं बोल रहीं।
अत: आपसे अनुरोध है कि इन सब लड़कियों के साथ-साथ मुझे भी मेरे परिवार के साथ जान से मार दिया जाएगा अगर मैं इसमें अपना नाम-पता लिखूंगी। क्योंकि मैं चुप नहीं रह सकती और ना ही मरना चाहती हूं। जनता के सामने सच्चाई लाना चाहती हूं। अगर आप प्रेस के माध्यम से किसी भी एजेंसी से जांच करवाएं तो डेरे में मौजूद 40-45 लड़कियां जो कि भय और डर में हैं। पूरा विश्र्वास दिलाने के बाद सच्चाई बताने को तैयार हैं। हमारा डॉक्टरी मुआयना किया जाए ताकि हमारे अभिभावकों व आपको पता चल जाएगा कि हम कुमारी देवी साधु हैं या नहीं। अगर नहीं तो किसी के द्वारा बर्बाद हुई हैं। ये बता देंगे कि महाराज गुरमीत राम रहीम सिंह जी, संत डेरा सच्चा सौदा के द्वारा तबाह की गई हैं।
 प्रार्थी
एक निर्दोष जलालत का जीवन जीने को मजबूर (डेरा सच्चा सौदा सिरसा)


यह है वो चिट्ठी जिसने एक बलात्कारी का अंत किया । जिस ‘महाराज’ की बात ऊपर की गई है, वो रेपिस्ट गुरमीत सिंह है । केस धीमा चलाने की लगातार कोशिश हुई 2013 में इस केस में सबूतों पर बहस पूरी हो गई थी। सुनवाई के दौरान राम रहीम की ओर से कभी सुप्रीम कोर्ट में तो कभी पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में याचिका लगा दी जाती रही। इससे केस काफी धीमी रफ्तार से चला। मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद राम रहीम ने फैसला सुनाने पर रोक चाही । जून 2017 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इस अपील को खारिज कर दिया । जुलाई 2017 में हाई कोर्ट ने सीबीआई की ट्रायल कोर्ट से इस मामले में सुनवाई ‘जल्द से जल्द’ पूरी करने को कहा था।
मामले की सुनवाई पूरी हो चुकी है, और नतीजा आज सामने है....!!!

इस पोस्ट को लींक के स्वरुप मे ज्यादा से ज्यादा शेअर करे और आगे हमारे देश की बहन बेटीओ के साथ ऐसे मामले होने से बचाए।

जय भारत
जय संविधान



यही है वह 'गुमनाम' चिट्ठी, जिससे उजागर हुई गुरमीत राम रहीम के अत्याचार की दास्तां




पत्रकार श्री रामचन्द्र छत्रपति का बेटा. 

August 08, 2017

साथी अरविंद खुमाण और उनकी टीम का नेक काम : 4 साल कि बच्ची पर हिंसा करने वालो पर कार्रवाई

By BlueDiary News Desk || 08 Aug 2017 || 15:03

(Image Times of India 08/08/2017)
कल रक्षाबंधन मे मौके पर हि एक दील जंजोड देने वाले घटना सामने आई है. एक चार साल की बच्ची को बुरी तरह जख्मी हालत मे पाया गया. हिंसा से जुडा ये मामला लग रहा है. हिंसा करने वाले इतने भी क्रुर कैसे हो सकते है की एक नन्ही बच्ची पर इस तरह से जुल्म ढाये. 
एक चार वर्षीय लड़की, जिसे कई दिनों तक  बेरहमी से मारा-पीटा गया था, उसे अमरेली जिले के चांच गांव से बचा लिया गया और सोमवार को राजुला शहर में अस्पताल में भर्ती कराया गया. ये पुरे मामले पर मदद करने वाले अरविंद खुमाण जो कि एक सामाजीक कार्यकर है और गरीबो को कानुनी मदद और अन्य सहायता करते है, उन्हो ने कहा कि ये बच्ची अपनी मां के साथ राजुला रेल्वे स्टेशन के पास रह रही थी. ये लोग कोळी समाज से है. लगभग एक महीने पहले एक स्थानीय व्यक्ति ने उस छोटी बच्ची को चांच गांव में रहने वाले किसी परिवार के पास भेजने को कहा था जो उन्हे शिक्षीत करेगे ऐसा कहा गया था. हालांकि, इस लड़की को वहां अच्छे से नही रखा गया एवं बुरी तरह से मारा-पीटा जाता था.

चांच गांव के कुछ लोगों ने बच्ची के मामा को बताया कि उस बच्ची को ठीक से नही रखा जाता और यातनाए दी जाती है. ये बात जानकर बच्ची के मामा लड़की की को साथ लेकर उसे वापीस लाने के लीये गये. बडी जद्दोजहद के बाद लडकी को किसी तरह से वहा से लाया गया और राजुला अस्पताल मे भर्ती कराया गया. बच्ची बहोत बुरी तरह से जख्मी थी. अरविंद खुमाण और किशोर भाई को इस मामले कि जानकारी मिलते हि वह राजुला अस्पताल के लीये रवाना हुए. बच्ची के घाव काफी गहरे थे उसके शरीर बहोत सी जगहो पर और पर उसकी उंगलियों बीच एक चाकू जैसी नुकिली चीज के साथ भी देखे गये है. निचे दी गई तसवीर मे आप देख सकते है.

अरविंद भाई ने ये भी आशंका जताई है की लडकी को वहा पर बेचा गया हो सकता है. क्योकी जब उसे लेने के लीये बच्ची के मामा और उसकी मां चांच गांव मे गये तो वहा पर सामने वालो ने ऐसा दावा कीया की लडकी को पैसे देकर खरीदा गया है. ये बहोत हि गंभीर मामला है. 

पुलिस के उप अधीक्षक राजेश परमार ने बताया कि इस मामले में शिकायत दर्ज की गई है और POCSO एक्ट के तहत इस मे आगे कि कार्यवाही होगी. पुलीस ने  बच्ची को जहा पर रखा गया था उस घर के मालिक के खिलाफ शिकायत दर्ज कि है. पुलीस का कहना है कि आगे जांच के बाद ही हकीकत सामने आयेगी.

आप को बता दे कि इस पुरे मामले मे मिडिया का बहोत हि अच्छा प्रतीसाद रहा है और अरविंद खुमाण, किशोर भाइ धाखडा और उनके साथीओ ने इस मे पुरी तरह से सहायता कि और आगे भी इस मे बच्ची को न्याय दीलाने मे साथ खडे रहेगे. अरविंद खुमाण का आदर्श बाबा साहब डॉ आंबेडकर है वो अपने आदर्श बाबा साहब का सामाजीक न्याय का सिद्धांत आगे बढाने मे एक महत्वपुर्ण योगदान दे रहे है. उन्होने ये पुरी घटना अपने फेसबुक एकाउंट के जरीये लोगो के सामने रखा. इस खबर के अंत मे उनके फेसबुक पोस्ट का लींक दीया गया है आप उन्हे इस सराहनीय कार्य के लीये अपने प्रतीभाव दे सकते है. 








August 04, 2017

कथा पढे..बार बार पढे..समझने का प्रयास करे

By Vijay Makwana  || 1 August 2017 at 23:25


प्राचिनपुराण की यह कथा मुझे बेहद पसंद है. मैथिलनगर में सुकेतु नामक लडका रहता था. संस्कारी और सर्वगुण संपन्न था.राजकुमार सा युवक! वयस्क होते ही उसकी शादी केतकी नामक सुंदर युवती से हो गयी. शादी के कुछ दिनो बाद सुकेतु को पता चला उसकी जिवनसंगीनी को शराब की लत है. और दिनभर जुआ खेलती है. पत्नी के इस दुर्गुणो से सुकेतु बहुत दुखी रहता था.पर विवश था अपनी पत्नी को समजाए तो कैसे समजाए? केतकी दिन ब दिन बिगडती जा रही थी. रात रात भर पुरुषो के कोठो पर नृत्य और मदिरा की महेफिलमें पडी रहती थी. घरमें सुकेतु आंसु बहाता रहता था. सुकेतु को माता पार्वती पर अखुट श्रद्धा थी. उसने २७ रवीवार का व्रत शुरू किया. अपनी पत्नी के दुर्गणो को स्वीकार कर लिया. सुकेतुने मन लगाकर अपनी पत्नी की सेवा करना शुरू कर दिया. पत्नी रात को देर से आये तो..उसे कंधा देकर पलंग पर लिटा देता था. हाथोमें लिपटे फुलो के गजरे निकाल फेंफ देता था. फिर हल्के हाथो से केतकी का सर दबाकर सुला देता था. सुबह केतकी के लिए नास्ता तैयार करना..दिनभर पत्नीपरायणा रहने लगा. माता पार्वती की भक्ति करनेमें समय व्यतित होने लगा. एक दिन केतकी जंगल से मदिरा का पात्र लिए गुजर रही थी. तभी उसने देखा एक युवान साधु बरगद के पेड के निचे अपने शिष्य-शिष्याओं को समजा रहा था 'नरा: नरकष्य कूपम्' अर्थात नर नरक का घडा है!! केतकी साधु को देखकर मुग्ध हो गयी.उसने साधु के सामने अभद्र हरकतें शूरू कर दी. जिससे क्रोधित होकर साधुने केतकी को श्राप दिया. 'हे कुलटा! कल के सूर्योदय से पहले तेरी मृत्यु होगी' केतकी का सारा नशा उतर गया. उसने घर आ कर सुकेतु को यह बात बतायी. पत्नीव्रता सुकेतु ने कहा..'प्रिया..सूर्योदय होगा तो तुम्हें कुछ होगा न? आप चिंता न करे देवी' सुकेतु ने सूर्यदेव को ध्यान लगाया.सूर्यदेव से काकलूदी की और कहा.."अगर मैं संपूर्णतया अपनी पत्नी को वफादार रहा होउं सच्चे मन अपनी पत्नी की सेवा की हो तो आप अपनी गति को रोक दिजीए" सूर्यदेव दुसरे दिन निकले नहीं..सर्वत्र अंधकार छा गया.तिनो लोक त्राहिमाम त्राहिमाम हो गए! फिर सभी देव-दानव-यक्ष माता पार्वती के पास गए.उनकी विनंति से माता पार्वती सुकेतु के पास आए.माताने सुकेतु और पत्नी केतकी को हजार वर्ष का आयुष्य प्रदान किया.कई वरदान दिए.सूर्योदय होता है..देव,गंधर्व,यक्ष,दानव,गण माता पार्वती का स्तुतिगान करते है..आकाश से पुष्पवृष्टि होती है! यहां केतकी निंद से उठती है.सब बातों का पता चलता है.वह सुधर जाती है..दोनों मिलकर लंबे दांम्पत्यजीवन का आनंद लेते है. मृत्यु बाद स्वर्गारोहण करते है. सार:पति अगर भक्तिवान पत्नीपरायण हो तो पत्नी को आधा पूण्य प्राप्त होता है.
#फुले_शाहू_आंबेडकर_वर्ल्ड
#विजयमकवाणा

Note : - ऐसी कोई कथा पुराणोमें नही मिलती..सारे आदर्श..सारे संस्कार..सिर्फ स्त्रीयों की जिम्मेदारी है..पुरुष तो उसकी पुण्य कमाई का आधा हिस्सा मुफ्तमें बटोरता है!

July 26, 2017

ભારતીય સંવિધાન અને મહિલાઓ

By Kirit Parmar  || 25 July 2017 at 21:00


અમે અમસ્તા  જ સંવિધાન ના ગુણગાન નથી ગાતા
જાતિવાદ
મનુવાદ
અને લિંગભેદ થી ગ્રસિત આ દેશ માં મહિલાઓ ની પરિસ્થિત કયારેય સારી ન હતી
આઝાદી પછી પણ સારી ન જ હોત જો આંબેડકર નૂ બંધારણ અસ્તિત્વ માં ન હોત .
અહીં મર્દ હોવાનો ખોટો ગર્વ લેવામાં આવી રહ્યો છે.

મહિલાઓ છોકરા પેદા કરવાં ,ચૂલો કરવો ,કુટુંબ ને સાચવવુ જેવાં અનેક કામો ના હાસિયા માથી બહાર નીકળી ને વિવધ ક્ષેત્રો માં  સફળતા શિખરો સર કરી રહી છે તે પણ ઘણા પુરુષવાદી દંભી માનસિકતા ધરાવતાં લોકો જોઈ શકતા નહી હોય .

આવાં નર્યા ભેદભાવ વખતે ભારતનું સંવિધાન જ એમનાં માનવીય હકો નૂ રક્ષણ કરી રહ્યું છે .માનવ હોવાનું ગર્વ અપાવી રહ્યું છે .પુરુષ સમોવડિ થવાની તક આપી રહ્યું છે .લિંગ ના ભેદ ને કારણે એમની સાથે કોઈ ભેદભાવ નહી થાય એની ખાતરી આપી રહ્યું છે .ફક્ત જરૂર છે પોતાના એ હકો ને જાણવાની અને એનાં માટે લડવાનિ.

એક પુરુષ કોઈ ક્ષેત્રમાં સફળ થાય તો એનાં માટે બધી શક્યતાઓ ના દરવાજા ખુલી જાય છે અને મહિલાઓ માટે આવી કોઈ યોજના નથી એવું માત્ર આપણા આ મહાન દેશમાં જ થઈ શકે !

મહિલાઓ ના વિકાસમાં સંવિધાન જેટલો મહત્વનો ભાગ કોઈ ભજવી શકે એમ નથી .પણ આ મહિલાઓ ના સંઘર્ષ માં મદદ કરનાર માતા પિતા ભાઇ બહેન કે પતિ કે કોઈ પણ જે સમાજ ની રૂઢિ ની અવગણના કર્યા વિના stand by રહેનારા દરેક જણ અભિનંદન ને પાત્ર છે .
બસ મહિલાઓ ભારતીય બંધારણે આપેલ હકો નૂ મહત્વ સમજી બંધારણને બિરદાવવૂ રહ્યું .જ્યા સુધી આંબેડકર નૂ સંવિધાન અસ્તિત્વમાં છે ત્યાં સુધી મહિલાઓ ,શોષિતો ,પીડિતો ના હકો પર કોઈ તરાપ નહી મારી શકે એની મને ખાતરી છે

જય ભીમ

જય સંવિધાન

કિરીટ પરમાર







July 05, 2017

આધુનિક સમય,મહિલા અને સમાજ

By Alpesh Parmar


     
"કલમ કાગળ અને કર્મએજ છે મંચ જીવન નો મર્મ"

ભારતીય સમાજમાં ઈતિહાસથી જ આપણે જોતાં આવીએ છીએ ,સમાજમાં સમયાંતરે બદલાવ આવતા રહયા છે, એ પછી રૂઢિગત રિવાજના હોય ,જાતિ અને રંગના ભેદભાવ ના હોય કે પછી ટેકનોલોજી અને શિક્ષણ વિભાગમાં આધુનિકરણ ની વાત હોય, વહેતા સમયની સાથે ,માનસિક વિચારમાં પણ બદલાવ લાવવો એટલો જ જરૂરી છે જેટલો ખેતરમાં ખેડ પછી પાકની વાવણી કરીને જતન કરવુ પડે એમ !!
મિત્રો આપણે સૌ સારી રીતે જાણીએ છીએ કે દેશ અને સમાજમાં બદલાવ આવવાની પાછળ અનેક ક્રાંતિ જવાબદારી છે, પછી એ ભલે કોઈ પણ વિભાગમાં કેમ ન હોય!!
દેશ અને સમાજમાં આવેલા વિકાસની સાથે બદલાવમાં પુરુષો ઉપરાંત મહિલાઓ નો પણ એટલો જ ફાળો રહ્યો છે, દિકરી ને અનદેખી કરીને એને દબાવી ના શકાય, એનામાં હજારો શક્તિઓ પડેલી હોય છે બસ જરૂર છે તો માત્ર, યોગ્ય તકની, યોગ્ય સમય અને સંજોગોની, અને આ બધું દિકરીના મા-બાપ દિકરી ને પુરુ પાડી શકે છે!!!
આજના સમયમાં દિકરીઓને જ્યાં જ્યાં તક મળી છે ત્યાં તેમને સમાજ, કુટુંબ અને પોતાનું નામ રોશન કર્યું જ છે, બસ એમને જરુર છે તો માત્ર હુંફ,તક, સ્વમાન, સમય,અને પુરુષ સમકક્ષ સમાનતાની !!બસ આટલું જ જરૂરી છે એક કૂમળા ફુલ ને ખીલવા માટે, એને એકવાર તમે સારા સંસ્કાર અને શિક્ષણનુ સંચાર કરી જોવો એ પંખી ની જેમ જાતે ઉડતાં શીખી જશે, એ પછી કોઈની ગુલામ નહિ રહે, ચાહે એ પતિ, કુટુંબ, રૂઢિચુસ્ત સમાજ, કે પછી બદલાતો સમય કેમ ના હોય!!
એકવીસમી સદીમાં પણ શિક્ષણ માટે પ્રોત્સાહન પેટે દિકરી ,દિકરાના સમાનતા ની વાત કરવી પડે ,.એ એક શરમજનક કહેવાય કારણ! આજે વિશ્વ કયાં નિકળી ગયું, દેશ કયાં નિકળી ગયો અરે સમાજમાં દિકરી પર જાતજાતના નિયમો થોપી દેનાર લોકોના સમુહ ની દિકરીઓ પણ કયાં પહોંચી એ વિચારો, એ લોકો એ કયારેય પાછળ વળી ને નજર નાખી નથી, હા આપણે નજર પાછળ નાખવાની છે પણ પરિસ્થિતિ ઓનો ખ્યાલ નિકાળવા માટે અને સમાજ બંધુઓ ને ઉજાગર કરવા ,નહીં કે ફરીથી એજ પરિસ્થિતિમાં આળોટવા માટે!! બસ જરૂર છે તો એ સદી ઓ જુની માનસિક ગુલામી અને આળસને ખંખેરવાની,પછી લાગી જાઓ દિકરી અને દિકરામાં સંસ્કાર અને શિક્ષણનુ સિંચન કરવામાં, અમે વેકેશનમાં શિક્ષણ જાગૃતિ ના ભાગરૂપે સમાજમાં મુલાકાતે જઈએ ત્યારે ઘણાં લોકોને કહીએ ભાઈ અને બહેન ભણે છે??? તો હસતાં હસતાં કહે હા દિકરો શહેરમાં ભણે છે અને દિકરી 12 પછી હવે ઘરે જ છે, સાહેબ સમય બદલાયો ને એટલે શહેરમાં ના મૂકી!! બસ કહેવાનું એજ છે કે સમય તો બદલાતો જ રહેશે પણ બદલાતા, વહેતા સમયની સાથે આપણે વિચારો બદલવા પડશે, અને એ પણ પેલી વહેતી નદી જેમ પાણી બદલે એમ, સમય બદલાય એજ તો ક્રાંતિ ની ચાવી છે, તમે પાયા માં સારા સંસ્કાર આપો પછી એને ખુલ્લી રીતે ખિલવા દો પછી જુઓ એની સફળતાની સુવાસ ક્યાં સુધી પહોંચે છે એ!!!!
અત્યારે સમાજ માં એવા દ્રષ્ટાંત છે કે જેમને સમાજ શું કહેશે, લોકો શું કહેશે, એ વિચાર્યા સિવાય દિકરીઓમાં સંસ્કાર અને શિક્ષણ નુ સિંચન કરયુ , "It Doesn't Matter What the People Say"  એ ભાવના હોય ,ટીકા અને બોજ જીલવા ની શક્તિ હોય એ જ કરી શકે છે બદલાવ અને એટલે જ આજે એમની સફળતાથી ઘરમાં રોશની ઝળહળે છે, એની વાત કરુ તો મારા એક  મિત્ર  રાજશ્રી દસમાં ધોરણમાં 89%, 12 માં 80% B.Sc Maths 71% અને હમણાં બી.એડમાં 90% , હા તમે સાચું જ સાભળ્યુ 90% લાવ્યાં ,
બીજું એક ઉદાહરણ નીતાબેન  કે જે  એગ્રીકલ્ચર ના એમ.એસ.સી ના અભ્યાસ ની સાથે GPSCનું વિચારે ને અને એમાં પ્રથમ પ્રયત્ન માં પાસ પણ થાય, કૂમારી વિમલ શાહ કે જે ફાર્મસી ના અભ્યાસની સાથે UPSC ની તૈયારી કરે અને પછી એ  IRS માં સિલેક્શન થાય , આ ઉપરાંત પણ સમાજમાં અનેક ડોકટર, વકીલ, એન્જિનિયર, વૈજ્ઞાનિક સંશોધન જેવા વિભાગમાં પણ નામ ઉજાગર કર્યું છે , અને ડૉ.બાબાસાહેબ નુ સપનું સાર્થક કરવાનાં પુરતા પ્રયત્નો કરે છે !!
મિત્રો કહેવાનો મારો અહીં મર્મ એજ છે કે આપણે દિકરી - દિકરા માં ભેદભાવ ન રાખતા, સમાન શિક્ષણ આપી, સમાન તક,સમાન સ્વમાન, સમાન સમય અને સમાન હૂંફ આપી ને દિકરીને પણ ગુલાબ ની પાંખડીની જેમ ખિલવા દઇએ, વિકસવા દઇએ, સાથે સંસ્કાર થી સુસંસ્કૃત કરીએ પરિણામે દિકરી એક નહિ બે ઘર ઉજાગર કરશે, બસ એને ખિલવા દો,સાથે એની શક્તિને જાગવા દો,.

"થાક્યા પિતા પણ યુવાન થઈ જાય છે સાહેબ,
જયારે કાનમાં પપ્પા અવો શબ્દ અથડાય છે!!!"
-એ.પી.પાલનપુરી!

May 16, 2017

પુરુષપ્રધાન તંત્ર અને સ્ત્રીઓ ની સામાજીક સ્થિતિ : રુશાંગ બોરીસા


Indoctrination of misogyny:-

દુનિયાના કોઈ પણ પ્રદેશમાં જઈએ...કોઈ પણ સંસ્કૃતિ ચકાસીએ તે તમામમાં જો કોઈ સામાન્ય પાસું હોય તો તે પુરુષપ્રધાન તંત્રનું છે; જે પરોક્ષ રીતે સ્ત્રીશોષણમાં પરિણમે છે.આધુનિક યુગમાં લોકો એવું સમજે છે કે શિક્ષણ વડે અસમાનતા દૂર થઇ શકશે. પણ આ એક ઉપરછલ્લી દલીલ છે. દુનિયાના જેટલા વિકસિત-શિક્ષિત દેશો છે તે તમામમાં આ દુષણ પ્રવર્તમાન છે જ.

મનુષ્ય પ્રજાતિમાં લિંગભેદનું દુષણ સમય સાથે કુત્રિમ અસમાનતા તરફ ઢળ્યું છે.લિંગભેદને સતત પ્રવુત રાખવામાં મીડિયાનો ફાળો મોટો છે.

પુરુષપ્રધાન ષડયંત્રોને કાઉન્ટર કરવા તો દૂર પણ તેને શોધવા પણ અઘરા છે. આપણે કલ્પી પણ ના શકીયે તે હદે આ દુષણ વ્યાપક છે.

બાળકોને નાનપણથી જ ભેદભાવ કરવાનું શીખવવામાં આવે છે. બાળકોના ઉછેરમાં વાર્તા-રમતો મહત્વનો ભાગ ભજવે છે.અહીં બાળપણથી જ સ્ત્રી પ્રત્યેની હલકી માનસિકતા કેવી રીતે થોપવામાં આવે છે તે વિષે બે ઉદાહરણ મુકું:-

1. બાળવાર્તા-ટૂંકીવાર્તા બાળકોને શિક્ષણ આપવાનું એક માધ્યમ છે.આ તબક્કે બાળકને જે કઈ શીખવવામાં આવે તે જીવનના લાંબા ગાળા સુધી અસર કરે છે.ભારતમાં રાજા વિક્રમ અને શબ વેતાળની "વેતાળ-પચીસી" નામની બાળવાર્તા પ્રખ્યાત છે.લગભગ આપણે સૌએ તેમાંની કમસે કમ એક વાર્તા તો સાંભળી જ હશે.આ વાર્તાઓમાંની કેટલીક વાર્તા સ્ત્રી પ્રત્યે સ્પષ્ટ ભેદભાવ બતાવે છે.એટલું જ નહિ એક વાર્તાનો મુખ્ય બોધ શબ્દ સહ જણાવું તો આવો છે-"પુરુષ ગમે તેવો દુષ્ટ હોય પણ તેને ધર્મનું જ્ઞાન હોય છે;પણ સ્ત્રીને નથી હોતું.માટે સ્ત્રી વધુ પાપી હોય છે."

2· રમતોમાં પણ ભેદભાવ વત્તા-ઓછા પ્રમાણમાં હોય છે.મારી પ્રિય રમત-ચેસ.ચેસમાં કર્તા-ધર્તા એટલે રાજા. (મતલબ પુરુષ) ચાહે રાણીને સૌથી વધુ પાવરફુલ પીસ રાખવામા આવ્યો હોય,પણ રાજા વિનાની બાજી લાશ બરોબર.વળી,ચેસમાં એકથી વધુ રાણી પણ બનાવી શકાય છે.બીજા શબ્દોમાં કહીયે તો નામકરણ-નિયમો પુરુષવાદી છે.

ઘણા લોકોને ઉપરોક્ત ઉદાહરણોનું અર્થઘટન પાયાવિહોણું જણાય.બીજું ઉદાહરણ વિષે એવી દલીલ પણ આવે કે "આ ભાઈને બધું નેગેટિવ જ દેખાય છે." પણ આવી ઉપેક્ષા જ આગળ જતા પુરુષોને શોષણખોર બનાવે છે અને સ્ત્રીઓને પુરુષપ્રધાન તંત્રના ગુલામ

સરેરાશ પુરુષોમાં ચાઈલ્ડ ઇનડૉકટરીનેશન પ્રત્યે સ્થાપિત હિત હોય તેઓ કઈ પણ ભોગે બચાવ કરશે. પણ મહિલાઓએ જાગૃત બનવું રહ્યું. શરૂઆતથી જ અસમાનતાના જે બીજ રોપવામાં આવે છે તેને ઉખેડવા રહ્યા.

હજુ તો સ્ત્રીઓને અધિકાર આપવાની શરૂઆત જ થઇ છે ત્યાં પુરુષવાદીઓ કેવા ગેરમાર્ગે દોરતી રજુઆત કરે છે તે દર્શવાતું મેમે
 (from  men-factor.blogspot.in)  




"હું સ્ત્રીઓને નફરત નથી કરતો; પણ તમને કરું છું અને જે રીતે તમે મને અને બીજા છોકરાઓ સાથે વર્તાવ કરો છો તેને."

 -- રુશાંગ બોરીસા


May 11, 2017

બહુજન સમાજની સ્ત્રીઓ ધારે તો એક આખી આંબેડકરવાદી પેઢી નિમાઁણ કરી શકે. એટલી એની તાકાત છે




અગર બહુજન સમાજની સ્ત્રીઓ ધારે તો એક આખી આંબેડકરવાદી પેઢી નિમાઁણ કરી શકે. એટલી એની તાકાત છે. હું પછાત સમાજની તમામ માતાઓને બે હાથ જોડીને ભારપૂવઁક વિનંતી કરી અપિલ કરું છું કે જો આપ ધારો તો બાબા સાહેબના વિચારો અને સિધ્ધાંતોના રંગે રંગાયેલી, આંબેડકરવાદને દ્રઢતાપૂવઁક અનુસરતી એક આખેઆખી પેઢીનું નિમાઁણ કરવા સક્ષમ છો.


જો આપ હિંમત કરી ધમઁની માનસિક ગુલામીમાંથી મુક્ત થશો તો તમારી આખે આખી એક પેઢી ગુલામ બનવામાંથી બચી જશે. કારણ એક માતા સૌ શિક્ષકોની ગરજ સારે છે. જે કામ સો શિક્ષક નથી કરી શકતા એ કામ એક એકલી માતા જ કરી શકે છે.

આપ માતાઓ આંબેડકરવાદ અપનાવો અને આપનાં સંતાનોને પણ ગળથુથીમાં આંબેડકરવાદ આપો.
આપ માતાઓ આપનું સ્થાન માત્ર રસોડા કે ઘર પુરતું સિમીત ન બનાવી દો. ઘરની બહાર નીકળો, બાબા સાહેબને વાંચો, સમજો અને તેમના વિચારો પર ચિંતન કરો. સમાજની અન્ય બહેનોમાં બાબા સાહેબના વિચારોનો ફેલાવો કરો.

તમારો આદશઁ કોઈ કાલ્પનિક દેવી શક્તિ નહી પણ બહુજન સમાજની યુગ પ્રવઁતક મહિલાઓ હોવી જોઈયે...
1. સાવિત્રી ફુલે 
જે મહિલા પોતાના પતિની સાથોસાથ ઉભા રહી..... સમાજના પ્રખર અને વિરોધ વચ્ચે પણ પછાત બાળકોને શિક્ષણ આપી વિઘ્યાની દેવી બની શકે. પછાત જાતિના સાવિત્રીબાંઈ....
2. રમાબાઈ આંબેડકર 
પોતાની તમામ તકલિફ... પોતાની તમામ પીડાઓ.... પોતાના સુખી સંસાર અને બાળકોનો ભોગ આપી.... નાંણાની ભયંકર ભીડ વચ્ચે પણ પછાતો માટે બાબા સાહેબ દ્વારા ચલાવાતી ચળવળ નિરંતર ચાલુ રહે... તે માટે ઘરની કફોડી હાલત બાબા સાહેબથી છુપાવી રાખી... દેશના કરોડો અછુતોના ઉધ્ધારનું આંદોલનને સહેજ પણ અટક્યા વિના નિરંતર ચાલતુ રહે તે માટે બાબા સાહેબને પ્રેરણા આપી શકે. મહાર સમાજના રમાબાઈ.....
3. ઝલકારીબાઈ...
1857 વિપ્લવ વખતે ઝાંસીની રાણી રણ મેદાનમાં આવે તે પહેલા ઘોડે ચડી અંગ્રેજો સામે યુધ્ધ કરી મદાઁનગી બતાવી માતૃભૂમીનુ રૂણ ચૂકતે કરનાર.... પછાત સમાજની ઝલકારીબાઈ....


મહિલા સશક્તિકરણ માટે બાબા સાહેબે જેટલો પ્રયાસ કયોઁ તેટલો બીજા કોઈએ નથી કયોઁ.
જે વખતે સમાજમા પછાત પુરૂષોને જ કોઈ હક્ક ન હતા તે વખતે બિચારી મહિલાઓની દશા કેવી હશે તેની કલ્પના કરી જુઓ તમારા રૂવાંડા ખડા થઈ જશે.
જે ધમઁમાં જડ અને પરાણે ઠોકી બેસાડેલી ધામિઁક માન્યતાઓના કારણે... વરસો સુધી આપણાં સમાજના પુરૂષો અને મહિલાઓને દયનીય અને નરક કરતાંય બદતર હાલતમાં જીવવું પડ્યું તો પણ હજીય આપ આવા ધમઁની માનસિક ગુલામી વેંઢારી રહ્યા છો.........?
આ દુનિયામાં કશું જ કાયમી નથી...માનતાઓ... બાધાઓ... વ્રત..ઉપવાસ.... આ બધાયને છોડો....
એક સીધો અને સરળ નિયમ છે.... જે કોઈનું ખોટું નથી કરતો.... એનું કદીય ખોટું થતું નથી....
જે માતા એક બાળકને જન્મ આપી દુનિયાનો સૌથી મોટો ચમત્કાર કરી શકે છે.... એ માતા આગળ બીજી ફોટાઓ... કે મુતિઁવાળી માતાઓની શું વિસાત...?
જે સ્ત્રી તેના જેવા અન્ય જીવીત સજીવને નવ મહિના સુધી ગભઁમાં સાચવી રાખી.... પછી... પોતાના બાળક તરીકે જનમ આપી શકે....
આવી સાક્ષાત શક્તિનું સ્વરુપ (અહીં શક્તિ એટલે માતાજી નહી પણ તાકાત..) સ્ત્રી જે ધારે એ કરી શકે....
આજે આપણને આવી જ યુગ બદલી નાખવાની તાકાત ધરાવતી માતાઓની જરૂર છે...
જિગર શ્યામલનનાં જયભીમ...................


















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May 08, 2017

अगर त्याग करने योग्य कुछ है तो सिर्फ मन, और कुछ नहीं -- ओशो

ये पुरुष , ये महात्मा , ये साधु-संत, इनके वक्तव्य देखो!!  इनमे क्या हैं ?

इनके सारे वक्तव्य स्त्री - विरोधी हैं । शास्त्रों में सिवाय स्त्री की निंदा के और कुछ भी नहीं है । तो उससे एक बात तो जाहिर होती है कि ये सारे लोग स्त्री पीड़ित रहे हैं, स्त्री से घबडा़ए रहे हैं । ये स्त्री को ही छोड़ कर भागे हैं , इतना तय है ।

                                शंकराचार्य का यह वचन है --
"तत्वं किमेक ? शिवमद्वितीयं ,
किमुत्तमं ? सच्चरितं यदस्ति ।
त्याज्यं सुखं किम् ? स्त्रियमेव ,
सम्यक देयं परमं किम् ? त्वभयं सदैव ।।"
'एक तत्व क्या है ? अद्वितीय शिव तत्व ।सबसे उत्तम क्या है ? सच्चरित्र ।कौन सुख छोड़ना चाहिए ? सब प्रकार से स्त्री-सुख ही ।परम दान क्या है ? सर्वदा अभय ही ।'

शंकराचार्य कहते हैं : 
'कौन सुख छोड़ना चाहिए ?'
त्याज्यं सुखं किम् ? स्त्रियमेव
'सब प्रकार से स्त्री का सुख ही ।'
जैसे सारा सुख शंकराचार्य के मन में स्त्री का सुख ही होकर रह गया है । और स्त्री में क्या सुख है , यह भी तो पूछो !

यह वचन विचारणीय है । एक तरफ यही महात्मागण कहते हैं कि स्त्री में क्या रखा है ----- हड्डी-मांस-मज्जा , लहू मवाद .... ! जैसे इनमें सोना-चांदी भरा हो , हीरे-जवाहरात भरे हों ! और दूसरी तरफ यह भी कहते हैं : 'कौन सा सुख छोड़ना चाहिए ?'इनको सुख भी कहां दिखाई पड़ रहा है ? वहीं ,हड्डी-मांस-मज्जा-रक्त-मवाद , वहीं सुख भी दिखाई पड़ रहा है । 

'सब तरह से स्त्री का सुख ही !'
मन कहां अटका है , इस सूत्र में जाहिर है ।

और यह सूत्र अकेला नहीं है , तुम्हारे शास्त्र इसी तरह के सूत्रों से भरे हैं । ये जिन लोगों ने भी लिखे होंगे , ये स्त्री से भाग कर लिखे गए सूत्र हैं ; स्त्री को जान कर नहीं , पहचान कर नहीं ।

स्त्रियों को इतनी गालियां दी हैं , ये गालियां इस बात का सबूत हैं कि अभी भी कांटा चुभता है ; अभी भी मन मुक्त नहीं हुआ है कहीं अटका हुआ है ;अभी भी सुख स्त्री में ही दिखाई पड़ता है ।

शंकराचार्य कहते हैं , 'कौन सुख छोड़ना चाहिए ? सब प्रकार से स्त्री का सुख ही ।'

अब इसमें एक बात तो यह मान ही ली गई कि स्त्री में सुख होता है ,जो कि निपट नासमझी की बात है । स्त्री में क्या खाक सुख होता है ! शंकराचार्य यह मान कर ही चल रहे हैं कि स्त्री में सुख होता है ,उसको छोड़ना ही सबसे बडा़ छोड़ना है ;वही सुख छोड़ने योग्य है । सुख है , यह तो स्वीकार कर लिया ।और अगर सुख है तो फिर छोडो़गे कैसे ?

फिर तो तुमने द्वन्द्व खडा़ किया । सुख को कोई भी नहीं छोड़ सकता । दुख ही छोडा़ जा सकता है । सुख को छोड़ने की कोई संभावना ही नहीं है । सुख तो हमारी स्वाभाविक आकांक्षा है ।हम दुख को ही छोड़ सकते हैं । तो जो चीज भी हम जान लेते हैं दुख है , वह छूटने लगती है; और जिसको हम जानते रहते हैं सुख है , उसको हम पकडे़ रहते हैं।

यह कहना : त्याज्यं सुखं किं स्त्रियमेव ।
कौन सुख छोड़ना चाहिए ? सब प्रकार से स्त्री का सुख ही । इसमें मान ही लिया गया कि स्त्री में सुख होता है ।और यह तो पुरुषों को कहा । अब अगर स्त्री पूछे तो उनसे क्या कहोगे ? उनसे कहना पडे़गा, पुरुषों का सुख । लेकिन पुरुष में क्या सुख होता है ? स्त्री में क्या सुख होता है ?भ्रांति है, सुख तो नहीं । और भ्रांतियों को छोड़ना नहीं होता है , जानना होता है , पहचानना होता है ।पहचानने ही से भ्रांति समाप्त हो जाती है । जैसे रस्सी में किसी कोसांप दिखाई पडा़ । शंकराचार्य तो इसका बहुत उदाहरण लेते हैं ।

एक तरफ चिल्लाते रहे ये लोग , कि यह सारा संसार माया है , फिर भी इसमें स्त्री का सुख माया नहीं ! इसमें स्त्री में सुख है । और यह सुख त्याज्य है । बस यही त्याग करने योग्य है , यहां कुछ और त्याग करने योग्य नहीं है । 

मैं तुमसे कहता हूं , .........
त्याग करने योग्य मन है , और कुछ नहीं । स्त्री हो , कि धन हो , कि पद हो , प्रतिष्ठा हो ; सब मन के ही खेल हैं । स्त्री तो बस एक खेल है । स्त्री के लिए पुरुष एक खेल है । और स्त्री से मुक्त हो जाना कोई कठिन मामला नहीं है ।सभी पति अपनी पत्नी से मुक्त हो जाते हैं ।सभी पत्नियां अपने पतियों से मुक्त हो जाती हैं ।

वह तो दूसरों की रस्सियों में सांप दिखाई देते रहते हैं , करो क्या ? अपनी रस्सी को तो सभी पहचान लेते हैं कि रस्सी ही है भइया ,कुछ खास नहीं । कितना ही साडी़ वगैरह पहनाओ , है रस्सी । कितना ही रंग-रोगन पोतो , कितना ही कोट वगैरह पहनाओ ,है रस्सी ! पति-पत्नियां अच्छी तरह पहचान लेते हैं ।तभी तो एक-दूसरे की तरफ देखते भी नहीं ,ऐसे मुक्त हो जाते हैं ।

हां , दूसरों की पत्नियों में अभी भी दिखता है कि पता नहीं ,
साडी़ के भीतर रस्सी न हो , कुछ और हो ! कोट पहने चले जा रहे हैं एक सज्जन ; अब पता नहीं कि कंधों केभीतर रुई भरी है कि सच में कंधे इतने मजबूत हैं ! वृषभ देव हैं या सिर्फ रुई भरी है ? छाती बडी़ फूली मालूम पड़ रही है । हालांकि खुद की छाती वे जानते हैं कि रुई भरी है ।खुद भरवाई है । मगर दूसरों को भ्रम होता रहता है ।

सवाल मन का है............
और स्त्री से छूट जाओगे तो कहीं और दौडो़गे ।जो लोग धन के पीछे दीवाने हैं अक्सर स्त्रियों से छूट जाते हैं ।उनका तो सारा मोह ही धन में लग जाता है ।उनको स्त्री वगैरह नहीं सुहाती । वे तो नोट को जब देखते हैं तब ,उनको लैला की याद आती है । जब वे नोट को छूते हैं , ....ताजा करंसी का नोट , अभी-अभी निकला हुआ ,चला आया अभी-अभी बैंक से । उसको छूते हुए देखो किसी धन -के प्रेमी को । क्या तुमने किसी प्रेमी को किसी प्रेयसी को छूते देखा होगा ! एकदम उसकी लार टपकती है , गदगद हो जाता है , छाती से लगा लेता है । पद के लोभी , राजनीति के युद्ध में दौड़ने वाले योध्दा , उनको पत्नियां वगैरह छोड़ने में कोई अड़चन नहीं होती । फुर्सत ही कहां उनको पत्नियां वगैरह की । दिल्ली जाएं कि पत्नी को देखें ? कभी-कभी मिलना-जुलना हो जाता है , बाकी कोई रस नहीं रहता ।जिनको एक बार पद का , धन का , प्रतिष्ठा का मोह लग गया ,वे इस मोह से बडी़ आसानी से मुक्त हो जाते हैं । ये तो सीधे-सादे लोग हैं जो स्त्री-पुरुषों में उलझे रहते हैं । जो छंटे हुए बदमाश हैं वे तो दूसरी चीजों में लग जाते हैं ।  नहीं कहूंगा कि स्त्री के सुख को छोड़ना सबसे बडा़ त्याग है । जब सुख को ही छोड़ने की बात उठी तो जड़ से ही काटो । मन को छोड़ना सबसे बडा़ त्याग है ।और मन को छोड़ने का परिणाम समाधि है ।मन छोड़ना है , समाधि पानी है ।ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ।

मैं तो समाधि से ही सारे सूत्र निकालना चाहता हूं ।
मन का त्याग ---- समाधि !
और समाधि से जो बहता है ---- वह प्रेम ।
वही दान है । क्या अभय ?
मन को छोडो़ , समाधि मिलती है ।

समाधि मिले तो जैसे फूल खिल जाएं और सुगंध उडे़ , ऐसा समाधि में सहस्त्रदल कमल खुलता है ; तुम्हारी चेतना का कमल खुलता है । और उससे सुगंध उड़ती है । उसको दान कहना भी ठीक नहीं । जिसको लेना हो ले , जिसको न लेना हो न ले । कोई न हो तो भी सुगंध उडे़गी ।

इस पूरे शंकराचार्य के सूत्र को अगर मुझसे कोई पूछे तो मैं कहूंगा :
मन से मुक्ति सबसे बडी़ मुक्ति ।
समाधि की उपलब्धि , सबसे बडी़ उपलब्धि
समाधि में जो जाना जाता है -- अनाम , ओंकार , ताओ
वह सब से बडा़ अनुभव ।
और समाधि से जो सहज गंध उठती है , रोशनी बिखरती है.. 
प्रेम वही सबसे श्रेष्ठ दान ।

-- ओशो रजनीश 


May 06, 2017

રિવાજોનું પાલન કરીયે પણ કુરિવાજો ના બનવા દઇએ : દિનેશ મકવાણા

By Dinesh Makwana  
અમિતાભ બચ્ચન ની જાહેરાત
દીકરા દીકરી સરખે ભાગે મિલકતમાં ભાગીદાર..

અેશ્વર્યા રાય જ્યારે પ્રેગનન્ટ હતી ત્યારે આ બચ્ચન સાહેબે એવી ઇચ્છા પ્રગટ કરેલી કે પુત્ર પેદા થાય. નારી સંગઠનોએ જ્યારે વિરોધ નોધાવ્યો ત્યારે બચ્ચન સાહેબે કહેવું પડ્યું કે હુ દીકરા કે દીકરી મા કોઇ તફાવત સમજતો નથી. તે સમયે પેપરમાં બચ્ચન ને ઉતર પ્રદેશની માનસિકતા ધરાવતી વ્યકિત તરીકે ચિતરવામાં આવી હતી.

મુળ આ સમાચાર મા એક વાત જરુર સમજવાની છે. હિન્દી ભાષી રાજ્યોમાં આજે પણ દહેજનું દુષણ બહુ મોટે પાયે વકરેલુ છે. બિહારમાં અેક ક્લાર્ક માટે દસ લાખ રુપિયાથી માંડીને IAS માટે સિત્તેર લાખ સુધીનુ દહેજ બોલાય છે. તેથી તે પ્રદેશોમાં લગ્ન પછી બીજી મિલકત આપવાનો રિવાજ જ નથી. કારણ કે લગ્ન સમયે જે દહેજ આપવામાં આવે છે તે દીકરીને જ આપવામાં આવે છે.

દરેક રાજ્યની સ્થિતિ અને સંજોગો જુદા જુદા છે. બાકીના રાજ્યોમાં ખાસ કરીને ગુજરાત કે મહારાષ્ટ્ર ની દલિત જાતિઓમાં દહેજ પ્રથા નથી. આપણા વડીલોએ જે નિયમ બનાવ્યા તેની પાછળ બહુ વ્યવહારિકતા જોવા મળે છે. કારણ કે દીકરી પ્રેગનન્ટ થાય ત્યાં સુધી તે તેના ઘરમાં એડજસ્ટ થઇ ગઇ હોય, તેનું ઘર મજબૂત થઇ ગયું હોય ત્યારે સિમંત વિધિ મા આપણે કરિયાવર આપીયે છે તેમાં કોઇ માગણી નથી હોતી.આની પાછળની મુળ ભાવના એ હતી કે દીકરીને બાળકના જન્મ પછી જુદું રહેવું હોય તો તે આપણા આપેલા કરિયાવરમાંથી રહી શકે છે. મુળ દીકરીને મદદ કરવાની ભાવના હતી.
સિમંત પ્રસંગ સિવાય આપણે દરેક તહેવારે દીકરીને કઇંક આપીને મદદ કરતા હોય છે. પરંતુ આ મદદ હોય ત્યાં સુધી વાંધો નથી પરંતુ જ્યારે તે જીદ મા ફેરવાય છે ત્યારે મુશ્કેલી ઉભી થાય છે.
જો સાસરી પક્ષ મજબૂત હોય અને જરુર કરતા વધારે પોતાની દીકરી કે જમાઇને આપે તેમાં કોઇને વાંધો ના હોય પરંતુ આપણા સમાજમાં પરિસ્થિતિ કરતા દેખાદેખી વધારે છે. સિમંતમાં જો ઓછું મળે તો જમાઇની કિંમત ઓછી અંકાય છે. સાસરી પણ ની સ્થિતિ કરતા જમાઇનો પ્રભાવ આમાં વધુ કામ કરતો હોય છે.
રિવાજો ને વ્યવહારિકતા થી જોવાની જરુર છે. ખોટી જિદ અને નબળી આર્થિક સ્થિતિ રિવાજોને કુરિવાજો બનાવી દે છે. બીજું જે આર્થિક રીતે નબળા છે તે નિયમમાં ફેરફાર ના કરી શકે તેથી આવા રિવાજોમાં જો સક્ષમ વ્યકિત ફેરફાર કરે તો સરવાળે સમાજને ફાયદો છે. કોઇ પણ રિવાજ કોઇ એકાદ કે બે વ્યકિત માટે નથી બન્યો હોતો. કેટલાય કહે છે દીકરીને આપવાંથી ઓછું નથી થઇ જતુ, તે વાત સાચી, પણ દેવું કરીને જો આપીયે તો દીકરાને અન્યાય કરીયે છે. રિવાજોમાં બેલેન્સ હોવું જરુરી છે. વિરોધ રિવાજો કરતા તેમાં પોતાની રીતે કરવામાં આવતા સુધારા તરફે છે.

પણ જ્યારે સાસરી પક્ષની સ્થિતિ સારી ના હોય ત્યારે રિવાજ કુરિવાજ બને છે. જમાઇને સાસરી પક્ષની સ્થિતિની ખબર હોય છે તેથી તે કેટલી અપેક્ષા રાખવી તેમને ખબર હોવી જોઇએ.

અમિતાભની આ જાહેરાત મા ઘણું બધુ કહી જાય છે. આપણે રિવાજોનું પાલન કરીયે પણ કુરિવાજો ના બનવા દઇએ.

--- દિનેશ મકવાણા (આસિસ્ટન્ટ લેબર કમિશ્નર, ભારત સરકાર.)










अमिताभ बच्चन ने अपनी पूरी प्रॉपर्टी अपने बेटे और बेटी को बराबर हिस्से में दे दी, ट्विटर उन्होंने फ़ोटो डाल कर ये सुचना दी

કન્યાના ભ્રુણ હત્યામાં મુસલમાનોનો ફાળો નહિવત છે : વિજય મકવાણા

જો તમારે સત્ય સમજવું હોય તો આ રીતે તર્ક કરો!
તાજી વસ્તી ગણતરીનાં આંકડા જુઓ. મુસલમાનોનો જેન્ડર રેશિયો 1000 પુરુષ સામે 951 સ્ત્રીનો છે. જે 2001માં 936 નો હતો. જો પ્રત્યેક મુસલમાન 4 સ્ત્રી સાથે નિકાહ કરે તો અંદાજે 75% મુસલમાન યુવક કુંવારા રહી જાય. જો પ્રત્યેક મુસલમાન 2 સ્ત્રી સાથે નિકાહ કરે તો 52% મુસલમાન યુવક કુંવારા રહી જાય..
મુસલમાનોની વસ્તી 1.1 % વધી છે તેનું એક ખૂબસૂરત કારણ છે. મુસલમાનો 'કન્યાભ્રુણ હત્યા' નથી કરાવી રહ્યાં. કેટલાંક મુર્ખાઓ હિન્દુજનની વધાર્યા વિના હિન્દુ વસ્તીવિસ્તાર વધારવા માંગે છે.
યુનિસેફ કહે છે: ભારતમાં ગેરકાનુની રીતે દરરોજ 2000 કન્યાના ભ્રુણની હત્યા થાય છે. જેમાં મુસલમાનોનો ફાળો નહિવત છે.
-વિજય મકવાણા














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આ માનસિક રોગીઓનો દેશ છે : દિલીપ મંડલ

મા: ઘરથી બહાર જાય છે. પહેલાં ટોઇલેટ જઇ લે.
પુત્રી: હજી હમણાં તો ગઇ છું.
મા: એકવાર ફરીથી જઇ આવ.
પુત્રી: સારું, મમ્મી જાઉં છું.
મા: પાણી કેમ પીએ છે?
પુત્રી: તરસ લાગી છે.
મા: બસ કર હવે, વધુ ન પી.
પુત્રી: કેમ?
મા: લાંબી સફર છે, વધુ પાણી પીશે તો જઇશ ક્યાં?
પુત્રી: પણ મમ્મી ગઇ વખતે ઓછું પાણી પીવાથી લૂ લાગી ગઇ હતી. ડીહાઇડ્રેશન..મરી ગઇ હોત તો?
મા: કોઇ વાંધો નહી, એમ કંઇ મરી નહી જા.
પુત્રી: ડોક્ટર માસીએ કહ્યું હતું ઓછું પાણી પીવાથી મને ઘણી ગંભીર બિમારીઓના લક્ષણ છે.
મા: તો શું થયું? રસ્તામાં પછી ક્યાં કરીશ?
પુત્રી: મમ્મી, મોન્ટુને તો પાણી પીવાથી તું રોકતી નથી. મને કેમ રોકે છે?
મા: મોન્ટુ બસની પાછળની બારીએ જઇ શકે છે.
પુત્રી: મોન્ટુ જઇ શકે તો હું કેમ નહી?
મા: માર ખાઇશ હવે! બહું ચાંપલી ન થા! આ આપણી સંસ્કૃતિ છે, સંસ્કાર છે. મોન્ટુ જઇ શકે તું નહી.
પુત્રી: તું ઠેકઠેકાણે ટોઇલેટ કેમ નથી બનાવી દેતી?
મા: એ શક્ય નથી, નહી બને.
પુત્રી: કેમ?
મા: કેમ કે, દેશને લાગે છે કે,ઔરતો રોકી શકે છે.
પુત્રી: તું રોકી શકે છે મમ્મી??
મા: ના. નથી રોકી શકતી.
પુત્રી: તો?
મા: તો શું? માર ખાવો છે તારે? બંદ કર તારો બકવાસ. ભાગ અહીંથી.
અને તમે કહો છો ભારતને બિમાર દેશ કહી મેં મોટો અપરાધ કરી નાખ્યો છે. હવે આ દેશને સંયુક્ત રાષ્ટ્રની સુરક્ષા સમિતીમાં કાયમી સીટ જોઇએ છે. જે મહિલાઓને ટોઇલેટ સીટ નથી આપી શકતો. અને મહિલાઓની આ પરેશાની બાબતે વિચારી પણ નથી રહ્યો. આ માનસિક રોગીઓનો દેશ છે. અને જે મનોરોગી નથી તે પાગલખાનામાં જાય..પાકિસ્તાન જાય..!!
-દિલીપ મંડલની વોલ પરથી સાભાર...
અનુ: વિજય મકવાણા













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May 05, 2017

બાબાસાહેબ નો આજ ની નારી માટે આર્તનાદ : વિંકેશ બૌધ્ધ

"તારે ક્યાં જવાનું હતું અને તું ક્યાં પહોંચી?"
બાબાસાહેબ નો આજ ની નારી માટે આર્તનાદ..
      
હું રોજે રોજ જાગુ છું.પહેલા પણ ઉંઘ્યો નથી ને જાગતો જ રહ્યો છું. અને આજે પણ જાગુ છું. અને એ એટલા માટે કે કોઈ તારી આઝાદી ને છીનવી ન લે. એક બહાદુર સૈનિક બાપ નો દીકરો છું. બહાદુરી થી જીવ્યો છું અને બહાદુરી થી તારું રક્ષણ કરી રહ્યો છું. યાદ રાખજે તું સુખી એટલા માટે છે કારણ કે તું મારુ સંતાન છે. જ્યાં સુધી તું મને પિતા તરીકે અને "બાબાસાહેબ" તરીકે જોતી રહીશ. ત્યાં સુધી દુનિયા ની કોઈ તાકાત ચાહે દેવ હોય કે દાનવ તારું કઇં પણ બગાડી શકશે નહિ. પણ જો તેં બીજા કોઈને પિતા કહ્યા તો હું તને ઉગારી શકીશ નહિ. કારણ કે સંતાન પર પિતા નો જ હક્ક હોય છે. એ જાણી લો. મારો માર્ગ સુખ અને સમૃદ્ધિ નો છે. બંધન તોડવા નો માર્ગ છે.. ગુલામી માંથી મુક્તિ નો માર્ગ છે. જ્ઞાન નો માર્ગ છે. જે અતઃ દીપો ભવ તથાગત ગૌતમ બુદ્ધ ના સિદ્ધાંત પર આધારિત છે..

હું જાણું છું કે દિશાવિહીન બાળક ને શબ્દો ના માધ્યમ થી સમજાવી શકાતું નથી એ તો ઠોકર ખાઈને જ સમજી શકે છે. છતાંય તને કહું છું કે મેં ઘણી શક્તિ અને પ્રયત્નો થી જ તને દેવી-દેવતા ઈશ્વર ના કુંડાળા માંથી બહાર કાઢી છે. અને તું ફરી થી એમાં ફસાઈ રહી છે. મેં જાણ્યું છે અને શોધ્યું પણ છે અને જે મેળવ્યું છે એ બધું જ તારી આઝાદી માટે તને જ સુપરત કરી દીધું છે. આખી વિરાસત ની તને વારસદાર બનાવી છે. મેં મારા જીવન માં સુખ ની કોઈ પળ અનુભવી નથી. હું તને આ દેશ ની શાસક જોવા માંગુ છું. 
               
એક મહિલા શિક્ષિત થાય છે. તો બે પરિવાર નું ભલુ કરે છે. અને જો મહિલા અભણ રહે તો પરિવાર દુઃખ માં સપડાય છે. તારી પર આજ જવાબદારી છે. પરિવાર ને બચાવીશ તો જ સમાજ બચી શકશે. એટલા માટે બુદ્ધ ની શરણ માં આવી જાવ. પ્રજ્ઞા,શીલ,સમાધિ ના માર્ગ પર તારી સુખ અને સમૃદ્ધિ નો આધાર બનશે ...

જય ભીમ.. નમો બુદ્ધાય 
                 
ભવતું સબ્બ મંગલમ..

~ વિંકેશ બૌધ્ધ