September 30, 2017

धम्म चक्र परिवर्तन दिन 14 अक्टूबर को ही है, दशहरा से हमे क्या मतलब???

By Vishal Sonara || 30 Sep 2017 


डॉ भीमराव आंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को बौद्ध धम्म का स्वीकार किया था. हमारा धम्म चक्र परिवर्तन दिन भी वो ही दिन है. अभी दशेरा पर जो लोग गलती से घम्म चक्र परीवर्तन दिन को मना रहे है वह गलती कर रहे है और इस बात को सम्राट अशोक से जोड रहे है. सम्राट अशोक ने कब क्या किया उस का कोइ औथेंटीक रेकोर्ड अवेलेबल नही है. आंबेडकर साहब का है. तो हमे ज्यादा जोर कीस दिन पर देना है वह बताने की बात नही है. 
1956 मे बाबा साहब कि मृत्यु हुई , वह 1950 से बुद्ध जयंती मनाते आये है. कभी भी उन्होने अशोक विजया दशमी का जीक्र नही कीया है. ना ही अपने धर्म परीवर्तन के वख्त किया है. उन्होने बहोत सी किताबे लीखी , बहोत भाषण दीये अशोक विजयादशमी का जिक्र तक नही है. 

23 सीतंबर 1956 को प्रेस ट्रस्ट ओफ ईंडीया को दिए एक ईंटर्व्यु मे आंबेडकर साहब ने बताया था की 14 अक्टूबर 1956 को रविवार और दशेरा के दिन वह धर्म परीवर्तन करने वाले है. उन्होने अशोक विजया दशमी नही बोला और नाही कभी कहा. 15 अक्टुबर के दो कलाक के भाषण मे भी ऐसा कोइ जीक्र तक नही है. जो व्यक्ती इस देश के इतिहास का इतना अभ्यासु रहा है उस से ये बात  छुट नही शकती ये बात ध्यान मे रहे. 

पहले आंबेड्कर साहब को बुद्ध जयंती पर ही हिंदू धर्म को छोडना था पर जो लगभग हर साल (1956) मे महीने मे आता है. पर कुछ संजोगो के कारण वह उस दिन ना कर सके थे. बाद मे हमारे ज्यादा लोगो को अपना काम धंधा छोड्कर नागपुर जाने मे बहोत कम दिक्कत हो और ज्यादा आर्थीक नुकसान ना हो इस कारण रविवार को पसंद किया गया. और ये एक संजोग ही हो सकता है कि उस दीन दशेरा भी था. 

आंबेडकर साहब ने अपने भाषणो और लेखो मे भी नागपुर को क्यो पसंद किया उस पर स्पष्टता की है पर इस दिवस को पसंद करने पर ऐसा कभी नही कहा कि ये अशोक विजया दशमी है उस के कारण इस दिन को पसंद किया गया है. 

तिसरे दिन 16 अक्टूबर 1956 मे भी उन्होने इसी प्रकार के एक कार्यक्रम मे हिस्सा लीया और भाषण भी दिया पर वहा पर भी उन्होने ऐसा कोइ जीक्र तक नही किया. 

26/27 अक्टूबर 1956 को प्रबुद्ध भारत समाचार पत्र मे  14 अक्टूबर 1956 के दिक्षा कार्यक्रम का विशेषांक प्रसिद्ध किया गया उस अंक मे कार्यक्रम का विस्तार से वर्णन किया गया और फोटोग्राफ्स , मीनट टु मीनट का घटनाक्रम प्राप्त है उस मे भी अशोक विजयादशमी से संबंधीत कोइ भी सुचना मीलती नही है. 

दिक्षा लेने के बाद आंबेडकर 52 दिनो तक जिवित थे. इन दिनो के दौरान भी एक बार भी इन्होने ये कहा या लीखा नही है. 

ब्राह्मणीकल केलेंडर के अनुसार दशेरा और आंबेडकर का धम्म चक्र परिवर्तन दिन दोनो अलग अलग दिन पर आता है. हमे उन के केलेंडर को फोलो करने कि जरुरत क्या है ये समज मे नही आ रहा है. बाबा साहब हमे ब्राह्मणीकल हथकंडो से छुडाना चाहते थे और हम उन्ही मे उलझे हुए है. 

आंबेडकर ने लिखे ग्रंथ बुद्ध और उनका धम्म मे उन्होने प्रस्तावना मे हि लिखा है कि बुद्ध धम्म पर क्लीयर और कंसीस्टंट स्टेट्मेंट के लिये उन्होने ये ग्रंथ लीखा है. उन का लिखा हम पढते नहि है और प्रवर्तमान कथा वार्ता के सहारे लोगो मे जागृती लाने मे हमारा समय और बुद्धीमत्ता वेस्ट कर रहे है. 

सम्राट अशोक से कोइ अपत्ती नही है पर उन का इतिहास एक अलग ही परीकल्पना है. उस का सहि आकलन किसी ग्रंथ मे नही है. हम अपने महापुरुषो के कार्य को जानने और सहि परीकल्पित करने के बजाय ऐसी बातो को ले कर बैठ जाते है जिसका भीमराव आंबेडकर के आंदोलन और जीवन के परीपेक्ष मे कोइ महत्व नही होता. 

( Send me Your Thoughts via Twitter @TheVishalSonara )









September 29, 2017

ट्वीटर सेशन - 2

By Vishal Sonara || 29 Sep 2017 


ट्वीटर का पहला सेशन यहा पढें. ः ट्वीटर किस चिड़िया का नाम है


#TwitterSession - 2

ज्यादातर लोगो का ट्वीटर एकाउंट अब बन चुका है,. बहोत से लोग ट्वीट भी अच्छे खासे कर लेते है. शानदार बना दीया है ट्वीटर एक्ष्पीरीयंस आप सब लोगो ने. आज थोडा और समजते है ट्वीटर को.

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ट्वीटर पर फोलोवर्स होना बहोत जरुरी है, हांलाकी ना हो तो भी ज्यादा नीराश होने की जरुरत तो नही है. एक दौर था जब हमे 20-25 फोलोवर्स होते थे तब हम अपने आप को खुशनसीब समजने लगते थे. और इतने फोलोवर्स भी बहोत दीनो के बाद होते थे. आज ऐसा समय है हमारा की अगर नया ट्वीटर एकाउंट भी बना ले तो 30-40 फोलोवर्स तो ऐसे ही हो जाते है. कुछ लोग तो थोडे ही दिनो मे 100-200 से पार हो चुके है.

- ट्वीटर पर Widespread इस्युस को प्राथमीकता मीलती है. ज्यादा लोगो तक ज्यादा ट्वीट और कम समय ये तीन चीझो का सही मेल आप के सब्जेक्ट को और महत्व देता है. और हमारा भी उद्देश्य देश और SC ST OBC और Minorities के लोगो से जुडे हुए मुद्दो पर लोगो को जागृत करना है इस के लीए हमे भी हमारे मुद्दो को Widespread बनाना बेहद जरुरी है.

- इस के लीए हमे एक सशक्त टीम बनानी होगी, जीसका काम चालु है बहोत जल्द हम इस को बनाने मे कामीयाब हो जायेगे. किसी भी सगठन से जुडा हुआ व्यक्ती और डॉ. आंबेडकर कि विचारधारा वाला हर कोइ व्यक्ती हम से जुड सकता है. इस विषय पर ज्यादा माहिती हम हमारे ट्वीटर हेंड्ल @JoinBlueArmy और फेसबुक ग्रुप Blue Army मे देते रहेगे उन से जुडे रहे.

- हम किसी भी पोलीटीकल पार्टी या ग्रुप से जुडे नही है , आंबेडकर को मानने वाले लोग एक होकर देश को एक प्रबुद्ध राष्ट्र बनाने मे और डॉ. आंबेडकर के विचारो को दुनीया के सामने रखने मे सहभागी बनेगे. हर कोइ पार्टी या ग्रुप का व्यक्ती हम से जुड सकता है हम किसी के साथ जुडेगे नही हम से जुडे मुद्दे उठाने मे सहयोग करेगे ये नीश्चीत है.

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ये सब करने के लीए आज फोलोवर्स बढाने के लीए क्या करना होगा ये कुछ बाते आप से शेअर करता हु.

* ट्वीटर एकाउंट को अच्छे से सेट कर के रखे, प्रोफाईल फोटो, बेनर फोटो , Bio ETC...

* ज्यादा लोगो को फोलो करे, जहा से भी हमे जानकारी मीलने की गुंजाईश है उन सब ट्वीटर एकाउंट को फोलो करे और आपस मे भी हम सब एक दुसरे को फोलो करते रहे. ट्वीटर पर एक हमारा हैशटेग भी है #WeTheBahujans इस पर ट्वीट कर के रखे और उस ट्वीट पर ये शब्द पर क्लीक करने से कुछ और हमारे लोगो द्वारा की हुई ट्वीट्स दीखेगी उन सब को उनके प्रोफाईल फोटो पर क्लीक कर के फोलो कर ले और उन्की ट्वीट्स लाईक करे और रीट्वीट (Share) भी करते रहे.

* असरकारक ट्वीट करे, शोर्ट एंड एफेक्टीव ट्वीट करनी होगी हमे, सामने वाले को समजने मे दिक्क्त हो ऐसी ट्वीट ना करे.

* करंट टोपीक पर ट्वीट करते रहे. देश मे कोइ भी घटना होगी वह 15-20 मीनट मे ट्वीटर ट्रेंड मे आजायेगी, कि गई ट्वीट को पढ कर पुरा मामला समज ले और अपने विचारो के साथ आप भी उसी ट्रेंड पर ट्वीट करे जिस से लोग आप के ट्वीट को पढकर आप को फोलो करते रहेगे.

* कुछ मुद्दो पर लिंक के साथ ट्वीट करे ताकी लोगो को ओथेंटीक लगे.

* एक दुसरे को मेंशन करते रहे, जीस ट्वीट मे किसी नेता या संगठन और कंपनी का नाम आता हो उस मे नाम की जगह उस पार्टी का ओफीशीयल ट्वीटर हेंड्ल मेंशन करे. जैसे की United Nations के बारे मे बात कर रहे है तो उस मे UN का ओफीशीयल ट्वीटर हेंडल है @UN उस को मेंशन करे इस से शब्दो की बचत भी होगी और ट्वीट भी असरकारक बनेगी. ओफीशीयल हेंडल ब्लु टीक वाला होता है जैसे की मैने मेरी एक पोस्ट मे बताया था.

* ब्लु टीक वाले ट्वीटर एकाउंट की ट्वीट पर जवाब देना.

पोस्ट थोडी लंबी हो चुकी है इस लीए अभी इतना ही.



ये हमारे हैशटेग पर की ट्वीट है आप भी करे इस प्रकार की ट्वीट और ये ट्वीट कीये लोगो को फोलो करे.



September 24, 2017

Poona Pact - September 24,1932

By Social Media Desk

During the first Round Table Conference, when Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar favoured the move of the British Government to provide separate electorate for the oppressed classes (Dalit), Gandhi strongly opposed it on the plea that the move would give power to the oppressed classes (Dalit). He went on an indefinite hunger strike from September 20, 1932, against the decision of the then British Prime Minister J.Ramsay MacDonald granting communal award to the depressed classes in the constitution for governance of British India.

In view of the mass upsurge generated in the country to save the life of Gandhi, Ambedkar was compelled to soften his stand. A compromise between the leaders of caste Hindu and the depressed classes was reached on September 24,1932, popularly known as Poona Pact. The resolution announced in a public meeting on September 25 in Bombay confirmed -" henceforth, amongst Hindus, no one shall be regarded as an untouchable by reason of his birth and they will have the same rights in all the social institutions as the other Hindus have". This landmark resolution in the history of the Dalit movement in India subsequently formed the basis for giving due share to Dalits in the political empowerment of Indian people in a democratic Indian polity.
The following is the text of the agreement arrived at between leaders acting on behalf of the Depressed Classes and of the rest of the community, regarding the representation of the Depressed Classes in the legislatures and certain other matters affecting their welfare.
1. There shall be seats reserved for the Depressed Classes out of general electorate seats in the provincial legislatures as follows: - Madras 30; Bombay with Sind 25; Punjab 8; Bihar and Orissa 18; Central Provinces 20; Assam 7; Bengal 30; United Provinces 20. Total 148. These figures are based on the Prime Minister's (British) decision.
2. Election to these seats shall be by joint electorates subject, however, to the following procedure All members of the Depressed Classes registered on the general electoral roll of a constituency will form an electoral college which will elect a panel of tour candidates belonging to the Depressed Classes for each of such reserved seats by the method of the single vote and four persons getting the highest number of votes in such primary elections shall be the candidates for election by the general electorate.
3. The representation of the Depressed Classes in the Central Legislature shall likewise be on the principle of joint electorates and reserved seats by the method of primary election in the manner provided for in clause above for their representation in the provincial legislatures.


Tweet Your Thoughts on Poona Pact with Hashtag : - #पूना_करार_एक_धोखा


September 20, 2017

गांधी और उनका आमरण अनशन

By Vishal Sonara || 20 Sep 2017 

#TodayInHistory
#GandhiAndHisFast
20/09/1932
अंग्रेज़ों ने सन 1930 से 1932 में लंडन में तीन गोलमेज़ कान्फ्रेंसें की थी, जीसमें अन्य अल्प संख्यकों के साथ साथ दलितों को भी भारत के भावी संविधान के निर्माण में अपना मत  अलग से रखने के अधिकार को मान्यता मिली.
इन गोलमेज़ परीषदोंमें डॉ. भीमराव आंबेडकर तथा राव बहादुर आर. श्रीनिवासन द्वारा अछूतों के प्रभावकारी प्रतिनिधित्व एवं हो रहे भेदभाव पर असरकारक प्रस्तुति के कारण 17 अगस्त, 1932 को ब्रिटिश सरकार द्वारा घोषित ‘कमिनुअल अवार्ड’ में अछूतों को पृथक निर्वाचन का स्वतन्त्र राजनीतिक अधिकार मिला. इस अवार्ड से दलितों को आरक्षित सीटों पर पृथक निर्वाचन द्वारा अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार मिला. ये अधिकार मिलने से अछूतों के ही वोट से अछूतों के प्रतिनिधि चुनकर संसदों मे जाये इस तरह का अधीकार दिया गया. इसके कारन आज जो समाज के दलाल समाज को अपने हिसाब से बेच दिया करते हैं ऐसा नहीं हो रहा होता. भारत के इतिहास में अछूतों को पहली वार राजनैतिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त हुआ जो उनकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता था. इतिहासमें तब तक ये अधिकार किसी महात्मा या भगवान ने देने की बात भी नहीं की है. जो अंग्रेजो ने दिया उसका भी विरोध करने तथाकथीत महात्मा जी उठ खडे हुए.
उक्त अवार्ड द्वारा दलितों को गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट,1919 में अल्प संख्यकों के रूप में मिली मान्यता के आधार पर अन्य अल्प संख्यकों – मुसलमानों, सिक्खों, ऐंग्लो इंडियन्झ तथा कुछ अन्य के साथ साथ पृथक निर्वाचन के रूप में प्रांतीय विधायकाओं एवं केन्द्रीय एसेम्बली हेतु अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार अछूतों को भी मिला तथा उन सभी के लिए सीटों की संख्या निश्चित की गयी. 
गाँधी जी ने उक्त अवार्ड की घोषणा होने पर यरवदा (पूना) जेल में 18 अगस्त, 1932 को दलितों को मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरोध में 20 सितम्बर, 1932 से आमरण अनशन करने की घोषणा कर दी. गाँधी जी का मत था कि इससे अछूत हिन्दू समाज से अलग हो जायेंगे जिससे हिन्दू समाज व हिन्दू धर्म विघटित हो जायेगा.
गांधी जी की ये बात अगर पोजिटिव भी ले तो आज भी कहा हिन्दू समाज विघटित नहीं है?? आज जो अछूतों के साथ सौहार्द से रहने का नाटक कर रहे हैं वह गैरमौजूदगी में नफरत की बात ही करता है. मैं ये नहीं कहता सब ऐसे हैं पर ज्यादातर लोगों की मानसिकता आज भी वैसी ही है. जो वोट लेने के लिए आज आप के सामने नतमस्तक है वह कल आपके ही खिलाफ षडयंत्र कर रहे होते हैं. खुद आरक्षित प्रतिनिधि बोल देते हैं कि मै कहा आपके वोट से चुनकर आया हूँ. ये सब परिस्थितियों से हमारा नुकसान ना हो इसलिए ही बाबा साहबने अंग्रेजो से ये अधीकार दिलवाया था.
पर महात्मा जी को ये मंजूर न था. उन्होंने ये अधिकार छीनने के लिए अपना हिंसक हथियार "आमरण अनशन" इसके विरोध में उपयोग किया. 
यह याद रहे कि उन्होंने मुसलमानों, सिक्खों व ऐंग्लो- इंडियनज को मिले उसी अधिकार का कोई विरोध नहीं किया था, सिर्फ अनुसूचित जाति के अधिकार का ही विरोध किया. 
- विशाल सोनारा


(SS : "Gandhi and His fast" , Dr. Babasaheb Ambedkar Writings & Speeches Vol. 5, Page No 329)
Twitter पर #GandhiAndHisFast से ट्विट करके अपने विचार रखें.

ट्वीटर पर इस विषय मे पढें. ः- 



September 19, 2017

અનામત અને બ્રાહ્મણવાદી તરકીબો

By Rushang Borisa   || 8 September 2017 at 23:31



અનામત શબ્દ એટલો આકર્ષક છે કે આ વિષયે જયારે વાત નીકળે ત્યારે ગમે ત્યાં ચર્ચા-વિવાદ શરુ થઇ જાય. અનામતને લઈને સામાન્ય રીતે હિન્દૂ ઉચ્ચ જ્ઞાતિઓમાં અણગમો કે રોષ જોવા મળે છે. એટલું જ નહીં તેઓ દેશની ટોચની અડચણોમાં સામેલ પણ કરી,ભારતના પછાતપણા માટે અનામત જવાબદાર છે તે વિષે જાતજાતના તર્ક-કુતર્ક કરતા રહે. આ મુદ્દાનો એટલો (અપ)પ્રચાર કરવામાં આવ્યો છે કે તેનો લાભ લેતો ઓબીસી વર્ગ પણ તેની જાહેરમાં ટીકા કરે છે!
અનામત વિરોધીઓની મુખ્યત્વે એવી દલીલ હોય છે કે અનામતને લીધે ગુણવત્તાસભર પ્રતિભાઓને તક મળતી નથી અને અયોગ્ય વ્યક્તિને તક મળી જાય.તેના સમર્થનમાં તેઓ વિદ્યાર્થીઓના ગુણપત્રકો બતાવતા રહે છે. સાથે સાથે અતિશયોક્તિભરેલ-બનાવટી તથ્યો પણ ઉમેરાતા રહે છે.વળી, અનામતનો લાભ વંચિતોના છેવાડાના વર્ગ સુધી નથી પહોંચતો તે દલીલ ને પણ હથિયાર બનાવી મૂળ અનામતના ખ્યાલ ઉપર પ્રહારો થતા રહે છે.
અનામત-વિરોધીઓની આવી તરકીબોએ અનામત-લાભાર્થીઓના મગજમાં એક પ્રકારની "દોષભાવના" કાયમ કરી છે. એટલે ઘણા લાભાર્થીઓ અનામતને ભાંડે છે અથવા તેનો લાભ લેતા ખચકાય છે. આ વિષયે એ હદે એકતરફો પ્રચાર કરાયો છે કે દલીલોમાં લગભગ અનામતવિરોધીઓ સરસાઈ મેળવે છે. જોક્સ-મેસેજીસ-ફોટોશોપ્ડ પીક્સ વગેરેનો ઉપયોગ હવે બદલાતા જમાના સાથે અનામત મુદ્દે પણ બ્રાહ્મણવાદીઓ કરી રહ્યા છે.
અહીંથી, અનામત વિષયે અનામતવિરોધીઓની દલીલને ખરીજ કરવાનો પ્રયાસ થયો છે. (આ પણ વાંચજો- ભારત અને રેસીસ્મ )
હવે, અનામતવિરોધી એવા બ્રાહ્મણવાદીઓના દંભ કે દોગલાપન ઉપર વાત કરીયે...
મહદંશે એવો પ્રચાર કરવામાં આવે છે કે અનામત વર્ગના માર્ક્સ બહુ ઓછા હોય છે અને જનરલ વર્ગના માર્ક્સ વધારે હોય છે. જો અહીં શિક્ષણવ્યવસ્થા ને લઈને સરખામણી કરીયે તો સીધી ને સાફ વાત છે કે ભારતમાં શિક્ષણ ધંધો બની રહ્યો છે. ભારતીય શિક્ષણ ક્વોલિટી નહીં, પણ ક્વોન્ટિટી ઉપર ભાર મૂકે છે તેવી દલીલ શિક્ષણવિદોની સાથે કહેવાતી ઉચ્ચ જ્ઞાતિ પણ કરે છે. એક તરફ શિક્ષણ પદ્ધતિનો વિરોધ આ જ મેરીટધારીઓ કરતા રહે છે કે માર્કની કોઈ વેલ્યુ નથી,શિક્ષણમાં ખામીઓ છે. જયારે અનામતની વાત આવે ત્યારે કેમ માર્ક્સને મહત્વ આપતા હશે? માર્ક્સને શોપીસ ગણાવતા મેરીટધારીઓને અચાનક કેમ માર્ક્સપ્રેમ ઉભરાઈ આવતો હશે? જો શિક્ષણ પદ્ધતિમાં ખામી હોય તો સહજ છે કે તેના પરિણામે મળેલ ગુણપત્રકો પણ કોઈની સાચી પ્રતિભા-લાયકાત ધરાવતા ના હોય. વળી, પ્રેક્ટિકલી જયારે કોઈ વ્યવસાય-નોકરી કે રોજગારે જોડાય છે ત્યારે આપોઆપ લોકોને સમજાય જાય છે કે થિયોરિકલ જ્ઞાન કરતા પ્રેક્ટિકલ જ્ઞાન વધુ જરૂરી છે. જયારે ભારતીય શિક્ષણવ્યવસ્થામાં શાળા થી લઈને સ્નાતક સુધીના સ્તરે ચોપડીયા જ્ઞાનની- ગોખણપટ્ટીની બોલબાલા છે! એટલે ખામીયુક્ત પદ્ધતિને કારણે માર્ક/ગુણ વિદ્યાર્થીના મૂલ્યાંકનનો સાચો માપદંડ ના ગણી શકાય. આવી સ્થિતિમાં જો કઈ અસરકારક પરિબળ હોય તો તે શાળાકીય-કોલેજ તબક્કા પછીનો છે ; જેમાં મહાવરો-તાલીમ દ્વારા પ્રેક્ટિકલ માહિતી/સ્કિલ નું જ્ઞાન મેળવાય. પણ અનામત વિરોધીઓ આ વિષે વિચારતા જ નથી અથવા જાણી જોઈને આંખ આડા કાન કરે છે. જો તમે એક બાજુ શિક્ષણ પદ્ધતિ- ગુણપત્રકોને મહત્વ ના આપતા હોવ અને બીજી બાજુ આજ ગુણપત્રકોને સામે રાખી અનામતની ટીકા કરતા હોવ તો ખરેખર તમે હાંસીને પાત્ર છો.
બીજી એક નૈતિક જવાબદારી દર્શાવતી અને ભાવુક દલીલ અનામતવિરોધીઓ તરફ થી એવી આવે છે કે અનામતનો લાભ મધ્યમ-સમૃદ્ધ વર્ગ લઇ લે છે અને ખરેખર જેને જરૂર છે તેને મળતો નથી. એટલે કે જે વર્ગ અનામત વિના પણ રહી શકે છે તે ગરીબ વર્ગની અનામત ઝુંટવે છે. દેખીતી રીતે આ દલીલ વ્યાજબી જણાતી હોય પણ શું ખરેખર અનામતવિરોધીઓ આવું બોલવાને લાયક છે? જો અહીં ક્રિટીકલી વિચારીયે તો કહેવાતા અપર કાસ્ટ વિચારકો પણ દંભી ભાસે. કેમ કે જો તેઓ એવું કહેતા હોય કે અનામતનો ફાયદો સમૃદ્ધ-પ્રબળ સમાજ લઇ લે છે ;તો તેમની આ દલીલ ક્યાં ખોવાય જાય છે જયારે સરકારી ઉચ્ચ શૈક્ષણિક સંસ્થાઓમાં કહેવાતી ઉચ્ચ જ્ઞાતિઓનો પૈસાદાર વર્ગ બેઠકો પચાવી ને પોતાના જ સમાજના ગરીબ વર્ગને સરકારી ફાયદાઓથી વંચિત રાખે છે? શું જનરલ કેટેગરીનો સમૃદ્ધ-સક્ષમ વર્ગ પોતાના જ્ઞાતિ-સમાજના ગરીબો ખાતર સરકારી કોલેજોની બેઠકો ત્યજી ના શકે? જેમણે ક્યારેય બલિદાન નથી આપ્યું તેઓ બીજા ને બલિદાન આપવાની વાત કરે તે વિચિત્ર તો લાગે. વેલ, અહીં પણ મુખ્ય સમસ્યા ગરીબ-તવંગર ની નહીં; પણ શિક્ષણના વ્યાપારીકરણની છે. જેને લીધે લાખો રૂપિયા લૂંટતી સંસ્થાઓનો રાફડો ફાંટીયો છે. ખાસ કરીને ઉચ્ચ શિક્ષણ દેશના તમામ સમુદાયમાં સરળતાથી મળી રહે તે માટે માળખું તૈયાર કરવાની જરૂર છે; જયારે આપણા દેશમાં તો ઉલટું શિક્ષણ બજેટમાં કાપ મુકાય છે!
અહીં અનામતને લઈને બ્રાહ્મણવાદીઓની સાતિર દલીલને કાઉન્ટર કરવાનો પ્રયાસ છે. બાકી તેમની ગુણવત્તા તો આંતરરાષ્ટ્રીય સ્પર્ધાઓમાં જ દેખાઈ આવે છે કે તેઓ કેટલા મેરીટધારી છે . દેશનું ૯૦% થી પણ વધુ તંત્ર-આયોજન તેમના હાથમાં છે. વડાપ્રધાન,મુખ્યમંત્રી,ડિરેક્ટર,સલાહકાર થી લઈને પ્રિન્સિપાલ,મેનેજર વગેરે જેવા ઉચ્ચ પદો ઉપર હોવા છતાં દેશનો સર્વાંગી વિકાસ ૭૦ વર્ષ પછી પણ ના થયો હોય તો અનામતવિરોધીઓને કોઈ હિસાબે "અનામત નિષ્ફ્ળ નીવડી છે" તે કહેવાનો નૈતિક અધિકાર નથી. ખરેખર તો ૭૦ વર્ષ પછી દેશ વિષે એટલું કહી શકાય કે મેરીટધારીઓ દેશને અપેક્ષિત સ્તરે પહોંચાડવામાં નિષ્ફળ થયા છે.
આપણે ત્યાં સદીઓથી ફુલતાં-ફાલતા બ્રાહ્મણવાદને લીધે લોકોમાં જાતિવાદ વકર્યો અને ઈર્ષ્યા-અસમાનતાએ દેશના લગભગ તમામ ક્ષેત્રોને દુષિત કરી કોરી ખાધા. કમનસીબી એ રહી કે આ પ્રક્રિયામાં સીધો ફાળો ધર્મનો રહ્યો! જેનાથી સદીઓ સુધી વિકાસ રૂંધાયો અને હવે વંચિતોને તક મળે તે માટે કોઈ મજબૂત વિકલ્પ વિચારવો જ રહ્યો. દેશના સર્વાંગી વિકાસ માટે આરક્ષણ બાધારૂપ નહીં, પણ અનિવાર્ય છે. જે ધીમી પણ મક્કમ ગતિએ દેશમાં પ્રગતિના દ્વાર ખોલશે તેવી શક્યતાઓ છે ; જે જાતિવાદી આંખોને નહીં દેખાય.
જ્યાં સુધી દેશની મુખ્ય સમસ્યા અનામત નહીં ,પરંતુ જાતિવાદ-બ્રાહ્મણવાદ છે અને અનામત કોઈ સમસ્યા નહીં, ઉપાય છે તેટલું સમજવા જેટલી બુદ્ધિ નહીં દોડે ત્યાં સુધી તમે દેશના હિતેચ્છુ નહીં,પણ દુશ્મન જ કહેવાશો.
અહીં, મર્યાદિત દ્રષ્ટિકોણ થી સમજાવવાનો પ્રયાસ છે. અનામતને લઈને તમે શું વિચારો છે તે વિષે જણાવો.
(નોંધ: અત્યારે જે મેરીટધારીઓ તેમની "આંતરરાષ્ટ્રીય" ગુણવત્તાના બણગા ફૂંકે છે; તેઓ ઇતિહાસ જાણે કે અંગ્રેજો સામે સ્પર્ધામાં ટકી રહેવા આ જ કહેવાતી ઉચ્ચ હિન્દૂ જાતિઓએ લઘુતમ ગુણ ૫૦ માંથી ૪૦ કરવાની ભલામણો બ્રિટિશ સરકાર સમક્ષ કરી હતી, કારણ કે વિદેશીઓ પોતાની ઉજળિયાત-એડવાન્સ શિક્ષણ-સ્થાનિક એડવાન્ટેજથી સવર્ણોને અરીસામાં મોઢા સામે મેરીટ બતાવતા હતા.)