June 27, 2017

કાયદાથી રક્ષિત ધાર્મિક આતંકવાદનું ભારત માં બિજારોપણ

By Dr Tarun Chandrikaben Baldevbhai

Legalized #SaffronTerror in UP...




આતંકવાદી કોઈપણ ધર્મ નો હોઈ શકે, મુસલમાન હોઈ શકે , હિન્દુ  કે અન્ય કોઈ ધર્મનો... પણ મોટા ભાગે આતંકવાદી તે ધાર્મિક-ચરમપંથી જ હોય. અને આવા કોઈ ધર્માંધ કટ્ટરપંથી વિચારધારા વાળા વ્યક્તિ ના હાથમાં કાયદો વ્યવસ્થા સાચાવવાની જવાબદારી હોય તો પ્રજા નિર્ભક કઈ રીતે હોય.?

ઉત્તરપ્રદેશ ના મુખ્યમંત્રી યોગી આદિત્યનાથ ના "મુસલમાનો શાંતિથી નહીં રહે તો અમે તેમને તેમની ભાષામાં શાંતિથી રહેતાં શીખવીશું" તે સબબ ના નિવેદનો તે જે તે પ્રદેશ ની લઘુમતી કોમના લોકો માટે ચોક્કસ ભયભીત કરનારા હશે...આતંક ફેલાવનારા હશે.તેમના શાબ્દિક આતંકવાદના પુરાવા...

【1】-ઓગસ્ટ, 2014માં યોગીએ લઘુમતી સમુદાય પર હુમલો કરતા જણાવ્યું હતું કે, જ્યાં પણ તેમની સંખ્યા 10 ટકા કરતા વધુ વસ્તી છે ત્યાં રમખાણો થાય છે જ્યારે તેમની સંખ્યા 35 ટકાથી વધુ છે ત્યાં બિન મુસ્લિમો માટે જગ્યા નથી.



【2】- યોગી આદિત્યનાથે ઉત્તરપ્રદેશ ચૂંટણીના પ્રચાર દરમિયાન કૈરાનામાં હિન્દુઓના પલાયનનો મુદ્દો ઉઠાવી ધાર્મિક કાર્ડ ખેલવાનો પ્રયાસ કર્યો હતો. ફેબ્રુઆરી 2017 માં યોગીએ કહ્યું કે અમે પશ્વિમ ઉત્તરપ્રદેશને બીજું કાશ્મીર બનવા નહીં દઇએ.


【3】- જૂન 2016માં બીજેપી સાંસદ યોગી આદિત્યનાથે મધર ટેરેસાને લઇને વિવાદીત નિવેદન કરતા કહ્યુ હતુ કે, ટેરેસા જેવા લોકોએ ભારતમાં ઇસાઇકરણનો પ્રયાસ કર્યો છે. મધર ટેરેસા જેવા લોકો ક્યારેક ભારતમાં ઇસાઇકરણનું કામ કરે છે તો ક્યારેક ફાધર બનીને અહીં હિન્દુઓને દફનાવવાનું કાવતરું રચે છે.


【4】-જૂન, 2015માં આદિત્યનાથે કહ્યુ હતુ કે યોગ ઋષિઓએ આગળ વધાર્યો છે. હિન્દુસ્તાનમાં મહાદેવનો વાસ છે. જેણે યોગને લઇને કોઇ સમસ્યા છે તે હિન્દુસ્તાન છોડીને જઇ શકે છે. જેને સૂર્ય નમસ્કાર કરવા પર સમસ્યા છે તેમણે સમુદ્રમાં ડૂબી જવું જોઇએ.


【5】- નવેમ્બર 2015માં યોગી  આદિત્યનાથે શાહરૂખ ખાનની તુલના આતંકી હાફિઝ સઇદ સાથે કરી હતી. આદિત્યનાથે શાહરૂખ ખાન પર આપતિજનક નિવેદન કરતા કહ્યુ હતું કે, શાહરૂખે સમજવું જોઇએ કે જો એક મોટી વસ્તીએ ફિલ્મ જોવાનું બંધ કરી દીધું તો શાહરૂખ રસ્તા પર આવી જશે. શાહરૂખ અને આતંકી હાફિઝ સઇદના નિવેદનો એક જેવા છે.


【6】 ઓગસ્ટ, 2014માં આદિત્યનાથનો એક વીડિયો વાયરલ થયો હતો જેમાં તેઓ કહી રહ્યા છે કે અમે નિર્ણય લીધો છે કે જો એક હિન્દુ છોકરીનું ધર્મ પરિવર્તન કરાવવામા આવશે તો અમે 100 મુસ્લિમ છોકરીઓનું ધર્મ પરિવર્તન કરાવીશું. બાદ મા આદિત્યનાથે કહ્યું કે, અમે આ વીડિયો પર કોઇ ટિપ્પણી કરીશું નહીં.


【7】- ઓક્ટોબર 2015 માં ચર્ચાસ્પદ દાદરી કાંડ પર આદિત્યનાથે કહ્યુ હતુ કે, ઉત્તરપ્રદેશ કેબિનેટ મંત્રી (આઝમ ખાન)એ જે રીતે સંયુક્ત રાષ્ટ્ર જવાની વાત કરી છે તેમને તરત જ હટાવી દેવામાં આવે. આજે મેં વાંચ્યું છે કે અખલાક પાકિસ્તાન ગયો હતો અને ત્યારબાદથી તેની ગતિવિધિઓ બદલાઇ ગઇ હતી. શું સરકારે એ જાણવાનો પ્રયાસ કર્યો કે આ વ્યક્તિ પાકિસ્તાન કેમ ગયો હતો. આજે તેના વખાણ કરવામાં આવી રહ્યા છે.


【8】- ફેબ્રુઆરી 2015માં યોગી આદિત્યનાથે કહ્યુ હતું કે, જો તેમને તક આપવામાં આવે તો તેઓ દેશની તમામ મસ્જિદોની અંદર ગૌરી-ગણેશની મૂર્તિ સ્થાપિત કરી દે.


【9】- ફેબ્રુઆરી 2015માં આદિત્યનાથે કહ્યુ હતું કે આર્યાવર્તએ આર્ય બનાવ્યા, હિન્દુસ્તાનમાં અમે હિન્દુ બનાવી દઇશું. અમે આખી દુનિયામાં ભગવો ઝંડો ફરકાવી દઇશું.


【10】 - ફેબ્રુઆરી 2015માં આદિત્યનાથે કહ્યું હતું કે, મક્કામાં બિન મુસ્લિમોને પ્રવેશવાની મંજૂરી નથી. વેટિકન સિટીમાં બિન ખ્રિસ્તીઓને પ્રવેશ મળતો નથી તો પછી આપણે ત્યાં કોઇ પણ વ્યક્તિ કેમ આવે છે?? દેશમાં મુસ્લિમોમાં જન્મદર વધારે છે. જેનાથી જનસંખ્યામાં અસંતુલન આવી શકે છે.









गीता रहस्य : पढ़ेगा इंडिया , तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया

By Sanjay Patel Bauddha
सूचना: जिस किसीकी आस्था-श्रद्धा कमजोर हो वह न पढ़े और अगर फिर भी पढ़ते है और उनकी कमजोर आस्था-श्रद्धा को ठेस पहुंचे तो इसके जिम्मेवार वह खुद रहेंगे ।

भारत के कुछ कुर्सी तोड़ विद्वान भोलेभाले लोगों को यह कहकर गुमराह किया करते है कि आज से लगभग 5-6 हजार वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ था, जिसमें गीता समाहित है... मगर आज यहा कई किताबों के रेफरेंस और अध्ययन से इस बात का खंडन करेंगे...
कहते है कि अपराधी अपने पीछे अपराधपन का कोई न कोई प्रमाण अवश्य ही छोड़ जाता है ! ऐसी ही कुछ प्रामाणिक बातें गीताकार ने भी छोड़ी है । गीता का लेखक अपने घर में बैठकर गीता लिख रहा है। वह गीता के 18वें अध्याय के श्लोक 70 में कृष्ण के मुंह से कहला बैठता है -

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादभावयो: ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्यामिति मे मति: ।
अर्थ: जो कोई हम दोनों के संवाद रूप इस 'धर्म' को पढ़ेगा तो मेरा मत है कि उसके ऐसा करने से मैं ज्ञान यज्ञ द्वारा पूजित होऊंगा ।

गीताकार ने जो 'अध्येष्यते' शब्द का प्रयोग किया है; यहीं पर वह पकड़ा गया है। सभी जानते है कि युद्ध के समय कृष्ण और अर्जुन में मौखिक वार्तालाप हो रहा था और मौखिक वार्तालाप में 'अध्येष्यते' का प्रयोग सरासर गलत है। गीताकार स्वयं भूल गया था कि कृष्ण और अर्जुन का मौखिक वार्तालाप है। इसीलिए भूलवश वह 'अध्येष्यते' (पढ़ेगा) का प्रयोग कर बैठा। 'पढ़ेगा' का अर्थ है कि गीताकार घर में जो पोथी लिख रहा है, उसे भविष्य में कोई पढ़ेगा (=अध्येष्यते) अतः गीता का संबंध वास्तव में किसी युद्ध से न होकर वह तो केवल गीताकार की घर में बैठे ही बैठे कोरी कल्पना ही है ।
कहते है कि कृष्ण ने समय को भी रोक दिया था, अर्जुन और कृष्ण के अलावा सब रुक गया था तो फिर गीता लिखी किसने ? न अर्जुन ने न कृष्ण ने तो यह तीसरा कहा से आया ?
गीता की रचना कब की गई है, इसका प्रमाण स्वयं गीता में ही मिल जाता है! प्रसिद्ध इतिहासकार धर्मानंद कोसंबी ने खोज करके बताया है कि बालादित्य राजा के राज्यकाल (5वीं शताब्दी) में वादरायण या उसके किसी अज्ञात नामा शिष्य ने इसकी रचना की होगी ।
"गीता की भाषा 500 ईशवी पूर्व वाली नही है । यह भाषा बहुत कुछ आधुनिक संस्कृत जैसी है । यह कालिदास के काफी निकट है । फिर इसमें बौद्ध दर्शन के 'निर्वाण' आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है । इससे स्पष्ट है कि यह बुद्ध के बाद कि रचना है।
गीता का समय निश्चित करने में स्वयं गीता काफी मदद करती है। अध्याय 13 के श्लोक 4 में 'ब्रह्मसूत्र' पदों का उल्लेख है। ब्रह्मसूत्रों में बुद्ध दर्शन के चारों संप्रदायों वैभाषिक, सौत्रान्त्रिक, योगाचार और माध्यमिक का खंडन है। योगाचार का विकास असंग और वसुबंधु नाम के भाइयों ने सन 350 ईशवी के आसपास किया । इसके 40-50 वर्ष बाद ही योगाचार इतना प्रसिद्ध हुआ कि इसके पृथक खंडन की जरूरत पड़ी। स्पष्ट है, सन 400 ईसवी के बाद ही ब्रह्मसूत्रों की रचना हुई। लगभग इसी समय वादरायण हुआ जिसका शंकर की गुरु परंपरा में आदि स्थान है- वादरायण, उसका शिष्य गोविंद भागवदपद और उसका शिष्य आदि शंकराचार्य (जन्म 788 ईसवी) शंकर के जन्म से दो-ढाइसो वर्ष पहले कहीं हुआ होगा।
गीता की रचना बौद्ध धर्म के विकास के बाद ही हुई है। बौद्ध धर्म से मुकाबला करने के उद्देश्य से ही किसी अल्प विद्वान ने इसकी रचना घर मे बैठकर की है। पांचवी शताब्दी के आसपास बौद्ध धम्म उच्च शिखर पर था। उस समय के वर्णाश्रम धर्म के मुकाबले में बौद्ध धम्म श्रेष्ठ माना जाता था। जो गंदगी, दलदल, अनैतिकता तथा अंधविश्वास वैदिक धर्म में थे, बौद्ध धम्म इन सबसे मुक्त था। इसीलिए लोग पुराने दलदल को छोड़कर बौद्ध धम्म अंगीकार कर रहे थे। इस धर्म परिवर्तन को रोकना गीताकार का मूल उद्देश्य था। गीताकार यह भी जानता है कि वैदिकधर्म गुण रहित है और बौद्ध धम्म गुण श्रेष्ठ है। इसीलिए बौद्ध धम्म से वह भयभीत है। तभी तो गीताकार को कहना पड़ता है -

श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: || (गीता, अध्याय 03/35)
अर्थ: अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है । अपने धर्म में तो मरना भी कल्याण कारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है ।।
गीताकार इतना डरा हुआ प्रतीत हो रहा है कि गीता के इस श्लोक को उलट फेर करके गीता अध्याय 18 के श्लोक 47 में उसी बात को फिर दोहरा बैठता है-

श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् || 47||
अर्थ: अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है ;क्योंकि स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता ।। ४७ ।।

इन दोनों श्लोकों पर सोचा जाए तो पता चलता है कि, अगर मान लिया जाए कि सृष्टि का सबसे पुराना धर्म हिन्दू है तो फिर कृष्ण यह श्लोकों में कौन से दूसरे धर्म की बात करता है? अगर हिन्दू धर्म अच्छा है तो अर्जुन को यह समझाने की क्या आन पड़ी ?
डॉ. श्रीराम आर्य ने गीता विवेचन में लिखा है कि, " गीता की रचना... यह प्रकट करती है कि वह अन्य शास्त्रों में से चोरी करके बनाई गई पुस्तक है। गीताकार ने जो भी सामग्री महाभारत, मनुस्मृति व उपनिषदों और बौद्ध साहित्य में से ली है, उसे तोड़-मरोड़कर व उसमे मिलावट करके उपस्थित किया है...
गीता में 'निर्वाण' शब्द बौद्ध धर्म से लिया गया है क्योंकि वेदों, ब्राह्मण ग्रंथो तथा उपनिषदों में यह 'निर्वाण' शब्द कहीं नही है।

(अगले पोस्ट में गीता में कहा कहा से चोरी करके लिखा गया है उसकी जानकारी विस्तृत से बताऊंगा)
प्रसिद्ध आलोचक एवं संस्कृत साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. सुरेन्द्र अज्ञात भगवदगीता के बारे में लिखते है, "गीता का रचयिता न संस्कृत व्याकरण का पूरी तरह ज्ञाता है और न उसे वेदों व दूसरे धर्म तथा दर्शन-सिद्धांतो का ठीक से ज्ञान है। गीता में 176 के लगभग व्याकरण विषयक गलतियां मिलती है, चार श्लोकों के बाद एक गलती कहीं संधिविषयक गलती है, तो कहीं गणविषयक; कहीं समास विषयक गलती है तो कहीं लकार विषयक। 
अतः "यह निर्विवाद है कि गीता न कृष्ण की रचना है, न व्यास और न किसी विद्वान की, यह किसी कामचलाऊ पंडित की रचना है जो वेद, दर्शन और संस्कृत व्याकरण का भी ज्ञाता नहीं है।"
इस प्रकार निःसंदेह रूप से यह बात प्रमाणित होती है कि गीता कृष्ण के द्वारा न रची गई है या न कृष्ण का कोई उपदेश है। उसे बनाने वाले ने उपनिषद, मनुस्मृति, महाभारत और बौद्ध वांगमय से भी सामग्री लेकर, उसे तोड़-मरोड़कर व उसमें मिलावट करके इस रूप में प्रस्तुत किया है कि श्री कृष्ण जी को साक्षात परमेश्वर सिद्ध (बुद्ध को भुलाने और बुद्ध से मुकाबला करने) किया जा सकें । यदि ऐसा न करता तो उसे अपनी बात को प्रभाव पूर्ण ढंग से रखने का अवकाश भी नहीं मिल सकता था।
(बने रहिएगा... पढ़ेगा इंडिया...तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया... आगे जारी रहेगा गीता का रहस्य अगले पोस्ट में)
संदर्भ:
1. पालि साहित्य का इतिहास
2. गीता की शव परीक्षा - डॉ. सुरेन्द्र अज्ञात
3. गीता विवेचन - डॉ. श्रीराम आर्य
4. भारत की गुलामी में गीता की भूमिका - आचार्य भद्रशील रावत
5. श्रीमद भागवद गीता
6. विकिपीडिया 

June 26, 2017

धर्म का भय क्यों?

By Sanjay Patel Bauddha

डॉक्टर बी आर अंबेडकर ने अपनी पुस्तक "जाति-प्रथा का विध्वंस" में लिखा है कि धर्म और कानून दो अलग-अलग चीज होते हैं।
प्रत्येक धर्म के कुछ सिद्धांत होते हैं। ये सभी मनुष्यों पर समान रूप से लागू होते हैं। धर्म में किसी खास व्यक्ति या समूह के लिए कुछ पाबंदी हो या दूसरे समूह के लिए कुछ छूट हो ऐसा नहीं होता।
कानून या नियम मनुष्य के जीवन को नियंत्रित करने के लिए बनाए जाते हैं। जैसे किसी देश का संविधान या स्कूलों के नियम। स्कूलों में कुछ खास नियम होते हैं- समय पर आने का, पढ़ने का, छुट्टी का, अध्यापकों के साथ व्यवहार करने का आदि।
कानून या नियमों को बदला जा सकता है। जैसे जनहित में संविधान में संशोधन किया जा सकता है। जिसका कोई बुरा नहीं मानता।
लेकिन धर्मों के सिद्धांतों में कोई परिवर्तन नहीं करता है और ना ही करना चाहता है क्योंकि वह सोचता है कि धर्म के सिद्धांत ईश्वर के बनाए हुए हैं, या ईश्वर के दूत के बनाए हुए हैं।
हिंदू धर्म में वास्तव में सिद्धांत नहीं है, वे कानून ही है जैसे कि ब्राम्हण को किस तरह व्यवहार करना चाहिए, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्रों को किस तरह से व्यवहार करना चाहिए। उनके अलग-अलग अधिकार बताये गए हैं। लेकिन इन कानूनों को धर्म का रूप दिया हुआ है जिससे लोग उसको सुधारने की हिम्मत ना करें।
दूसरी बात है कि हिंदू धर्म में ब्राम्हण को सम्मानित माना जाता है और भू-देवता माना जाता है। जैसा वह चाहता है वैसा ही किया जाता है। वह कभी नहीं चाहेगा कि हिंदू धर्म में सुधार हो क्योंकि उसमें उसका बहुत फायदा है। मंदिरों में बिना मेहनत के गाढ़ी कमाई होती है। लोगों की जन्म, मृत्यु, शादी में मुफ्त में खाने को मिलता है। ब्राह्मण ऐसा अधिकार क्यों छोड़ना चाहेगा?
इन कारणों के होते हुए हिंदू धर्म में सुधार संभव नहीं है। यदि जनता को समझ में आ जाए कि हिंदू धर्म की असमानतावादी व्यवस्था धर्म का सिद्धांत नहीं बल्कि शोषण का कानून है तो वे उस को बदलने में कोई संकोच नहीं करेंगे।
वह केवल श्रद्धा के नाम पर रुका हुआ है और अपना शोषण करवाता रहता है। ज्ञान प्राप्त होते ही वह बिना किसी की डरे इस सड़े-गले कानून को मानने से मना कर देगा और वर्ण व्यवस्था से मुक्त हो जाएगा।
इस प्रकार से मनुष्य का डर केवल अज्ञान के कारण है।

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ડો. આંબેડકર મહા મહેનતે ઉચ્ચ અભ્યાસ પામી શક્યા તેની પાછળ તેમનું દ્રઢ મનોબળ અને સંધર્ષ કરવાની વૃત્તિએ મુખ્ય ભાગ ભજવ્યો હતો.

By Jigar Shyamlan

મનોવિજ્ઞાન એવું સ્વિકારે છે કે બાળપણના આઘાતજનક અને હતાશાપ્રેરક બનાવ વ્યક્તિના માનસપટ પર કાયમી છાપ છોડી જાય છે. ભારત અને અમેરિકામાં આ બાબતે કરવામાં આવેલ કેટલાક સંશોધનોમાં એ વાત સાબિત થઇ છે કે પદદ્લિત સમુદાયના સભ્યોનો પોતાની જાત વિશેનો નીચો ખ્યાલ માનસ પર ઉંડી અસર કરે છે. આ અસર વ્યક્તિમાં નામ, ચહેરા કે અસ્તિત્વવિહીનતાની માનસિક લાગણી પેદા કરે છે.
ડો. આંબેડકર પણ આવી જ અશ્પૃશ્ય પૈકીની એક ગણાતી મહાર જાતિમાં જન્મ્યા હતા. ડો. આંબેડકરનું સમગ્ર જીવન અન્યાય, હતાશા, અપમાન અને અવમાનનાથી ભરેલુ રહ્યું હતુ.
ડો. આંબેડકર બાળપણમાં જ્યારે શાળામાં દાખલ થયા ત્યારથી જ પોતે અષ્પૃશ્ય છે એ વાતના કડવા અનુભવો થવા લાગ્યા હતા. શાળામાં તેમને અન્ય હિન્દુ વિધાર્થીઓથી સાવ અલગ બેસવાની ફરજ પાડવામાં આવતી હતી. પોતે વર્ગમાં અન્ય વિધાર્થીઓની સરખામણીમાં હોંશિયાર હોવા છતાં શિક્ષકો તરફથી સદા અપમાનિત થયા હતા. શાળામાં મૂકેલ પાણીના સાર્વજનિક માટલાને અડકી શકાતુ ન હતુ. જ્યાં સુધી પટાવાળો આવીને પોતાના હાથે નળ ખુલ્લો ન કરે ત્યાં સુધી તરસ્યા બેસી રહેવું પડતું હતું. પટાવાળાના હાથે નળ ખુલ્લો કરાયા બાદ નળને સ્પર્શ ન થાય તે વાતનું ધ્યાન રાખતા ખોબો ધરીને પાણી પીવું પડતુ હતુ. જ્યારે પટાવાળો રજા પર હોય કે બહાર ગયો હોય ત્યારે આખો દિવસ પાણી પીધા વગર તરસ્યા જ રહેવું પડતુ અને શાળા છૂટે કે પોતાના ઘેર જઇને તરસ છિપાવવી પડતી.
આટલા કડવા અપમાન છતા ડો. આંબેડકર મહા મહેનતે ઉચ્ચ અભ્યાસ પામી શક્યા તેની પાછળ દ્રઢ મનોબળ અને સંધર્ષ કરવાની વૃત્તિએ મુખ્ય ભાગ ભજવ્યો હતો.
- જિગર શ્યામલન


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शाहू महाराज जयंती अवसर पर उन्हें विनम्र अभिवादन।

राजर्षि छत्रपती शाहूजी महाराज के कोल्हापुर संस्थान में ब्राम्हणवाद को नियंत्रण करनेवाले निर्णय
१) १९०१ में कोल्हापुर संस्थान में अछूतों कि जनगणना और १९०२ में मराठा,ओबीसी, अस्पृश्य इन सभी लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था
२) १९०१ शुद्र-अतिशुद्रो के लिए छात्रावास का प्रावधान
३) कोल्हापुर संस्थान के सभी गाँव में स्कूल खोलने के लिए १ लाख रूपये का प्रावधान और स्कूलें खोलने का आदेश
४) ८ सितम्बर १९१३ कोल्हापुर संस्थान में सखती से अनिवार्य शिक्षा का आदेश
५) १९१७ को विधवा कानून बनाने का आदेश
६) ३ अगस्त १९१८ NT/DNT/VJNT को पुलिस स्टेशन में हाजीर रहने की प्रथा को खत्म कर दिया।
७) ६ सितम्बर १९१९ सार्वजनिक जगह पर जैसे कुँवे,अस्पताल, धर्मशाला,सरकारी आवास पर अस्पृश्यता को नकार कर सबके लिए खुली छूट दिया।
८)१९१९ आतंरजाती विवाह को मान्यता दी
९)३ मई १९२० बंधुवा मजदूरी की प्रथा बंद करवायी। और ज्यो लोग यैसा करते है,उनपर कानूनी कारवाई की जायेगी यह निर्णय हुवा
१०) २ अगस्त १९१९ महिलाओं को तलाख लेने का स्वेच्छा से अधिकार दिया।
११) १७ जनवरी १९२० को देवदासी प्रथा को खत्म कर दिया।
१२) १९२० ब्राम्हणो का जन्म दो बार होता है,एक जन्म से और जनऊ संस्कार से होता है । इस प्रथा को पाबंदी लगायी! और सभी ब्राह्मण हो या शुद्र-अतिशुद्रो का जन्म एकबार ही होता है। यह आदेश दिया गया था।
१३) राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले के समाज संघटना के लिए जगह-जगह मकान उपलब्ध करवाया।
शाहू महाराज जयंती अवसर पर उन्हें विनम्र अभिवादन।