May 27, 2017

त्याग, बलिदान और साहस की प्रेरणा - माता रमाबाई भीमराव आंबेडकर



माता रमाबाई की पुण्यतिथी पर आप सभी को 
विनम्र अभिवादन व माता रमाबाई को कोटी कोटी नमन

माता रमाई का जन्म महाराष्ट्र के दापोली के निकट वानाड गावं में ७ फरवरी  1898 में हुआ था. पिता का नाम भीकू वालंगकर था. रमाई के बचपन का नाम रामी था. रामी के माता-पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था. रामी की दो बहने और एक भाई था. भाई का नाम शंकर था. बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु हो जाने के कारण रामी और उसके भाई-बहन अपने मामा और चाचा के साथ मुंबई में रहने लगे थे. रामी का विवाह 9 वर्ष की उम्र में सुभेदार रामजी सकपाल के सुपुत्र भीमराव आंबेडकर से सन 1906 में  हुआ था. भीमराव की उम्र उस समय 14 वर्ष थी. तब, वह 5 वी कक्षा में पढ़ रहे थे.शादी के बाद रामी का नाम रमाबाई हो गया था.  भले ही डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को पर्याप्त अच्छा वेतन मिलता था परंतु फिर भी वह कठीण संकोच के साथ व्यय किया करते थे. वहर परेल (मुंबई) में इम्प्रूवमेन्ट ट्रस्ट की चाल में एक मजदूर-मुहल्ले में, दो कमरो में, जो एक दुसरे के सामने थे रहते थे. वह वेतन का एक निश्चित भाग घर के खर्चे के लिए अपनी पत्नी रमाई को देते थे. माता रमाई जो एक कर्तव्यपरायण, स्वाभिमानी, गंभीर और बुद्धिजीवी महिला थी, घर की बहुत ही सुनियोजित ढंग से देखभाल करती थी. माता रमाईने प्रत्येक कठिनाई का सामना किया. उसने निर्धनता और अभावग्रस्त दिन भी बहुत साहस के साथ व्यत्तित किये. माता रमाई ने कठिनाईयां और संकट हंसते हंसते सहन किये. परंतु जीवन संघर्ष में साहस कभी नहीं हारा. माता रमाई अपने परिवार के अतिरिक्त अपने जेठ के परिवार की भी देखभाल किया करती थी. रमाताई संतोष,सहयोग और सहनशीलता की मूर्ति थी.डा. आंबेडकर प्राय: घर से बाहर रहते थे.वे जो कुछ कमाते थे,उसे वे रमा को सौप देते और जब आवश्यकता होती, उतना मांग लेते थे.रमाताई  घर खर्च चलाने में बहुत ही किफ़ायत बरतती और कुछ पैसा जमा भी करती थी. क्योंकि, उसे मालूम था कि डा. आंबेडकर को उच्च शिक्षा के लिए पैसे की जरुरत होगी. रमाताई  सदाचारी और धार्मिक प्रवृति की गृहणी थी. उसे पंढरपुर जाने की बहुत इच्छा रही.महाराष्ट्र के पंढरपुर में विठ्ठल-रुक्मनी का प्रसिध्द मंदिर है.मगर,तब,हिन्दू-मंदिरों में अछूतों के प्रवेश की मनाही थी.आंबेडकर, रमा को समझाते थे कि ऐसे मन्दिरों में जाने से उनका उध्दार नहीं हो सकता जहाँ, उन्हें अन्दर जाने की मनाही हो. कभी-कभार माता रमाई धार्मिक रीतीयों को संपन्न करने पर हठ कर बैठती थी, जैसे कि आज भी बहुत सी महिलाए धार्मिक मामलों के संबंध में बड़ा कठौर रवैया अपना लेती है. उनके लिये  कोई चांद पर पहुंचता है तो भले ही पहुंचे, परंतु उन्होंने उसी सदियों पुरानी लकीरों को ही पीटते जाना है. भारत में महिलाएं मानसिक दासता की श्रृंखलाओं में जकडी हुई है. पुरोहितवाद-बादरी, मौलाना, ब्राम्हण इन श्रृंखलाओं को टूटने ही नहीं देना चाहते क्योंकि उनका हलवा माण्डा तभी गर्म रह सकता है यदि महिलाए अनपढ और रुढ़िवाद से ग्रस्त रहे. पुरोहितवाद की शृंखलाओं को छिन्न भिन्न करने वाले बाबासाहब डॉ. आंबेडकर ने पुरोहितवाद का अस्तित्त्व मिटाने के लिए आगे चलकर बहुत ही मौलिक काम किया.

बाबासाहब डॉ. आंबेडकर जब अमेरिका में थे, उस समय रमाबाई ने बहुत कठिण दिन व्यतीत किये. पति विदेश में हो और खर्च भी सीमित हों, ऐसी स्थिती में कठिनाईयां पेश आनी एक साधारण सी बात थी. रमाबाई ने यह कठिण समय भी बिना किसी शिकवा-शिकायत के बड़ी वीरता से हंसते हंसते काट लिया. बाबासाहब प्रेम से रमाबाई को "रमो" कहकर पुकारा करते थे. दिसंबर १९४० में डाक्टर बाबासाहब बडेकर ने जो पुस्तक "थॉट्स ऑफ पाकिस्तान" लिखी व पुस्तक उन्होंने अपनी पत्नी "रमो" को ही भेंट की. भेंट के शब्द इस प्रकार थे. ( मै यह पुस्तक) "रमो को उसके मन की सात्विकता, मानसिक सदवृत्ति, सदाचार की पवित्रता और मेरे साथ दुःख झेलने में, अभाव व परेशानी के दिनों में जब कि हमारा कोई सहायक न था, अतीव सहनशीलता और सहमति दिखाने की प्रशंसा स्वरुप भेंट करता हूं.."उपरोक्त शब्दों से स्पष्ट है कि माता रमाई ने बाबासाहब डॉ. आंबेडकर का किस प्रकार संकटों के दिनों में साथ दिया और बाबासाहब के दिल में उनके लिए कितना सत्कार और प्रेम था. 

बाबासाहब डॉ. आंबडेकर जब अमेरिका गए तो माता रमाई गर्भवती थी. उसने एक लड़के (रमेश) को जन्म दिया. परंतु वह बाल्यावस्था में ही चल बसा. बाबासाहब के लौटने के बाद एक अन्य लड़का गंगाधर उत्पन्न हुआ.. परंतु उसका भी बाल्यकाल में देहावसान हो गया. उनका इकलौता बेटा (यशवंत) ही था. परंतु उसका भी स्वास्थ्य खराब रहता था. माता रमाई यशवंत की बीमारी के कारण पर्याप्त चिंतातूर रहती थी, परंतु फिर भी वह इस बात का पुरा विचार रखती थी, कि बाबासाहब डॉ. आंबेडकर के कामों में कोई विघ्न न आए औरउनकी पढ़ाई खराब न हो. माता रमाई अपने पति के प्रयत्न से कुछ लिखना पढ़ना भी सीख गई थी. साधारणतः महापुरुषों के जीवन में यह एक सुखद बात होती रही है कि उन्हें जीवन साथी बहुत ही साधारण और अच्छे मिलते रहे. बाबासाहब भी ऐसे ही भाग्यसाली महापुरुषों में से एक थे, जिन्हें रमाबाई जैसी बहुत ही नेक और आज्ञाकारी जीवन साथी मिली.

इस मध्य बाबासाहब आंबेडकर के सबसे छोटे बच्चे ने जन्म लिया. उसका नाम राजरत्न रखा गया. वह अपने इस पुत्र से बहुत लाड-प्यार करते थे. राजरत्न के पहले माता रमाई ने एक कन्या को जन्म दिया, जो बाल्य काल में ही चल बसी थी. मात रमाई का स्वास्थ्य खराब रहने लगा. इसलिए उन्हें दोनों लड़कों यशव्त और राजरत्न सहीत वायु परिवर्तन के लिए धारवाड भेज दिया गया. बाबासाहब की ओर से अपने मित्र श्री दत्तोबा पवार को १६ अगस्त १९२६ को लिए एक पत्र से पता लगता है कि राजरत्न भी शीघ्र ही चल बसा. श्री दत्तोबा पवार को लिखा पत्र बहुत दर्द भरा है. उसमें एक पिता का अपनी संतान के वियोग का दुःख स्पष्ट दिखाई देता है. 



सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में बहुजनो पर जाति के आधार पर हुए हमले का सच

( क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन की अगुवाई में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र एवं नौजवान भारत सभा के कार्यकर्त्ताओ ने तथ्यों की जांच पड़ताल के लिए शब्बीरपुर गांव का दौरा 8 मई को किया इस जांच पड़ताल के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है।)
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सहारनपुर से लगभग 26 किमी दूरी पर शब्बीरपुर गांव पड़ता है । मुख्य सड़क से तकरीबन आधा किमी दूरी पर यह गांव है।इस गांव के आस पास ही महेशपुर व शिमलाना गांव भी पड़ते है। गांव के भीतर प्रवेश करते वक्त सबसे पहले दलित समुदाय के घर पड़ते है। जो कि लगभग 200 मीटर के दायरे में गली के दोनों ओर बसे हुए हैं। यहां घुसते ही हमें गली के दोनों ओर जले हुए घर, तहस नहस किया सामान दिखाई देता है। दलित समुदाय के कुछ युवक, महिलाएं व अधेड़ पुरुष दिखाई देते हैं जिनके चेहरे पर खौफ, गुस्सा व दुख के मिश्रित भाव को साफ साफ पढ़ा जा सकता है।

इस गांव के निवासियों के मुताबिक गांव में तकरीबन 2400 वोटर हैं जिसमें लगभग 1200 वोटर ठाकुर समुदाय के , 600 वोटर दलित (चमार)जाति के है। इसके अलावा कश्यप, तेली व धोबी, जोगी (उपाध्याय) आदि समुदाय से हैं। मुस्लिम समुदाय के तेली व धोबी के तकरीबन 12- 13 परिवार हैं। गांव में एक प्राइमरी स्कूल हैं जिसमें ठाकुर समुदाय के गिने चुने बच्चे ही पड़ते हैं जबकि अधिकांश दलितों के बच्चे यहां पड़ते हैं।
गांव की अधिकांश खेती वाली जमीन ठाकुरों के पास है लेकिन 25-35 दलित परिवारों के पास भी जमीन है। दलित प्रधान जो कि 5 भाई है के पास भी तकरीबन 60 बीघा जमीन है।

गांव में ठाकुर बिरादरी के बीच भाजपा के लोगों का आना जाना है। जबकि दलित समुदाय बसपा से सटा हुआ है। गांव का प्रधान दलित समुदाय से शिव कुमार है जो कि बसपा से भी जुड़े हुए हैं। इस क्षेत्र के गांव मिर्जापुर के दलित सत्यपाल सिंह ने बताया कि वह खुद आरएसएस(संघ) से लंबे समय से जुड़े हुए है शिमलाना, महेशपुर व शब्बीरपुर गांव में भी संघ की शाखाएं लगती हैं हालांकि इनमें दलितों की संख्या 6-7 के लगभग है और इस गांव से कोई भी दलित शाखाओं में नहीं जाता है।

घटना व घटना की तात्कालिक पृष्ठभूमि

5 मई को दलित समुदाय को निशाना बनाने से कुछ वक्त पहले कुछ ऐसी बातें हुई थी जिसने दलितों को सबक सिखाने की सोच और मज़बूत होते चले गई । 14 अप्रेल को अम्बेडकर दिवस के मौके पर गांव के दलित अपने रविदास मंदिर के बाहर परिसर में अम्बेडकर की मूर्ती लगाना चाह रहे थे । लेकिंन गांव के ठाकुर समुदाय के लोगों ने इस पर आपत्ति की।प्रशासन ने मूर्ति लगाने की अनुमति दलितों को नहीं दी । मूर्ति लगाने के दौरान पुलिस प्रशासन को गांव के ठाकुर लोगों ने बुलाया। पुलिस मौके पर पहुँची मूर्ति नही लगाने दी गई । दलितों से कहा गया कि वो प्रशासन की अनुमति का इंतजार करें। जो कि नहीं मिली।

5 मई को इस गांव के पास शिमलाना में ठाकुर समुदाय के लोग "महाराणा प्रताप जयंती" को मनाने के लिए एकजुट हुए थे। इनकी तादात हज़ारों में बताई गई है। इसमे शब्बीरपुर गांव के ठाकुर भी थे। ये सभी सर पे राजपूत स्टाइल का साफा पहने हुए थे, हाथों में तलवार थामे हुए थे व डंडे लिए हुवे थे।

5 मई को सुबह लगभग 10:30 बजे गांव के ठाकुर समुदाय के कुछ युवक बाइक में दलित समुदाय की ओर से जाने वाले रास्ते पर से डी जे बजाते हुए आगे बढ़ रहे थे। इस पर दलितों ने आपत्ति जताई । क्योंकि प्रशासन से इनकी अनुमति नहीं थी । इसका दलितों ने विरोध किया लेकिन इस पर भी मामला नही रुका तो दलित प्रधान ने पुलिस प्रशासन को सूचित किया। पुलिस आई और डी जे को हटा दिया गया। दलित समुदाय के लोगों ने आगे बताया कि इसके बाद ये बाइक में रास्ते से गुजरते हुए " अम्बेडकर मुर्दाबाद", "राजपुताना जिंदाबाद" महाराणा प्रताप जिंदाबाद" के नारे लगाते हुए आगे बढ़ने लगे। वह रास्ते से 2-3 बार गुजरे। इन दौरान फिर पुलिस भी आई।

ठाकुर समुदाय के लोगों का कहना था कि इन दौरान दलित प्रधान ने रास्ते से गुजर रहे इन लोगों पर पथराव किया। जबकि दलित समुदाय के लोग इससे इनकार करते हैं। हो सकता है दलितों की ओर से कुछ पथराव हुआ हो। क्योंकि इसी दौरान ठाकुर समुदाय के लोग महाराण प्रताप जिन्दाबाद का नारा लगाते हुए रविदास मंदिर पर हमला करने की ओर बढ़े।

लगभग 11 बजे के आस पास रविदास मंदिर पर हमला बोला गया। दूसरे गांव से आये एक ठाकुर युवक ने रविदास की मूर्ति तोड़ दी नीचे गिरा दी । दलितों ने बताया कि इस पर पेशाब भी की गई। और यह युवक जैसे ही मंदिर के अंदर से बाहर परिसर की ओर निकला वह जमीन पर गिर गया। और उसकी मृत्यु हो गई । इसकी हत्या का आरोप दलितों पर लगाया गया। इण्डियन एक्सप्रेस के मुताबिक पोस्टमार्टम में मृत्यु की वजह ( suffocation) दम घुटना है।

तुरंत ही दलितों द्वारा ठाकुर युवक की हत्या की खबर आग की तरह फैलाई गई । और फिर शिमलाना में महाराण प्रयाप जयंती से जुड़े सैकड़ो लोग तुरंत ही गांव में घुस आए। इसके बाद तांडव रचा गया। तलवार, डंडे से लैस इन लोगों ने दलितों पर हमला बोल दिया। थिनर की मदद से घरों को आग के हवाले कर दिया गया। लगभग 55 घर जले । 12 दलित घायल हुए इसमें से एक गंभीर हालत में है। गाय, भैस व अन्य जानवरों को भी निशाना बनाया गया।इस तबाही के निशान हर जगह दिख रहे थे। यहां से थोड़ी दूर महेशपुर में सड़क के किनारे दलितों के 10 खोखे आग के हवाले कर दिए गए। यह सब चुन चुन कर किया गया।

घायलों में 5 महिलाएं है जबकि 7 पुरुष। गांव के दलित प्रधान का बेटा गंभीर हालत में देहरादून जौलीग्रांट में भर्ती है। तलवार व लाठी डंडे के घाव इनके सिर हाथ पैर पर बने हुए हैं। रीना नाम की महिला के शरीर पर बहुत घाव व चोट है। इस महिला के मुताबिक इसकी छाती को भी काटने व उसे आग में डालने की कोशिश हुई। वह किसी तरह बच पायी।

शासन , पुलिस प्रशासन व मीडिया की भूमिका

सरकार व पुलिस प्रशासन की भूमिका संदेहास्पद है व उपेक्षापूर्ण है। यह आरोप है कि घटनास्थल पर हमले के दौरान मौजूद पुलिस हमलावरों का साथ देने लगी व कुछ दलितों के साथ इस दौरान मारपीट भी पुलिस ने की । संदेह की जमीन यहीं से बन जाती है कि जब संघ व भाजपा के लोग अम्बेडकर को हड़पने पर लगे है तब दलितों को उन्हीं के रविदास मंदिर परिसर में अम्बेडकर की प्रतिमा लगाने से रोक दिया गया व प्रशासन ने इसकी अनुमति ही नहीं दी।

दलितों पर कातिलाना हमले के बाद भी सरकार व मुख्यमंत्री के ओर से दलितों के पक्ष में कोई प्रयास नहीं हुए जिससे कि उन्हें महसूस होता कि उनके साथ न्याय हुआ हो। इसके बजाय मामला और ज्यादा भड़काने वाला हुआ । एक ओर पुलिस प्रशासन ने पीड़ितों व हमलवारों को बराबर की श्रेणी में रखा और हमलावर ठाकुर समुदाय के लोगों के साथ साथ दलितों पर भी मुकदमे दर्ज किए दिए गए । 8 मई तक मात्र 17 लोग ही गिरफ्तार किए गए इसमें लगभग 7 दलित समुदाय के थे जबकि 10 ठाकुर समुदाय के। जबकि दूसरी ओर ठाकुर समुदाय से मृतक परिवार के लोगों को मुआवजा देने की खबर आई व मेरठ में मुख्य मंत्री योगी द्वारा अम्बेडकर की मुर्ती पर माल्यार्पण न करने की खबर भी फैलने लगी।
घायल लोगों के कोई बयान पुलिस ने 8 मई तक अस्पताल में नहीं लिए थे। घायल लोगों के कपड़े घटना वाले दिन के ही पहने हुए हैं जो कि खून लगे हुए थे। ये पूरे शासन प्रशासन की संवेदनहीनता को दिखाता है।
इस दौरान गांव में डी एम ने एक बार दौरा किया व कुछ परिवारों को राशन दिया। लेकिन लोगो की जरूरत और ज्यादा की थी उन्हें छत के रूप में तिरपाल की भी जरूरत थी। लेकिन शासन प्रशासन ने फिर मदद को कोई क़दम नहीं उठाया। बाहर से जो लोग मदद पहुंचा रहे थे उन्हें भी प्रशासन ने रोक दिया।

लखनऊ से गृह सचिव व डी जी पी स्थिति का जायजा लेंने पहुंचे तो वे केवल अधिकारियों से वार्ता करके चले गए गांव जाना व वंहा दलितों से मिलने का काम इन्होंने नहीं किया।

बात यही नही रुकी। दलितों ने भेद भाव पूर्ण व्यवहार के विरोध में तथा मुआवजे के लिए एकजुट होने की कोशिश को भी रोका गया। दलित छात्रावास में रात को ही पीएसी तैनात कर दी गई। और जब गांधी पार्क से एकजुट दलित लोगों ने जुलूस निकालने की कोशिश की तो उस पर लाठीचार्ज कर दिया गया।

मीडिया ने इस कातिलाना हमले को दो समुदाय के टकराव(clash) के रूप में प्रस्तुत किया। हमलावरों व हमले के शिकार लोगों को एक ही केटेगरी में रखा गया। इसका नतीजा ये रहा कि दलितों में पुलिस प्रशासन व मीडिया के प्रति अविश्वास व नफरत बढ़ते गया।

शबीरपुर घटना की दीर्घकालिक वजह

सहारनपुर में दलितों की आर्थिक व राजनीतिक स्थिति तुलनात्मक तौर ठीक है और यह तुलनात्मक तौर पर मुखर भी है । आरक्षण के चलते थोड़ा बहुत सम्पन्नता दलितों में आई है अपने अधिकारों के प्रति सजग भी हुए है। लेकिन इन बदलाव को सवर्ण समुदाय विशेषकर ठाकुर समुदाय के लोग अपनी सामंती मानसिकता के चलते सह नहीं पाते। उन्हें यह बात नफरत से भर देती है कि कल तक जिन्हें वे जब तब रौंदते रहते थे आज वही उन्हें आँख दिखाते है ।

जब से एस सी एस टी एक्ट बना हुआ है इस मुकदमे के डर से ठाकुर समुदाय के लोगों को जबरन खुद को नियंत्रित करना पड़ता है कभी कभी तो जेल भी जाना पड़ता है। ये बात इन्हें नफरत से भर देती है।ठाकुर समुदाय के लोग महसूस करते है कि बसपा की सरकार थी तो बस इन दलितों का ही राज था। अभी बसपा की सरकार होती तो सारे ठाकुर अंदर होते, भाजापा के होने केवल 10-12 लोग ही अरेस्ट हुए। दलित व ठाकुरों के बीच के अंतर्विरोध अलग अलग वक्त पर झगड़ो के रूप में दिखते हैं।
चूंकी संघ ने निरंतर ही अपनी नफरत भरी जातिवादी विचारो का बीज इस इलाके में भी बोया है। सवर्ण समुदाय इससे ग्रसित है। वह आरक्षण व सामाजिक समानता का विरोधी है। इसलिए यह अंतर्विरोध और तीखा हुआ है। संघ मुस्लिमों के विरोध में सभी हिंदुओं को लामबंद करने की कोशिश कर रहा है अपने फास्सिट आंदोलन को मजबूत कर रहा है । शब्बीरपुर घटना उसके लिए फायदेमंद नहीं है।

चुकी शब्बीरपुर गांव में ठाकुरों के वोटर दलितों से दुगुने होने के बावजूद ठाकुर अपना प्रधान नहीं बना पाए। एक बार रिजर्ब सीट होने के चलते तो दूसरी दफा सामान्य सीट होने के के बावजूद।

जब ठाकुर समुदाय के लोगों से यह पूछा गया कि ऐसा कैसे हुआ ? तो उन्होंने जवाब दिया कि सारे चमार, तेली कश्यप एक हो गए हम ठाकुर एक नही हो पाए ज्यादा ठाकुर चुनाव में खड़े हो गए, वोट बंट गए और हार गए। इसका बहुत अफसोस इन्हें हो रहा था।

इसके अलावा दलितों के पास जमीन होना भी ठाकुर लोगों के कूड़न व चिढ़ को उनके चेहरे व बातों में दिखा रहा रहा था। ठाकुर लोगों से जब पूछा गया कि गांव में सबसे ज्यादा जमीन किसके पास है ? तो जवाब मिला - सबके पास है दलितों के पास भी बहुत है प्रधान के पास 100 बीघा है उसका भटटा भी है पटवारी भी दलित है जितना मर्जी उतनी जमीन पैसे खाकर दिखा देता है।

ठाकुर परिवार की महिलाएं बोली - हमारी तो इज्जत है हम घर से बाहर नही जा सकती, इनकी(दलित महिलाएं) क्या इज्जत, सब ट्रैक्टर मैं बैठकर शहर जाती है पैसे लाती है। ठाकुर लोग फिर आगे बोले-इनके ( दलितों) के तो 5-5 लोग एक घर से कमाते है 600 रुपये मज़दूरी मिलती है हमारी तो बस किसानी है हम तो परेशान हैं आमदनी ही नहीं है।

यही वो अंतर्विरोध थे जो लगातार भीतर ही भीतर बढ़ रहे थे दलितों को सबक सिखाने की मंशा लगातार ही बढ़ रही थी। और फिर 5 मई को डी जे के जरिये व फिर नारेबाजी करके मामला दलितों पर बर्बर कातिलाना हमले तक पहुंचा दिया गया। इसमें कम से कम स्थानीय स्तर के भाजपा , संघ व पुलिस प्रशासन की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।

5 मई को शिमलाना में महाराणा प्रताप जयंती का आयोजन किया गया । जिसमें हजारों लोग गांव में इकट्ठे हुवे थे। ऐसा कार्यक्रम सहारनपुर के गांव में पहली दफा हुआ। जबकि इससे पहले यह जिला मुख्यालय पर हुआ है।

दलित समाज की प्रतिकिया व शासन प्रशासन

जैसा कि स्पष्ट है विशेष तौर पर पुलिस प्रशासन के प्रति इनमें गहरा आक्रोश था। जब 9 तारीख को दोपहर में गांधी पार्क पर लाठी चार्ज किया गया तो शाम अंधेरा होते होते यह पुलिस प्रशासन से मुठभेड़ करते हुए दिखा। इनकी मांग थी - हमलावर ठाकुर समुदाय के लोगो को 24 घंटे के भीतर गिरफ्तार करो।

सहारनपुर के रामनगर,नाजीरपुरा,चिलकाना व मानकमऊ में सड़कें ब्लॉक कर दी गई । यह दलित समुदाय के युवाओं के एक संगठन 'भीम आर्मी' ने किया। लाठी डंडो से लैस इन युवाओं को पुलिस प्रशासन ने जब फिर खदेड़ने की कोशिश की तो फिर पुलिस को टारगेट करते हुए हमला बोल दिया गया।पुलिस थाने में आग लगा दी गई । पुलिस की कुछ गाड़िया जला दी गई ।पुलिस का जो भी आदमी हाथ आया उसे दौड़ा दौड़ा कर पिटा गया। अधिकारियों को भी इस आक्रोश को देख डर कर भागना पड़ा। एक दो पत्रकारों को भी पीटा गया व बाइक जला दी। एक बस से यात्रियों को बाहर कर बस में आग लगा दी गई।

इस आक्रोश से योगी सरकार के माथे पर कुछ लकीरें उभर आई। तुरंत ही अपनी नाकामयाबी का ठीकरा दो एस पी पर डालकर उन्हें हटा दिया गया। और अब वह "कानून का राज" कायम करने के नाम पर दलित युवाओं से बनी भीम आर्मी पर हमलावर हो गई है। अस्पताल से लेकर छात्रावास व गांव तक हर जगह इनको चिन्हित कर तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। जबकि ठाकुर समुदाय के तलवार के बल पर खौफ व दहशत का माहौल पैदा करने वाले महाराण प्रताप जयंती वाली सेना को सर आंखों पर बिठा कर रखा जाता है। उनके खिलाफ ऐसी कोई कार्यवाही सुनने या देखने पढ़ने को नही मिली।साफ महसूस हो रहा है कि पुलिस प्रशासन अब पुलिस कर्मियों पर हमला करने वाले दलित समुदाय के लोगों को सबक सिखाने की ओर अपने कदम बढ़ा चुका है।

कुल मिलाकर शासन -प्रशासन व राज्य सरकार का रुख दलितों के प्रति भेदभावपूर्ण, उपेक्षापूर्ण , दमनकारी व सबक सिखाने का बना हुआ है। इसलिये आने वाले वक्त में यह समस्या और गहराएगी। वैसे भी जब जातिवादी , साम्प्रदायिक व फासिस्ट विचारों से लैस पार्टी सत्ता में बैठी हुई हो तो इससे अलग व बेहतर की उम्मीद करना मूर्खता है।

May 26, 2017

MEMORANDUM TO HON’BLE PRESIDENT OF INDIA

हमारे गुजरात के चार साथी सहारनपुर में एक सप्ताह तक ठहरने के बाद अभी राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को उना तथा सहारनपुर पर मेमोरेन्डम देने जा रहे हैं. 

कर्मशील राजु सोलंकी ने उनको मेमोरेन्डम तैयार करके भेज दिया है, अवश्य पढ़े और शेअर करे... 




To,
Honourable President of India
New Delhi.


Dear Sir,

            We undersigned, concerned citizens of Gujarat and India, after visiting Saharanpur, demand to immediately dismiss Mr. Adityanath Yogi’s government in Uttar Pradesh in the wake of the complete breakdown of law and order enforcement machinery in the state. The situation is alarming as the central government has to send Rapid Action Force to Saharanpur, the hotbed of caste conflict under the nose of a regime which has been boasting of Hindu Unity and brotherhood among so-called higher and lower castes.


            In fact, Mr. Adityanath Yogi is running a quasi-military, armed gang named Hindu Yuva Vahini which is responsible for the present conflict where poor and marginalized communities like Dalits and Muslims are the worst sufferers. The Thakurs of Uttar Pradesh, who coincidentally belong to Mr. Yogi’s cast are primarily responsible for the initiation of present perpetrated violence, unabated and aggravated under the nose of Thakur-friendly police and administration.

               BJP the present party in power at both, center and state levels is determined to enforce political exclusion of Muslim community in our country, where our forefathers have painstakingly and purposefully nourished inclusive policy for all citizens of India. The present turmoil in Uttar Pradesh is an indicator of another sinister aspect of BJP and that is - a well-planned strategy to undermine and destroy the growing awareness among SCs, STs and OBCs and minorities.

           Our Prime Minister Mr. Narendra Modi is the mastermind in the very undemocratic process of drowning the ‘loudest voices’ of dissent. The witch hunt of Teesta Setalwad, use of CBI against political opponents and protection of fascist forces who are ready to shatter the composite and secular fabric of the nation. The Una incident of Gujarat was the glaring example of state patronage to goons who roam and ruin lives of innocents in the name of ‘holy cow’. The lynching of innocent Muslims in Jharkhand, Murder of a Muslim trader in Alwar, uprooting Tribals in name of development, killings of Dalits on the altar of age-old caste prejudices – these all are ominous signs of a brutal, fascist state.

           Looking at the grim picture, we request you to intervene as early as possible.

                                                                                                                                    Yours,
                                                                                                                        Ramesh Babariya, 
                                                                                                                         Arvind Khuman, 
                                                                                                                        Kishor Dhakhada, 
                                                                                                                           Mukesh Vanza.


























🌺સહારનપુર મુદે દિલ્હીથી લાઇવ...
🦁રાષ્ટ્રપતિ કાર્યાલય અને વડા પ્રધાન કાર્યાલયમાં રુબરુ જઇ સહારનપુરના મુદે મેમોરેન્ડમ આપ્યુ 🦁26/5/17
💥 દોસ્તો, .. છેલ્લા 8 દિવસથી સહારનપુરના પિડીતો, ભીમ આર્મીના સભ્યોને મળીને સહારનપુરની પરિસ્થિતિ સમજી આવેદનપત્ર તૈયાર કરેલ. કાનુની સહાયતા ગુપ - ગુજરાતના નામે રુબરુ જઈ રાષ્ટ્રપતિ તેમજ વડા પ્રધાન કાર્યાલયમાં આજ રોજ તા. 26/5/17 ના રોજ આવેદનપત્ર આપેલ છે, રુબરુ રજુઆત કરેલ છે.
💥 અમદાવાદથી રાજુભાઇ સોલંકીએ આવેદનપત્ર તૈયાર કરી મેઇલ કરેલ તે પણ આપેલ છે.
💥 વિકટ પરિસ્થિતિમા આ સમગ્ર કામગીરી ગ્રુપના સાથી મીત્રો કિશોરભાઈ ધાખડા, રમેશભાઈ બાબરીયા, મુકેશભાઇ વાંજા અને હુ અરવિંદભાઈની સખત મહેનતથી શક્ય બન્યુ છે. લગભગ કુલ 72,000/ નો ખર્ચ થયેલ જે દરેક સભ્યે પોતાના ખર્ચે સહારનપુરના પિડીતો માટે ખર્ચ કરેલ છે. કોઇ પાસેથી એક રુપીયે પણ ફાળા પેટે લીધલ નથી.
💥 આ આવેદનપત્રની માંગણીઓ મુજબ દરેક જિલ્લા, તાલુકામા આવેદનપત્રો આપો.. આવેદનપત્રની તૈયાર નકલ મેળવવા અમારો સંપર્ક કરો.
🙏(1) અરવિંદભાઈ મો. 8128321291 mail I D : khumanarvind01@gmail.com મેઇલ કરી મોકલી શકો છો.. અરવિંદભાઈ ,કિશોરભાઈ, રમેશભાઈ, મુકેશભાઇ અને ટીમના સભ્યો..






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May 24, 2017

Dalits accused Thakurs and police of harassing them together : R.c. Vivek

There is the latest information by TVNEWS that several Valmiki's and Jatav community have threaten to government that they will convert in Slam religion as they are not getting justice from present government because police and goons are looting our houses and not register their complaint at police station hence our community is not getting justice from Yogi government ,hence there is no alternate for us except to convert into Islam or Buddhism but we have decided that we will not live in Hindu religion which is horrible for us as upper caste is treating us as slaves and no equality in Hindu religion, Think matter is serious for the Hindu religion if it happened then Hindu religion will come in minority.
- R.c. Vivek

















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अंधश्रद्धा छोडो मानव कल्याण को अपनाओ


अगर भगवान का बसेरा मंदिर मे या पथ्थरो की मूर्तिओ मे ही होता तो महादेव का मंदिर 17 बार नही टुटता ... ईतिहाश गवाह है अरब यात्री अल-बरूनी ने अपने यात्रा वृतान्त में सोमनाथ का विवरण लिखा था जिससे प्रभावित हो कर  महमूद ग़ज़नवी ने सन 1024 में कुल 5000 साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया और ईतनाही नही उस समय मंदिर के अंदर 50000 भक्त पूजा-अर्चना कर रहे थे, प्रायः उन सभी का भी कत्ल कर दिया. वो सभी भक्त ऐसी मान्यता मे जी रहे थे की सोमनाथ महादेव की लींग की मुर्ती है वह उन्हे बचाने आयेगी और महमूद ग़ज़नवी और उसकी सेना को खत्म कर देगी. सारे पंडीत महादेव को अरजी करने मे ही रहे की आप आओ और सारे आक्रमणकारीओ को खत्म कर दो पर कोइ नही आया. और इतीहास आप के सामने है।  

इसके बाद 1069 गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया। सन 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर कब्ज़ा किया तो इसे पांचवीं बार गिराया गया। ईतना ही नही मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः सन् 1706 में गिरा दिया मंदिर का बार-बार खंडन और जीर्णोद्धार होता रहा और सन 1026 में महमूद ग़ज़नवी ने बारा ज्योति लिंगो मे प्रथम ज्योतिलिंग को ही खंडित कर दीया, वह यही आदि शिवलिंग था इसके बाद प्रतिष्ठित किए गए शिवलिंग को ई.स.1300 में अलाउद्दीन की सेना ने खंडित किया था, महमूद ग़ज़नवी ने भी कुछ बाकी नही रखा जीतना सोना और जो कुछ था मंदीर मे सब को लुंट कर ले गया।  इसके बाद भी कई बार मंदिर और शिवलिंग खंडित किया गया। बताया जाता है आग्रा के किले में रखे देवद्वार सोमनाथ मंदिर के है। महमूद ग़ज़नवी सन 1026 में लूटपाट के दौरान इन द्वारों को अपने साथ ले गया था...

महमूद के हमले के समय अगर देखा जाये तो, प्रभास खंड में विवरण है कि सोमनाथ मंदिर मे उस समयकाल में अन्य देव मंदिर भी बिराजमान थे। इनमें शिवजी के 135, विष्णु भगवान के 5, देवी के 25, सूर्यदेव के 16, गणेशजी के 5, नाग मंदिर 1, क्षेत्रपाल मंदिर 1, कुंड 19 और नदियां 9 बताई जाती हैं। और ईतने सारे भगवानो का बसेरा होते हुये भी किसी भगवान ने आवाज तक नही उठाई और ईसका एक ही तर्क निकलता है की भगवान का बसेरा मंदिर और पथ्थरो मे तो है ही नहीं...

(Created :- ब्लु डायरी ब्युरो )