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August 19, 2017

"रावण" को कोर्ट ने अभी दोषी माना भी नहीं और पुलिस ने उनके हाथों में हथकड़ी लगा दी

By Social Media Desk

भीम सेना के अध्यक्ष भाई चंद्रशेखर और साथीओ को हथकड़ी लगातार कोर्ट में पेश किया गया।
मनुस्मृति के दो लठैत- मोदी और योगी
भीम सेना के भाई चंद्रशेखर आज़ाद पर फ़र्ज़ी मुक़दमे लगाए गए और सज़ा होना तो छोड़िए चार्जशीट दाख़िल होने से पहले उन्हें हथकड़ी पहना दी।
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 सहारनपुर में दलितों पर हो रहे अत्याचार के विरोध में चंद्र शेखर भाई ने अपनी आवाज बुलन्द की तो वहाँ के प्रशासन ने उनपर फर्जी धाराएं लगाकर उन्हें अभियुक्त बनाया,
मामला कोर्ट में है,
चंद्र शेखर भाई को कोर्ट ने अभी दोषी माना भी नहीं कि वहाँ की पुलिस ने उनके हाथों में हथकड़ी लगा दी,
जबकि मान्य सर्वोच्च न्यायालय के यह आदेश हैं की ट्रॉयल पर रहे किसी भी अभियुक्त को आप हथकड़ी नहीं लगा सकते, चाहे उसकी सुरक्षा में कुछ और सुरक्षाकर्मी क्यों ना बढ़ा दिए जाएँ,
यह केवल दोषी सजायाफ्ता लोगों को लगाई जाती है,
यह सरासर सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना है,
आवाज दो, हम एक हैं ...
- विमल वरुण

नीला गमछा अपने साथ मे हमेंशा रखते है रावण, आंबेडकरी विचारधारा का प्रतीक है ये. नक्षलवाद या किसी और वाद से रावण का दुर दराज से कोइ संबंध नही है.  कुछ लोग भीम आर्मी का कनेक्शन नक्षलवाद से जोडना चाहते थे ऐसी बातो से सावधान रहीये.
जय भीम

फोटोस...










वहीं, माननीय सांसद फूलन देवी हत्याकांड में सिद्ध दोषी उम्र क़ैद की सज़ा वाला शेर सिंह राणा तिहाड़ जेल से छुट्टी लेकर बाहर आता है, आरक्षण विरोधी पंचायत करता है, सहारनपुर में दंगा करता है।
लेकिन उसके हाथ में हथकडी नहीं है।
जाति देखकर दंड देना मनुस्मृति का मूल आधार है।
- दिलीप मंडल


July 09, 2017

झूठ, मक्कारी और फरेब वाली जाति व्यवस्था के आज भी मौजूद होने को और कैसे समझें?

By Dilip C Mandal







जातिवाद का विचार अगर कमजोर होता तो देश के तमाम बुद्ध, कबीर, रैदास, नानक, फुले, सावित्रीबाई, साहू, नारायणा गुरु, आंबेडकर, पेरियार, रामस्वरूप वर्मा, जगदेव प्रसाद, कर्पूरी ठाकुर, बीपी मंडल वगैरह के प्रयासों से खत्म हो चुका होता.
आज भी जातिवाद और ब्राह्मण वर्चस्व विकराल रूप में मौजूद है, इसका मतलब है कि जाति का सिद्धांत बेशक गलत हो, लेकिन है बेहद मजबूत.
सही होना और शक्तिशाली होना, दो अलग अलग बातें हैं.
झूठ, मक्कारी और फरेब वाली जाति व्यवस्था के आज भी मौजूद होने को और कैसे समझें?
भारत की 85% आबादी की शक्तिहीनता और देश की बदहाली, गरीबी और अशिक्षा को और कैसे समझें?

July 06, 2017

ये अंधेरा ही आज के फेसबुक की तस्वीर है






बहुजनो की आवाज़ को दबाने के लिए फेसबुक इंडिया ने नेशनल दस्तक के फेसबुक पेज पर पाबंदी लगा दी है... कोई भी लिंक वह अपने फेसबुक पेज पर नही डाल सकते.  सोशल मीडिया की मनुस्मृति.... पुराने समय में वे आपकी जीभ काट लेते थे. अब भी वे आपको अपनी बात अपने लोगों तक पहुंचाने नहीं देंगे. भारतीय कटेंट को मॉनिटर कर रहे फेसबुक इंडिया के हैदराबाद, मुंबई और गुड़गांव के अधिकारियों शर्म करो. वजह तो बता दो? 

आज से लगभग दस साल पहले जब पहले फेसबुक और फिर ट्विटर आया और फिर ह्वाट्सऐप तो ऐसा लगा था कि कॉरपोरेट-सवर्ण मीडिया के एकछत्र राज के सामने अपनी बात करने का एक लोकतांत्रिक मंच हमें मिल गया है.

शुरुआत में कस्टमर जोड़ने के लिए सोशल मीडिया ने उदारता से हम सबको अपनी बात कहने का मौका भी दिया. भारत में अगर करोड़ों कस्टमर चाहिए तो बहुजनों को तो साथ लेना ही पड़ेगा. आबादी का हिसाब ही ऐसा है.

यहां तक सब ठीक चल रहा था. हम सब कटेंट लिख रहे थे. फोटो और वीडियो शेयर कर रहे थे. गुडमॉर्निंग और गुड नाइट कर रहे थे, तो सब खुश थे.

फिर RSS ने सोशल मीडिया का राजनीतिक इस्तेमाल बड़े पैमाने पर करने की नीति बनाई. कई शहरों में बीजेपी के कॉल सेंटर खुल गए. वहां से सांप्रदायिक जहर फैलाया जाने लगा. मोदी की ब्रांडिंग शुरू हुई. 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी का सोशल मीडिया इतना बड़ा हो चुका था कि बाकी सभी दलों का मीडिया उनके सामने बौना था.

यहां तक भी सब ठीक चल रहा था.

हिंसा फैलाने वाले किसी पेज पर पाबंदी नहीं लगी.

संघी-हिंसक सोच के सारे पेज बदस्तूर चलते रहे.

लेकिन फिर बहुजनों ने भी सोशल मीडिया और इंटरनेट का इस्तेमाल शुरू किया. SC, ST, OBC, माइनॉरिटी के लोग देर से आए, पर जल्द ही उन्होंने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा दी.

सैकड़ों ऐसे ग्रुप और पेज बन गए, जिनसे लाखों लोग जुड़ गए. इसका असर यह होने लगा की गूगल को बाबा साहेब और सावित्रीबाई फुले की जयंती पर अपना डूडल बनाना पड़ा. बात असर करने लगी.

यहां आफत हो गई.

फेसबुक बेशक अमेरिका में रजिस्टर्ड कंपनी है. लेकिन इसका भारतीय कंटेंट भारतीय अधिकारी ही मॉनिटर करते हैं.

भारतीय अधिकारियों का धर्म भी होता है और उनकी जाति भी होती है.

तो जिन भारतीय अधिकारियों ने किसी दंगाई पेज पर आजतक पाबंदी नहीं लगाई, उन्होंने बहुजन, लोकतांत्रिक पेजों पर पाबंदी लगाने का सिलसिला शुरू कर दिया.

इसका ताजा शिकार नेशनल दस्तक है. कई लोग और पेज पहले इस मनमानी के शिकार हो चुके हैं. फेसबुक पर नेशनल दस्तक से जु़ड़े साढ़े तीन लाख लोग इसकी खबरों का लिंक नहीं देख सकते, क्योंकि फेसबुक ने बिना कारण बताए, इस पर रोक लगा दी है.

मतलब कि आप समझ सकते हैं कि भारत में बहुजन मीडिया का रास्ता कितना कठिन है.

सबसे पहले तो आपको अपने लोगों को बताना है कि कॉरपोरेट-जातिवादी मीडिया पर भरोसा करना बंद कीजिए, जो कि बेहद मुश्किल काम है, और जब आप यह कर लेते हैं, तो आपको अपनी बात कहने से रोक दिया जाता है.

फेसबुक पर सुदर्शन न्यूज, इंडिया टीवी और ज़ी न्यूज की दंगाई खबरें चल सकती हैं, RSS के सारे हिंसक पेज चल सकते हैं, अंधविश्वास और पोंगापंथ फैलाने वाले पेज चल सकते हैं, सारे सवर्ण जातिवादी और आरक्षण विरोधी पेज चल सकते हैं, सांप्रदायिकता फल-फूल सकती है। लेकिन बहुजनों का लोकतांत्रिक मंच नेशनल दस्तक नहीं चल सकता।

फेसबुक द्वारा के नेशनल दस्तक पेज को बाधित करना घोर निंदनीय है। जब धार्मिक उन्माद फैलाने वाले पेज चल रहे, अश्लील पेज चल रहे तो नेशनल दस्तक के साथ फेसबुक के अधिकारी सौतेला व्यवहार क्यो कर रहे। जब की नेशनल दस्तक पर कोई अश्लील बात नहीं होती। सिर्फ इसलिए की यह दलित, आदिवासियों के बारे में लिख रहा। घोर जाति वादी मानसिकता से ग्रस्त है भारत के फेसबुक अधिकारी।

कौन है जो डिजिटल दलित से डर रहा है और बहुजन वेबसाइट पर रोक लगा रहा है?

नेशनल दस्तक पर पाबंदी लगने से पहले की इस खबर को देखिए। इस खबर को 2 लाख 36 हजार लोगों ने अपने पेज पर शेयर किया है। बड़े-बड़े मीडिया हाउस की खबरें इतनी शेयर नहीं होतीं।

इसके वीडियो यूट्यूब पर तीस लाख से ज्यादा देखे गए हैं।

यह ब्राह्मणवादियों को क्यों पचेगा?

नेशनल दस्तक एक खासा बड़ा मंच बन चुका है। हालांकि सफर लंबा है। इसकी कामयाबी के बाद सैकड़ों SC, ST, OBC युवाओं में उत्साह आया और वे भी इंटरनेट और यूट्यूब पर अपना मीडिया बना रहे हैं। उनमें कई कामयाबी के रास्ते पर चल पड़े हैं।

नेशनल दस्तक की सफलता से एक चेन रिएक्शन पैदा हुआ है। इसलिए हमला सीधे इसी पर हुआ है।

वैसे, यह सब करके कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे।


बहुत कठिन है डगर पनघट की!

 #IAmWithNationalDastak 


दिलीप मंडल की कलम से (except title of the post and images)






June 11, 2017

RSS और मीडिया दोनों की कमान ब्राह्मण के हाथ में : Dilip C Mandal

मीडिया चैनलों में RSS का एक ग़रीब ब्राह्मण किसान नेता रहता था!
मध्य प्रदेश के किसान आंदोलन में सरकारी फ़ायरिंग में मरने वाले लगभग सभी लोग पाटीदार/पटेल और किसान बिरादरियों के,
और कॉरपोरेट मीडिया किसान आंदोलन का नेता बना रहा है किसी पंडित शर्मा उर्फ़ कक्का को।
आंदोलन के पहले सात दिन तक जिसका नाम भी किसी ने नहीं सुना था।
शर्मा जी भी ग़ज़ब हैं। आंदोलन मध्य प्रदेश में है, नेताजी दिल्ली में चैनल चैनल घूम रहे हैं। पुलिस मध्य प्रदेश में गिरफ़्तारियाँ कर रही हैं। दिल्ली में शर्माजी मज़े में हैं।
शर्माजी RSS के पुराने और बड़े नेता है। इन दिनों विजयवर्गीय गुट में हैं।
वे मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार के विधि सलाहकार रहे है। पहले वे बीजेपी किसान मज़दूर संघ के मध्य प्रदेश के अध्यक्ष रहे।
RSS का किसान नेता भी ब्राह्मण है। मीडिया का किसान नेता भी ब्राह्मण है।
RSS और मीडिया दोनों की कमान ब्राह्मण के हाथ में।
शर्मा की बात सुनकर आप समझ जाएँगे कि बंदे को किसानी के बारे में कुछ नहीं मालूम।
मीडिया पंडिज्जी को हीरो बनाने पर क्यों तुला हुआ है? दिल्ली में पुलिस केंद्र के अधीन है। शर्मा जी की दिल्ली में गिरफ़्तारी क्यों नहीं हो रही है?
अगर यह आपको नॉर्मल लगता है तो आपको कोटि-कोटि प्रणाम।
- Dilip C Mandal




June 07, 2017

वामपंथी लोग (साम्यवादी) पुजा पाठ मे विश्वास नही करते ये भ्रम की बात है,जो फ़ोटो में दिख रहा है, वही सत्य है.

वामपंथी आलोचक प्रोफ़ेसर मैनेजर पांडे की यह सरलता और साफ़गोई प्रशंसा योग्य है। मैं नमन करता हूँ।
भागवत पाठ या सत्यनारायण कथा में हिस्सा लेने में दिक़्क़त क्या है। यह तो आस्था का मामला है। संविधान हर किसी को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है।
प्रगतिशीलता का नाटक करने वालों की तुलना में ये बेहतर लोग हैं।
मैनेजर पांडे ने खुलकर अपने लोगों को आगे बढ़ाया। सेट किया। रोहित वेमुला को दंडित करने वाला हैदराबाद का प्रोफ़ेसर आलोक पांडे उनका ही शिष्य है।
आदमी को इतना ही सीधा और सरल होना चाहिए। खुलकर काम करना चाहिए।
छुपकर काटने वालों से ये लोग बेहतर हैं।
मैं ग्रामीण जातिवाद को शहरी जातिवाद से बेहतर विरोधी मानता हूँ क्योंकि ग्रामीण जातिवाद आसानी से पहचाना जा सकता है।
- दिलीप सी मंडल 


Facebook Post : -

ABP चैनल के जिस रिपोर्टर ने बिहार के टॉपर गणेश राम का जनरल नॉलेज चेक किया उसका अपना जनरल नॉलेज और सामाजिक समझ देखिए।


उस दिमाग़ की जटिलताओं और उसमें भरे ज़हर का अंदाज़ा लगाइए, जो एक SC टॉपर का इंटरव्यू करने के लिए जाता है तो डायरी में 40 सवाल लेकर जाता है। जो हिंदी मीडियम के स्टूडेंट से साइकियाट्री की स्पेलिंग पूछता है।
अगर समाज के बारे में आपके ऐसे ज़हरीले विचार हैं तो आप फणीश्वरनाथ रेणु तो कवि बताकर भी राष्ट्रीय हिंदी न्यूज चैनलों में नौकरी पा सकते हैं।



गणेश के स्कूल का मालिक बीजेपी का नेता है। और प्रिंसिपल उस नेता का बेटा। दोनों फ़रार हैं। पुलिस छापे मार रही है।

- Dilip C Mandal Facebook Post

June 06, 2017

भरोसा हासिल करने के बाद गला काटना आसान होता है

आज काफी लोग एनडीटीवी को सपोर्ट और विरोध कर रहे है विरोध करने वालो मे बिजेपी के सपोर्टर है और सपोर्ट करने वाले बाकी सारे , पर इन सब मे एक नाम जरा उभर के नजर आता है जो विरोधी खेमे मे तो है पर बिजेपी सपोर्टर नही है. 
और वह है वरीष्ट पत्रकार दिलीप मंडल.
सरकार ने एनडीटीवी पर एक दीन का रोक लगाने की सजा और काफी सारे एनडीटीवी से जुडे मुद्दो पर उन्होने समयांतर मे अपने फेसबुक प्रोफाईल पर लिखा है इन मे से कुछ चुनींदा पोस्ट हम आप को दीखाने का प्रयास करते है.
ध्यान से पढीये और समजीये...


"NDTV अगर एक ओपिनियन पोल लाता है, जिसमें यूपी में BJP सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती दिखाई जाती है और BSP तीसरे नंबर पर, तो क्या आप उस पर भरोसा करेंगे? करना ही पड़ेगा।
लिखकर रख लीजिए। NDTV का ऐसा ओपिनियन पोल आएगा।
मीडिया का अंडरवर्ल्ड! जो दिखता है, सिर्फ उतना ही नहीं होता।"
(5 November 2016)


और ऐसा हुआ भी, आप के भरोसे के काबील बना ने के लीये सरकार एनडीटीवी का इस्तेमाल कर रही है ऐसा भी हो सकता है.



"NDTV आज की तारीख़ में सिर्फ 513 करोड़ रुपए की कंपनी है। उस पर फ़ेमा यानी मनी लॉन्ड्रिंग का 2031 करोड़ रुपए का और टैक्स अदायगी से संबंधित 450 करोड़ रुपए के मामले है।
सरकार जिस पल चाहेगी, ऑक्सीजन रोक देगी। लेकिन जेटली जी के होते NDTV का ऑक्सीजन रुकना मुमकिन नहीं लगता।
मुझे नहीं लगता NDTV की सरकार से भिड़ने की हैसियत है।
NDTV के मालिक प्रणय राय एक्सप्रेस वाले रामनाथ गोयनका नहीं हैं कि घर फूँककर भिड़ जाएँ।
जो दिख रहा है, हो सकता है कि हक़ीक़त वह न हो।"
(5 November 2016)

"NDTV साढ़े चार साल जनता का भरोसा जीतने की कोशिश करता है ताकि पाँचवें साल चुनाव के समय बीजेपी के पक्ष में हवा बना सके।
उस बात के पक्ष में मेरे पास NDTV के कम से कम पाँच ओपिनियन पोल हैं जो बीजेपी के पक्ष में किए गए। सारे ग़लत साबित हुए।
NDTV ने BSP, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल को आगे दिखाने की ग़लती कभी नहीं की। जबकि इनकी अक्सर सरकार बनती है।
यूपी चुनाव में NDTV फिर से यही करने वाला है।" 
(11 December 2016)


और पढीये...

"NDTV हिंदी ने साल में एक जैसा-तैसा कार्यक्रम बाबा साहेब पर कर दिया तो आप जैसे भोले लोग फ़िदा हो गए।
यह भी नहीं देखा कि उसी चैनल ने पिछले चुनाव से ठीक पहले बहनजी के खिलाफ कैसा ज़हरीला कार्यक्रम चलाया। यह चैनल अभी अभी झारखंड की बीजेपी सरकार से बड़ी रक़म ले चुका है।
यूपी में विधानसभा से पारित नियम से हर पूर्व मुख्यमंत्री को सरकारी घर मिला है। सबने अपने ढंग से सजाया है। कार्यक्रम सिर्फ बहनजी के घर पर किया गया।
NDTV ने सिर्फ बहनजी के सरकारी आवास का बेडरूम और बाथरूम नापा। जबकि हर पूर्व मुख्यमंत्री का घर एक जैसा है। यहाँ तक कि मार्बेल की क्वालिटी जाँची गई।
इस कार्यक्रम में बहनजी को माया मेमसाहेब कहा गया है। समझने वाले समझते होंगे कि यह कितना अपमानजनक है।
बहनजी के सरकारी घर पर बनाए गए कार्यक्रम का अंत गीता के श्लोक से किया गया।
मीडिया एक सिस्टम है। एक कार्यक्रम आपके पक्ष का दिखाकर, उसकी आड़ में आपकी जड़ खोद दी जाती है।
भरोसा हासिल करने के बाद गला काटना आसान होता है।
पता नहीं मैं अभी किन मीडिया-मूर्खों को यह सब बता रहा हूँ।"
(28 February 2017)


"NDTV के रवीश कुमार हर दिन आधा घंटा सेकुलरिज्म करते हैं। फिर बिहार चुनाव आता है और पूरा चैनल कम्यूनल होकर बीजेपी का प्रचार करने लगता है।
लेकिन रवीश को उसके मालिक अब भी सेकुलरिज्म करने देते हैं।
कुछ समय बाद असम चुनाव में एनडीटीवी फिर कम्यूनल हो जाता है। लेकिन रवीश इसके बाद भी सेकुलरिज्म करता रहता है।
उस बीच सरकार एनडीटीवी पर एक दिन का बैन लगाकर उसे लागू नहीं करती। चैनल लोगों की नज़र में भरोसेमंद हो जाता है।
उसके बाद यूपी चुनाव में पूरा चैनल फिर बीजेपी की हवा बनाने में जुट गया है।
RSS की सारी साइट्स लिख रही हैं - "मोदी की सबसे बड़े विरोधी NDTV बता रही है कि बीजेपी यूपी में जीत रही है।"
रवीश को उसके मालिक आगे भी सेकुलरिज्म करते रहने दे सकते हैं।
मीडिया एक सिस्टम है। भरोसेमंद दिखते रहना उसकी ज़रूरत। रवीश जैसे प्यादों की ज़रूरत होती है। रवीश का सेकुलरिज्म शक के दायरे में नहीं है। लेकिन वह एक सिस्टम को ही मज़बूत बना सकता है।
स्टूअर्ट हॉल को पढ़िए। लेख का नाम है The Whites of Their Eyes. मीडिया सिस्टम को समझने में मदद मिलेगी।"
(6 March 2017)


और ये आज की ताजा पोस्ट ...
"जिस समय यूपी के विधानसभा चुनाव में मतदान चल रहा था, ओपिनियन पोल और एक्ज़िट पोल पर रोक थी, तब एक दिन टीवी देखने वाले चौंक गए।
NDTV कंपनी के मालिक प्रणय रॉय 5 मार्च को बता रहे थे कि यूपी में बीजेपी जीत रही है। सबको लगा कि यह कौन सा ओपिनियन पोल आ गया। कार्यक्रम के अंत में धीरे से बताया गया कि यह एहसास उन्हें लोगों से बातचीत करने के बाद हुआ।
चुनाव के बीच यह कार्यक्रम सीधे तौर पर मतदान को प्रभावित करने के लिए किया गया।
बीजेपी और उसकी सैकड़ों-हज़ारों सच्ची-फ़र्ज़ी साइटें और 25-25 लाख फ़ॉलोवर वाले सैकड़ों पेज इस खबर को ले उड़े कि बीजेपी के प्रचंड विरोधी प्रणय रॉय ने भी हार मान ली है। बीजेपी ने इसे ख़ूब भुनाया।
चुनाव के दौरान NDTV जैसी हरकत घोषित तौर पर बीजेपी समर्थक ज़ी न्यूज, ABP न्यूज, आज तक, रजत शर्मा और इंडिया न्यूज ने भी नहीं की।
जबकि कुछ दिन पहले ही मोदी सरकार में NDTV पर एक दिन के बैन की घोषणा की थी।
मुझे तो नहीं समझ आ रहा है कि सरकार और NDTV के बीच क्या चल रहा है।
इस कंपनी की साइट पर आप पाएँगे कि कई वर्षों से यह कंपनी भारी क़र्ज़ और घाटे में है। टॉप लाइन और बॉटम लाइन दोनों ख़राब है।
टीआरपी के मामले में इस कंपनी के सभी चैनल सबसे नीचे हैं। पिछले हफ़्ते NDTV हिंदी की रेटिंग 2.8% रही।
माल्या के साथ मिलकर खोला गया चैनल NDTV लाइफ़स्टाइल बंद हो चुका है। इसका बिज़नेस चैनल NDTV प्रॉफिट इसी महीने बंद हो रहा है।
मुमकिन है कि यह कंपनी कुछ बड़े कॉरपोरेट जैसे अंबानी, ओसवाल और जिंदल की दया पर चलती रही।
राडिया टेप नंबर # 132 में नीरा राडिया कहती हैं कि अंबानी ग्रुप को प्रणय रॉय की मदद करनी है। आप इसे सुन सकते हैं। यह टेप अब सुप्रीम के पास भी है।
मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा कि हो क्या रहा है।
किसी भी मामले को ज़्यादा गहराई से जानने का यही नुक़सान है।
मैं विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थक हूँ।"
(06 Jun 2017)


- Created By Vishal Sonara










सरकार और NDTV के बीच क्या चल रहा है??? : दिलीप मंडल

जिस समय यूपी के विधानसभा चुनाव में मतदान चल रहा था, ओपिनियन पोल और एक्ज़िट पोल पर रोक थी, तब एक दिन टीवी देखने वाले चौंक गए।
NDTV कंपनी के मालिक प्रणय रॉय 5 मार्च को बता रहे थे कि यूपी में बीजेपी जीत रही है। सबको लगा कि यह कौन सा ओपिनियन पोल आ गया। कार्यक्रम के अंत में धीरे से बताया गया कि यह एहसास उन्हें लोगों से बातचीत करने के बाद हुआ।
चुनाव के बीच यह कार्यक्रम सीधे तौर पर मतदान को प्रभावित करने के लिए किया गया।
बीजेपी और उसकी सैकड़ों-हज़ारों सच्ची-फ़र्ज़ी साइटें और 25-25 लाख फ़ॉलोवर वाले सैकड़ों पेज इस खबर को ले उड़े कि बीजेपी के प्रचंड विरोधी प्रणय रॉय ने भी हार मान ली है। बीजेपी ने इसे ख़ूब भुनाया।
चुनाव के दौरान NDTV जैसी हरकत घोषित तौर पर बीजेपी समर्थक ज़ी न्यूज, ABP न्यूज, आज तक, रजत शर्मा और इंडिया न्यूज ने भी नहीं की।
जबकि कुछ दिन पहले ही मोदी सरकार में NDTV पर एक दिन के बैन की घोषणा की थी।
मुझे तो नहीं समझ आ रहा है कि सरकार और NDTV के बीच क्या चल रहा है।
इस कंपनी की साइट पर आप पाएँगे कि कई वर्षों से यह कंपनी भारी क़र्ज़ और घाटे में है। टॉप लाइन और बॉटम लाइन दोनों ख़राब है।
टीआरपी के मामले में इस कंपनी के सभी चैनल सबसे नीचे हैं। माल्या के साथ मिलकर खोला गया चैनल NDTV लाइफ़स्टाइल बंद हो चुका है। इसका बिज़नेस चैनल NDTV प्रॉफिट इसी महीने बंद हो रहा है।
मुमकिन है कि यह कंपनी कुछ बड़े कॉरपोरेट जैसे अंबानी, ओसवाल और जिंदल की दया पर चलती रही।
राडिया टेप नंबर # 132 में नीरा राडिया कहती हैं कि अंबानी ग्रुप को प्रणय रॉय की मदद करनी है। आप इसे सुन सकते हैं। यह टेप अब सुप्रीम के पास भी है।
मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा कि हो क्या रहा है।
किसी भी मामले को ज़्यादा गहराई से जानने का यही नुक़सान है।
मैं विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थक हूँ।
- दिलीप मंडल 

May 31, 2017

इसे कहते है नसीब... वो भी रजनीगंधा वाला

प्रियंका चोपड़ा ने क्या नसीब पाया है। वे बर्लिन घूम रही थीं कि आज अचानक नरेंद्र मोदी भी बर्लिन आ गए। फ़ेसबुक पर लिखती हैं कि मोदी जी ने सुबह-सुबह बुला लिया। बढ़िया गपशप हुई।
बेचारे भारत के किसान। नसीब ही ख़राब है जी। नरेंद्र मोदी इसमें क्या कर सकते हैं?

प्रियंका चोपड़ा लाइफबॉय से नहाती है। शैंपू के पाउच से सिर धोती है। पावडर लगाती है। इसलिए मोदी जी बुलाकर उनसे मिलते हैं।
किसान ये सब नहीं करते। पसीने की बदबू आती है। सिर गंदा है। काँख गीली है।
सारे मर जाएँ, तो भी मुलाक़ात मुमकिन नहीं।

अगर आप भी घड़ी साबुन से कपड़े धोएँगे और लाइफबॉय से रगड़-रगड़ कर नहाएँगे तो आप भी प्रियंका चोपड़ा की तरह मोदी और योगी से मिल सकते हैं।


- दिलीप मंडल


May 09, 2017

न्यायतंत्र के भ्रष्टाचार के सामने आवाज उठाने वाले जस्टीस कर्णन को ही सजा दे दी गई

पूरी कहानी एक सीलबंद लिफ़ाफ़े से शुरू हुई, जो एक दिन प्रधानमंत्री कार्यालय पहुँचा।

पूरी कहानी आप सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले में पढ़ सकते हैं।
उस लिफ़ाफ़े में जस्टिस कर्णन ने यह बताया था कि ज़िला जजों की नियुक्ति में किस तरह 10 करोड़ तक की रिश्वत ली जाती है। बड़ी अदालतों में भी जजों के बीच काम के बँटवारे में भी रुपए का लेनदेन होता है।
उचित तो यह होता कि प्रधानमंत्री इसकी जाँच का आदेश सक्षम एजेंसी को देते।
लेकिन यह शिकायत सुप्रीम कोर्ट को भेज दी गई। जबकि शिकायत में सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ भी सबूत थे। ये शिकायत लीक भी हो गई।
इसे सुप्रीम कोर्ट ने अपना अपमान माना और जस्टिस कर्णन पर कॉंटेप्ट ऑफ कोर्ट का मुकदमा चला दिया।
उसके बाद जो हुआ, वह आप सब जानते हैं।
कोर्ट में पैसा चलता है, यह किससे छिपा है। जस्टिस कर्णन ने सफाई का एक मौक़ा दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने उसे गँवा दिया।


***

जस्टिस कर्णन के बयानों पर मीडिया में रोक लगाकर सुप्रीम कोर्ट के जातिवादी जजों ने बता दिया है कि वे कितना डरे हुए हैं।
हाई कोर्ट का जज होने के नाते ऐसी रोक जस्टिस कर्णन भी लगा सकते थे। लेकिन वे संविधान का सम्मान करते हैं।

***
( दिलीप मंडल जी की फेसबुक वोल से)
जस्टिस कर्णन का पूरा फ़ैसला पढ लीजीये...

May 06, 2017

જ્યાં સુધી લખશો ત્યાં સુધી આઝાદી છે!! : વિજય મકવાણા

આશરે અઢી હજાર વર્ષ પછી લખવાનો,સ્વતંત્ર વિચારવાનો મોકો મળ્યો છે. સદીઓ બાદ અક્ષરો સાથે નાતો બંધાયો છે. આ સંબંધને મજબૂત કરો!! કાગળ લ્યો, પેન લ્યો ડાયરીમાં લખો, કોલસો લ્યો દિવાલ પર લખો.ભીંતો ભરી મુકો!! ફેસબુક પર, વોટ્સએપ,અન્ય સોશ્યલ મિડીયા પર અંદાજે 19 કરોડ ભારતીયો લખી રહ્યાં છે. તમે પણ એમાં સામેલ છો. બેધડક લખો. ખુદના વિચારો રજુ કરો. આંબેડકર,પેરીયાર,ફુલે,લલ્લઈસિંહ યાદવની સમાનતાની વિચારધારાને લખો. સમાજ જરૂર બદલાશે. એ લોકો મુરખ ન હતાં જેમણે તમારા લખવા,વાંચવા,બોલવા પર પ્રતિબંધ મુક્યો હતો. જીભ કાપી લેવી,કાનમાં ધગધગતું સીસું રેડી દેવું, આંગળીઓ કાપી લેવી..આ બધી સજાઓ ખાલી તમારા શરીરને અંકુશમાં રાખવા જ નહોતી કરવામાં આવતી. તમારા દિમાગ પર પકડ બનાવવા અમલમાં હતી. હવે તમે સ્વતંત્ર છો. લખો તમારા માટે નહીં તમારા બાળકો માટે લખો. પોતાની ઓળખ માટે લખો.સમાનતા માટે લખો. એક મહાન સંસ્કૃતિને જીવંત કરવા માટે લખો. આંગળીઓ દુ:ખે તોય લખો..જ્યાં સુધી લખશો ત્યાં સુધી આઝાદી છે!!
-વિજય મકવાણા
વિચારબીજ:ડીસીમંડલ















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આ માનસિક રોગીઓનો દેશ છે : દિલીપ મંડલ

મા: ઘરથી બહાર જાય છે. પહેલાં ટોઇલેટ જઇ લે.
પુત્રી: હજી હમણાં તો ગઇ છું.
મા: એકવાર ફરીથી જઇ આવ.
પુત્રી: સારું, મમ્મી જાઉં છું.
મા: પાણી કેમ પીએ છે?
પુત્રી: તરસ લાગી છે.
મા: બસ કર હવે, વધુ ન પી.
પુત્રી: કેમ?
મા: લાંબી સફર છે, વધુ પાણી પીશે તો જઇશ ક્યાં?
પુત્રી: પણ મમ્મી ગઇ વખતે ઓછું પાણી પીવાથી લૂ લાગી ગઇ હતી. ડીહાઇડ્રેશન..મરી ગઇ હોત તો?
મા: કોઇ વાંધો નહી, એમ કંઇ મરી નહી જા.
પુત્રી: ડોક્ટર માસીએ કહ્યું હતું ઓછું પાણી પીવાથી મને ઘણી ગંભીર બિમારીઓના લક્ષણ છે.
મા: તો શું થયું? રસ્તામાં પછી ક્યાં કરીશ?
પુત્રી: મમ્મી, મોન્ટુને તો પાણી પીવાથી તું રોકતી નથી. મને કેમ રોકે છે?
મા: મોન્ટુ બસની પાછળની બારીએ જઇ શકે છે.
પુત્રી: મોન્ટુ જઇ શકે તો હું કેમ નહી?
મા: માર ખાઇશ હવે! બહું ચાંપલી ન થા! આ આપણી સંસ્કૃતિ છે, સંસ્કાર છે. મોન્ટુ જઇ શકે તું નહી.
પુત્રી: તું ઠેકઠેકાણે ટોઇલેટ કેમ નથી બનાવી દેતી?
મા: એ શક્ય નથી, નહી બને.
પુત્રી: કેમ?
મા: કેમ કે, દેશને લાગે છે કે,ઔરતો રોકી શકે છે.
પુત્રી: તું રોકી શકે છે મમ્મી??
મા: ના. નથી રોકી શકતી.
પુત્રી: તો?
મા: તો શું? માર ખાવો છે તારે? બંદ કર તારો બકવાસ. ભાગ અહીંથી.
અને તમે કહો છો ભારતને બિમાર દેશ કહી મેં મોટો અપરાધ કરી નાખ્યો છે. હવે આ દેશને સંયુક્ત રાષ્ટ્રની સુરક્ષા સમિતીમાં કાયમી સીટ જોઇએ છે. જે મહિલાઓને ટોઇલેટ સીટ નથી આપી શકતો. અને મહિલાઓની આ પરેશાની બાબતે વિચારી પણ નથી રહ્યો. આ માનસિક રોગીઓનો દેશ છે. અને જે મનોરોગી નથી તે પાગલખાનામાં જાય..પાકિસ્તાન જાય..!!
-દિલીપ મંડલની વોલ પરથી સાભાર...
અનુ: વિજય મકવાણા













Facebook Post :-



May 05, 2017

इन मीडिपा पे आप भरोसा कैसे कर लेते हैं जहा पर आप की सात पीढी तक कोइ नही पहुंचा

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के राजगीर प्रशिक्षण शिविर के दौरान पत्रकारों का एक ग्रूप बहोत बौखला गया जब वरीष्ट पत्रकार और इंडिया टुडे के पूर्व सम्पादक व लेखक दिलीप मंडल ने बिहारी मीडिया में दलितों और पिछड़ों की नगण्य भागीदारी सवाल उठाये और आंकड़ा पेश किया.


दिलीप मंडल ने मीडिया में सामाजिक न्याय का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पटना के 200 से ज्यादा पत्रकारों में मुश्किल से एक दलित समुदाय का और चार-पांच पिछड़े समाज के पत्रकार हैं. उन्होंने कहा कि 90-95 प्रतिशत पत्रकार सवर्ण समुदाय से आते हैं. मंडल ने कहा कि बिहार में सामाजिक न्याय के नेताओं की सरकार 27 वर्षों से है और पिछड़ी व दलित जातियाों का सशक्तीकरण हुआ है जबकि मीडिया जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में अभी भी उनका प्रतिनिधित्व नगण्य है.

दिलीप मंडल ने कहा कि उत्तर प्रदेश व बिहार का मीडिया विगत ढ़ाई दशकों से सामाजिक न्याय की सरकारों के विज्ञापन के बूते चलते रहे हैं लेकिन यही मीडिया सामाजिक न्याय की शक्तियों के खिलाफ अभियान चलाता है. इसकी सबसे बड़ी वजह मीडिया में पिछड़ों और दलितों की नुमाइंदगी का न होना है.मंडल ने उदाहरण देते हुए बताया कि 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में मीडिया ने मतगणना शुरू होते ही भाजपा की जीत की खबरें चलाने लगा. इनकी रिपोर्टिंग का नतीजा यह हुआ कि भाजपा के हजारों कार्यकर्ता जीत के लड्डू बांटने लगे, लेकिन मीडिया की यह खबर बुलबुले की तरह फूट गयी.

मंडल ने इस सवाल पर चिंता जताते हुए कहा कि उत्तर भारत में किसी भी पिछड़े नेता ने अपना समानांतर मीडिया खड़ा नहीं किया और वे उन्हीं मीडिया समूहों को समर्थन देते रहे जो उनके खिलाफ अभियान चलाता है और उन्हें बदनाम करता है. मंडल ने कि दक्षिण भारतीय राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने अपना समानांतर न्यूज चैनल और अखबार चलाते हैं जिसके कारण उन्हें मुख्यधारा के मीडिया पर निर्भरता कम रहती है.

दिलीप मंडल द्वारा उठाये गये इन्हीं सवालों के बाद जब सत्र समाप्त हुआ और वह सभागार से बाहर चले गये तो कुछ पत्रकारों ने लालू प्रसाद के समक्ष अपना विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि जाति का सवाल उठाना गलत है. एक पत्रकार ने कहा कि ब्राह्मण जाति में पैदा होना क्या गुनाह है. पत्रकारों का कहना था कि जब मंडल सम्पादक थे तो उन्होंने कितने दलित या पिछड़े लोगों को पत्रकारिता की नौकरी दिलवाई. पत्रकारों के इन सवालों को लालू प्रसाद ने अपने जाने पहचाने अंदाज में टेकल किया. लालू ने कहा कि कुछ लोगों के सवालों पर गंभीर होने से बचना चाहिए.

दिलीप मंडल को राष्ट्रीय जनता दल ने सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और मीडिया का अंतर्संबंध विषय पर अपनी बात कहने के लिए आमंत्रित किया था.

ऐसी सच बोलने की अदा ने ही दिलीप मंडल को पत्रकारीता की दुनीया मे एक अनोखा स्थान दीया हुआ है. 

सोशीयल मीडीया मे काफी चाहना है दिलीप मंडल साहब की.















मंडल साहब ने आगे अपने फेसबुक एकाउंट के माध्यम से कहा :-

"पटना शहर के सात बड़े अख़बारों के 297 पर्मानेंट पत्रकारों में सिर्फ एक SC है।यह उस राज्य का हाल है, जहाँ सामाजिक न्याय के नाम पर सरकारें बनती हैं। बाक़ी देश का अंदाज़ा आप ख़ुद लगा सकते हैं।दिल्ली में किसी राष्ट्रीय चैनल में कोई SC एंकर नहीं है। राष्ट्रीय मीडिया में OBC की हिस्सेदारी सिर्फ 4% है।

सवाल यह नहीं है कि मीडिया जातिवादी है। सवाल यह है कि ऐसे अख़बारों और चैनलों पर आप भरोसा कैसे कर लेते हैं।"


May 04, 2017

दिलीप मंडल ने उठाया मीडिया में जाति का सवाल, भड़क गए सवर्ण पत्रकार

पटना। राष्ट्रीय जनता दल के राजगीर प्रशिक्षण शिविर के दौरान पत्रकारों के एक ग्रूप ने तब असहज स्थिति उत्पन्न कर दी जब वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने बिहार के मीडिया में दलितों और पिछड़ों की नगण्य भागीदारी पर आईना दिखाते हुए आंकड़ा पेश किया।

दिलीप मंडल के मंच से जाने के बाद पत्रकारों का एक ग्रूप राजद प्रमुख लालू प्रसाद के सामने आ गया और दिलीप मंडल द्वारा उठाये गये सवालों पर अपना विरोध दर्ज कराने लगा।दिलीप मंडल को राष्ट्रीय जनता दल ने सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और मीडिया का अंतर्संबंध विषय पर अपनी बात कहने के लिए आमंत्रित किया था।

इससे पहले दिलीप मंडल ने मीडिया में सामाजिक न्याय का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पटना के 200 से ज्यादा पत्रकारों में मुश्किल से एक दलित समुदाय का और चार-पांच पिछड़े समाज के पत्रकार हैं। उन्होंने कहा कि 90-95 प्रतिशत पत्रकार सवर्ण समुदाय से आते हैं। मंडल ने कहा कि बिहार में सामाजिक न्याय के नेताओं की सरकार 27 वर्षों से है और पिछड़ी व दलित जातियों का सशक्तीकरण हुआ है जबकि मीडिया जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में अभी भी उनका प्रतिनिधित्व नगण्य है।

मीडिया के सामाजिक चरित्र पर धावा बोलते हुए इंडिया टुडे के पूर्व सम्पादक व लेखक दिलीप मंडल ने कहा कि उत्तर प्रदेश व बिहार के मीडिया विगत ढ़ाई दशकों से सामाजिक न्याय की सरकारों के विज्ञापन के बूते चलते रहे हैं लेकिन यही मीडिया सामाजिक न्याय की शक्तियों के खिलाफ अभियान चलाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह मीडिया में पिछड़ों और दलितों की नुमाइंदगी का न होना है। मंडल ने उदाहरण देते हुए बताया कि 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में मीडिया ने मतगणना शुरू होते ही भाजपा की जीत की खबरें चलाने लगा। इनकी रिपोर्टिंग का नतीजा यह हुआ कि भाजपा के हजारों कार्यकर्ता जीत के लड्डू बांटने लगे, लेकिन मीडिया की यह खबर बुलबुले की तरह फूट गयी।

दिलीप मंडल ने इस सवाल पर चिंता जताते हुए कहा कि उत्तर भारत में किसी भी पिछड़े नेता ने अपना समानांतर मीडिया खड़ा नहीं किया और वे उन्हीं मीडिया समूहों को समर्थन देते रहे जो उनके खिलाफ अभियान चलाता है और उन्हें बदनाम करता है। मंडल ने कहा कि दक्षिण भारतीय राज्यों में क्षेत्रीय दल अपना समानांतर न्यूज चैनल और अखबार चलाते हैं जिसके कारण उन्हें मुख्यधारा के मीडिया पर निर्भरता कम रहती है।

दिलीप मंडल द्वारा उठाये गये इन्हीं सवालों के बाद जब सत्र समाप्त हुआ और वह सभागार से बाहर चले गये तो कुछ पत्रकारों ने लालू प्रसाद के समक्ष अपना विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि जाति का सवाल उठाना गलत है।  

साभार- नौकरशाही डॉट कॉम













अपने पर भडके हुए इन सवर्ण पत्रकारो को मंडल साहब ने अपने अनोखे अंदाज मे रीक्वेस्ट कर दी फेसबुक के माध्यम से...
"हमारे घर में भी जब मवेशी भड़क जाते थे, तो मैं घबरा जाता था। मुझसे नहीं सँभलता था। बहुत टेंशन हो जाता है, जब कोई भड़क जाता है।
प्लीज़ भड़किए मत।"





(पोस्ट क्रीयेशन : विशाल सोनारा)

April 30, 2017

किसी की औक़ात नहीं है कि आपको जनरल कैटेगरी की सीट पर सलेक्ट होने से रोक सके : दिलीप मंडल

किसी की औक़ात नहीं है कि आपको जनरल कैटेगरी की सीट पर सलेक्ट होने से रोक सके। मेरिट में ऊपर हैं, तो जनरल सीट मिलेगी।

संविधान से लेकर सुप्रीम कोर्ट की यही व्यवस्था है। जनरल सीटें सवर्णों की नहीं हैं। ओपन सीट है।

किसी भ्रम में न पड़ें।

जिस किसी जगह यह शैतानी हो रही है, विरोध करें। यह लड़ाई आज तक कोई हारा नहीं है। लेकिन लड़े बिना जीत नहीं मिलेगी।

काडर अलोकेशन या अच्छी स्ट्रीम का लालच दिखाकर कुछ जगह गड़बड़ खेल चल रहा है, जिसे बंद कराने के लिए सरकार पर दबाव डालना होगा। यह सरकार की सहमति से चल रहा है

सरकारों को दबावों से झुकाया जा सकता है।

- दिलीप मंडल